भारत देश कभी हिंदुस्तान के नाम से भी जाना जाता था. वेदों और पुराण के संस्कृत वांग्मय में सिन्धु, समुद्र को कहते हैं. कालांतर में एक नदी जो अब पाकिस्तान में से हो कर बहती है उसे भी सिन्धु नदी कहा गया. और आज का प्रचलित शब्द हिन्दू, उसी सिन्धु अर्थात समुद्र का अपभ्रंश है क्योंकि फारसी लोग़ आज भी “श” को “ह” ही बोल पाते हैं. उसी पाकिस्तान के नाम से जाने वाले देश में सिंध नाम का एक प्रान्त आज भी है जो सिन्धु या समुद्र का अपभंश है. इसी तरह, इंडिया नाम भी ग्रीक लोगों की जिह्वा की देन है जो सिन्धु को इंदु या इंदस कहते थे. इस कारण, फारसी लोगों का हिंदुस्तान, और ग्रीक लोगों का इंडिया, दरअसल संस्कृत में "सिन्धु" (या सामुद्रिक) देश का नाम है. हिन्दू, वह सभ्यता है जिसने असीमित जल के श्रोत "सिन्धु" को जीवन का और आस्था का आधार बनाया, और उसी नाम से जाना जाता रहा.
एक कौआ सफ़ेद नहीं हो सकता क्योंकि उसके नाम में ही काला रंग है किन्तु दुर्भाग्य से इंडिया या हिंदुस्तान, या सिन्धु (सिंध) देश जिसके नाम और शब्द रचना एवं संविधान में जल है, वहां शहरों में आज जल पीने के लिए भी उपलब्ध नहीं है. भगवान जाने ! जहाँ जल का स्थान नहीं, वह हिंदुस्तान या इंडिया या सिंध देश कब तक कहलायेगा?
भारत ही दुनिया का एक ऐसा देश है जहाँ जल का अध्यात्म से सम्बन्ध सार्वजनिक है. यहाँ प्रायः सभी जानते हैं कि गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, गोदावरी, सरयू आदि नदियाँ, वैकुण्ठ में रहने वाली प्रकृति की संचालक देवियों के ही सांसारिक स्वरुप हैं. और इस कारण, उनके इन सांसारिक स्वरुप को "माँ" जो हर प्राणी के जीवन की रक्षा करती है, कहा गया. उदाहरण के लिए गंगा एक नदी ही नहीं, वह गंगा मैया है. मरते समय आज भी पारंपरिक भारतीय लोग़ मुह में गंगा जल डालते हैं ताकि उन्हें यह संतोष रहे कि वे जीवन के अंतिम क्षणों में भी अपनी गंगा माँ से जुड़े हुए हैं. उनका अध्यात्म यह जानता है कि एक माँ की रक्षा ही उसे जीवन के आगे की यात्रा में काम आएगी. जीवन की रक्षा करने वाली माँ को किसी भी प्रदूषण से बचाना, हर सुपुत्र का प्रथम कर्त्तव्य है.
आज भी भारत के विशाल क्षेत्र में प्रतीकात्मक शिव मंदिर हैं. यथार्थ में, मंदिर मन के भीतर के स्थान को कहते हैं. उस मन में, गंभीर चिंतन द्वारा यह जाना जा सकता है कि भगवान शिव, भौतिक (व्यक्त, भव, भूत) और ब्रह्म (अव्यक्त,अविनाशी ज्ञान ) दोनों लोकों के ज्ञाता हैं, वैज्ञानिक भी अब यह जान गया है कि जीवन की उत्पत्ति जल से होती है; और जल की उत्पत्ति का कारण वे परिस्थितियां हैं जहाँ भौतिक या जड़ प्रकृति और ब्रह्म रुपी ज्ञान का मेल हो सकता है. उन परिस्थितियों में एक, “शिव (अति कल्याणकारी, संवेदनशील)” है जो मूल प्रकृति (रूट काउस) की वह परिस्थिति है जिसे जीवन दायनी गंगा (अर्थात जल) के आविष्कार के लिए मुख्य रूप से जाना जाता है. जो भी उस शिव अर्थात अचल ध्यान की स्थिति को, तत्व से जानता है, वही प्राणी शिव है.
आज भी, मनुष्यों द्वारा बनाये गए आस्था के मानस चित्रों में शिव के सांकेतिक गूढ़ रहस्य का फारमूला छिपा है. जिसमें एक समाधिस्त व्यक्ति की कल्पना की गयी है जिसके मस्तिष्क में जल का एक भाग है. इस स्मृति को सदैव ताजा रखने के लिए ही प्रतीकात्मक शिव मंदिर में, या सूर्य को अर्घ देने के लिए जल के प्रयोग की परंपरा बनी थी. भगवान शिव की मूर्ति को जल सिर्फ इस प्रदर्शन के लिए ही चढाया जाता है कि लोगों में यह जागृति है कि वे जल का महत्त्व समझते हैं और उसे प्रदूषण से बचा पा रहे हैं; और, शिव द्वारा आविष्कृत जल, पृथ्वी पर स्वच्छ और सर्व सुलभ है. औद्योगिक या भोग-वादी सृजन में जल के दुरूपयोग की सांसारिक घटना ही समुद्र मंथन का चरित्र है. जो सृजन, अप्राकृतिक प्रयोग से चिरस्थायी नहीं हैं, उसके लिए श्रम और मानसिक युद्ध को ही समुद्र मंथन कहते हैं. आज जो हम देखते हैं, कि औद्योगिक कचरा, भोग-रोग की उत्पत्ति और विपरीत आर्थिक समाधान से, जीवन का अध्यात्म नष्ट हो गया है. हर मनुष्य एक रोबोट या मशीन बनने की होड़ में है. हम किसलिए शक्तिशाली हैं जब संवेदनशील नहीं ? जल (जो जीवन का आधार है,) संवेदनशीलता का प्रतीक है. और जब समुद्र मंथन में, प्राणियों की संवेदनशीलता नष्ट हो रही थी, तब, भगवान शिव अर्थात विशेष ज्ञान द्वारा बनी परिस्थितियों ने उस हलाहल विष का पान किया था.
कलियुग में आर्थिक विकास का आधार विचित्र है. मृत्यु -बीमारी, भूख - खपत, और अपराध-अप्राकृतिक जीवन शैली ही आर्थिक विकास का माप-दंड हैं. दवाएं और हास्पिटल के आर्थिक विकास का कारण औद्योगिक कचरा, बीमारी और मृत्यु के भय की वृद्धि हैं. बाज़ार के आर्थिक विकास का कारण मूलभूत प्राकृतिक संसाधन का नष्ट होना, उसकी कमी, असुरक्षा का डर, भूख और संग्रह की प्रवृति है. न्याय, युद्ध के उपकरण/ रक्षा के साधन और सरकारी व्यवस्था के विकास का आधार, अपराध और अपराधी हैं. अर्थ शास्त्र का एक सूत्र (ला आफ डिमिनिशिंग युटिलिटी) यह कहता है कि जो जितना भूखा, बीमार या अपराधी होगा, वही अधिक कीमत देगा. और जैसे जैसे यह भूख (डिमांड)कम होगी, बाज़ार में मूल्य गिरेंगे और आर्थिक विकास की दर गिरेगी. केवल पेट भरने या भूख मिटने से कोई संतुष्ट नहीं होता, संतुष्ट तभी हुआ जा सकता है, जब प्रकृति (मूल कारण ) के चक्र का ज्ञान हो. किसान या साहित्यकार या संत सदैव ही संतुष्ट होते हैं क्योंकि वे साक्षात प्रकृति को जानते हैं, और उनका जीवन धन या व्यापार पर निर्भर नहीं होता. वे निर्धन तो हो सकते हैं किन्तु दरिद्र नहीं. जल का अध्यात्म पेट की भूख को मिटा कर,दरिद्रता के कारण को दूर करता है. याद रहे, भूखे और दरिद्र (असंतुष्ट) ही बाज़ार की शक्ति हैं. भारतीय ग्रंथों में धन हीन व्यक्ति को दरिद्र कभी नहीं कहते, बल्कि असंतुष्ट और असंवेदनशील व्यक्ति को दरिद्र कहते हैं भले ही वह दिखने में अरबपति ही हो. आर्थिक विकास की गलत समझ ही विश्व विनाश का कारण है.
एक कहावत है कि एक समूचा, उसके टुकड़े टुकड़े के जोड़ से कहीं बड़ा होता है. एक कार की कीमत, उसके पुर्जों को अलग अलग कर बेचने से नहीं निकाला जा सकता. सभी के अलग अलग बाथ-रूम के जोड़, एक नदी या तालाब का महत्व से हमेशा कम ही होगी. बाथ-रूम का जल, गंगा मैया नहीं है, उसे खरीदा हुआ जल कहते हैं जबकि माँ खरीदी हुयी नहीं होती. जल के बाजारीकरण के कारण, नदियों का अध्यात्मिक (माँ का) स्वरुप अब नहीं रहा जिस पर पशु, पक्षी, वृक्ष, मनुष्य सभी निर्भर हैं, और जहाँ जल का कोई खरीद या मूल्यांकन नहीं होता और कभी कमी नहीं हो सकती. जल के इस सार्वजनिक स्वरुप के दर्शन के लिए ही भारत के परपरागत त्योहारों या विशेष तिथियों को नदियों में स्नान करने का आध्यात्मिक महत्व है. जल की इस सार्वजनिक और आध्यत्मिक श्रृद्धा के कारण, भारतीय समाज में विघटन और विरोध नहीं हो सका. हमें यह सोचना चाहिए कि कैसे जल की भावना हर व्यक्ति को जोड़े, न कि उसे एक उपभोक्ता वस्तु समझ कर समाज को तोडे. भारतीय कल्चर (सार्वजनिक)और बाथ-रूम कल्चर (बाज़ार) भिन्न भिन्न हैं. भारतीय सभ्यता में राष्ट्रपति या शासक के निवास, और ऋषियों के आश्रम नदियों के तट पर होते थे. मोहन दास गाँधी जो आज के भारतीय शासकों के धर्म-संकट (जिसे न अपना सकते, और न भूल सकते ) हैं, वे साबरमती नदी के तट पर रहते थे. गाँधी को महात्मा कह कर, उनसे अलग भागने की जरूरत नहीं है. यदि यह परंपरा लुप्त न होती, और भारत के शासक दिल्ली के यमुना तट पर निवास करते और यमुना में रोज प्रातः स्नान करते, तो किसी की हिम्मत उसे प्रदूषित करने की न होती. लेकिन शासक, अब बाथ-रूम पर करोडो रूपये खर्च करते हैं, और इस तरह पारंपरिक सार्वजानिक सम्पदा और धर्म का आचरण दूषित हो गयी.
जल को सिर्फ एक रसायन या वैज्ञानिक तत्व समझना भूल है. जिन्हें हम वैज्ञानिक कहते हैं, वे इतने मासूम नहीं होते जैसे दिखते हैं. वे दक्ष (कुशल, शक्तिशाली ) तो हैं किन्तु शिव (संवेदनशील) नहीं. भारतीय ग्रंथो में दक्ष व्यक्तियों को बकरे का मुख लगा दिखाया जाता है क्योंकि अंहकार के कारण, उसके मनुष्य सिर को काटना पड़ा था. उनकी कुटिलता उनके अध्यात्म के नष्ट होने से पैदा होती है. कचहरी में काले कपडे में वकील घूमते देखे जाते हैं, लोग़ उनको उनके कपडे से जानते हैं उनके चेहरे से नहीं. महाभारत के धृत-राष्ट्र की तरह वकील भी अँधा नहीं होता बल्कि उसने अपने आँखों पर काली पट्टी बांध रखी है. वह प्रमाण से बंधा है, यदि प्रमाण न हों तो वह सही बात को भी नहीं मानेगा. वैज्ञानिक भी एक वकील हैं और भयानक तर्क करते हैं. कालांतर में उनका हर तर्क और ज्ञान मिथ्या पाया जाता है. जिस तरह, वकील निस्वार्थ नहीं होता, वैज्ञानिक भी निस्वार्थ नहीं होता. इस आर्थिक रहस्य के कारण, वकीलों से कभी अपराध कम नहीं किये जा सकते, और वैज्ञानिक से कभी उद्योग कम नहीं हो सकते. उद्योग और अपराध का चोली दामन का साथ रहता ही है. बाज़ार के अर्थ शास्त्र और भौतिक विज्ञान की मिली जुली सोच से जल की इस विपत्ति का निदान नहीं हो सकता. एक सच्चे वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्ताइन ने यह कहा है कि परिस्थितियों को पैदा करने वाली परिस्थितियों से उसका इलाज नहीं निकलता. विश्व में जल की विपत्ति तभी समाप्त हो सकती है जब प्रत्येक मनुष्य में जल के सर्वव्यापी, पूर्ण आध्यात्मिक स्वरुप का ज्ञान होगा, और जल के प्राकृतिक श्रोत और नदियों पर किसी व्यक्ति, बाज़ार, सरकार या किसी संगठन का अधिकार नहीं होगा.
वैज्ञानिक अपना कर्त्तव्य भूल गए हैं. एक अमेरिकी दार्शनिक गालब्रेथ, जो दुर्भाग्य से अर्थशास्त्री था और जो भारत में राजदूत बन कर आया था, यह कह चुका है कि जहाँ सचरित्र वैज्ञानिक होंगे, आर्थिक विकास की सम्भावना नहीं हो सकती. आर्थिक सफलता, दरिद्रता, भूख और मूल्य वृद्धि का सूचक है, और वैज्ञानिक सफलता द्वारा प्राकृतिक शक्तियों और ज्ञान के कारण दरिद्रता हो ही नहीं सकती. जीने की कला और प्रकृति से प्रेम ही उद्योग और बाज़ार के चकाचौंध की भूख की दवा है. भारत में जल की विपत्ति, यहाँ के लोगों में वैज्ञानिक और अध्यात्मिक सोच की कमी से हुयी है.
प्रकृति द्वारा जल का वितरण वर्षा, कुएं, या तालाब या नदी से होता है. इन स्थानों का प्रदूषण से बचाना हर एक व्यक्ति का कार्य है. जल की मात्रा जल के दुरूपयोग से कम होती है, उसके सदुपयोग से नहीं. एक सामाजिक व्यवस्था होनी चाहिए कि कुए या तालाब सार्वजानिक हों, व्यक्तिगत या संगठन के द्वारा न हों. जल को लेने का तरीका सभ्यता पूर्ण हो, जैसे माँ से बच्चे दूध लेते हैं, इस लिए मोटर या बिजली से चलने वाले उपकरण से जल न निकाला जाय. इस तरह, लोगों को शारीरिक श्रम उतना कम होगा जितना जल स्तर ऊपर होगा. यह स्वतः नियंत्रण है. कुए और तालाब की सामाजिक प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की जाय और विवाह, संतान के जन्म और मृत्यु पर कुएं की सफाई और उसकी मरम्मत हो. यह भारतीय परम्पराए, अब लुप्त हो गयीं हैं. कारण और उसके निदान बहुत हो सकते हैं किन्तु कारणों के कारण और उसके मूल कारण की खोज करने से व्यवस्था की नयी सोच मिलती है. यह परिकल्पना आदिम नहीं है बल्कि भविष्य की जरूरत है. जल का कोई अन्य प्रबंध, जल की कमी को बढायेगा और युद्ध का कारण बनेगा. शिव के मष्तिष्क में जल की तरह सर्प भी है जो मृत्यु का प्रतीक है. अर्थात, जल के महत्व को न समझने वालों के लिए मृत्यु श्रेय है. गंगा नदी या हिम श्रोत के सूखने या गर्मी के बढ़ने से क्या कम मृत्यु होगी? बिजली, पर्यटन और उद्योग बेचने के लालच का फल है कि भारत के पर्वतीय क्षेत्र जैसे नैनीताल, जो पहिले बिना किसी प्रयत्न के ठंडा रहता था, वहां अब एयर कंडिशनर की जरूरत होने लगी है. वृक्ष और हरियाली का स्थान कंक्रीट के महलों ने ले लिया है, और मूल निवासी असहाय रह इस विकास को देख रहे हैं. जल का व्यावसायिक लाभ लेने वाले क्या पर्वतीय वातावरण के इस हानि और स्वाभाविक व्यवहार की गिरावट की क्षतिपूर्ति कर सकते हैं? बढती गर्मी से बचाव के लिए एयर कन्डीशन, बीमारी और मृत्यु से बचाव के लिए दवाई और अस्पताल का व्यवसाय, बढ़ते अपराध से बचाव के लिए सरकार और न्याय व्यवस्था के प्रकोप से किसको लाभ होगा?
एक कहावत है कि ठंढ से बचने के लिए कोई अपना घर नहीं जला देता. जबकि आर्थिक विकास को ठंढ, घर उजाड़ देने, या जला देने से ही मिलती है. पर्वतीय क्षेत्र का विकास एक उदाहरण है. जो लोग घर में खाना बनाने, सर्दी से बचने, और भवन निर्माण के लिए जंगल से लकडी लाते थे, और उनका यह सम्बन्ध पुरातन था, किन्तु उसे अब गैर-कानूनी माना जाता है. वे निवासी पहिले वृक्षों की पूजा, देख रेख, और उनकी वंश वृद्धि करते थे और उनका यह पारंपरिक सम्बन्ध धर्म कहलाता था. जंगलों को सरकारी संपत्ति घोषित कर वन विभाग ने आर्थिक विकास का एक नया प्रयोग शुरू किया. जंगलों के लकडी को बेचने के लिए बोली लगने लगी और दूर के शहरों में रहने वाले, उन जंगलों को काटने आ गए. स्वाभाविक है, पर्वतीय निवासी पेड़ तो उगा सकते हैं, किन्तु पैसे नहीं. फल स्वरुप, पर्वतीय निवासियों को कालांतर में, लकडी काटने और माल ढोने का मजदूर बना दिया और धन ने उनके एक-जुटता के बीच, एक दरार पैदा कर दी. उनके जंगलों से लकडी काटने और उपयोग पर पाबदी लग गयी. लकडी काटने वालों को सजा होने लगी, और उन्हें चोर और अपराधी माना गया. बोली लगा कर, आरे मशीन से जंगल काटना कानूनी जुर्म नहीं है, किन्तु घर बनाने, चूल्हे के लिए, पशुओं के चारे के लिए जंगल के उपयोग को चोरी या अपराध माना गया. एक कहावत है कि एक महारानी ने यह आदेश दिया कि यदि रोटी की कमी हो, तो जनता केक क्यों नहीं खाती? इस कहावत को ध्यान रख, सरकार ने कृपा कर, उन्हें गैस के चूल्हे, रिश्वत खा कर, और ऊंचे मूल्य पर, उपलब्ध कराये. आज पर्वतों में, रेगिस्तान से आये हजारों किलोमीटर से आयात की गयी गैस से खाना बनाना सिखाया गया है. इस तरह, गैस को खरीदने के लिए पैसा कमाना उनकी नयी मजबूरी बनी और यह परतंत्रता आर्थिक विकास कहलाया. आर्थिक विषय ने, पर्वतीय समाज को ऊर्जा के पारंपरिक स्वावलंबन और प्राकृतिक पुनर्जन्म के श्रोत से अलग कर दिया. यह नव-जीवन एक धर्म-संकट भी बन गया, और अब वृक्षों और पर्वतीय निवासी के बीच का धर्म, केवल अन्धविश्वास और कर्मकांड, और सड़क पर चिपकाए गए वन विभाग के उपदेशों तक सीमित है. मिट्टी, जो जीवन के आधार है, को एक निर्जीव किन्तु मूल्यवान ईंट बनाने में पांच मिनट से अधिक समय नहीं लगता किन्तु उसी ईंट को मिट्टी बनाने में हजारों वर्ष लगते हैं. जलने के लिए जल नहीं चाहिए. आर्थिक संताप की भट्टी में,मनुष्य का स्वभाव इसी तरह बदल जाता है. आध्यात्मिक, धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक सभी प्रेम के बंधन टूट जाते हैं, और मनुष्य निर्जीव हो, आत्मनियंत्रण खो देता है. उनके स्वभाव में यह परिवर्तन साफ देखा जा सकता है. अब यह कहावत समझना आसान है. अर्थात, जंगलों के व्यवसायीकरण और पर्वतीय निवासियों के धर्म नष्ट होने से ठंढ तो समाप्त हो गयी किन्तु घर जल गया. यही आर्थिक संताप है, और जल की विपत्ति उद्योग और व्यवसाय का एक नया खेल.
कृष्ण गोपाल
qualitymeter@gmail.com
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4 comments:
ब्लॉग जगत में आपका स्वागत है.
हिंदी भाषा को इन्टरनेट जगत मे लोकप्रिय करने के लिए आपका साधुवाद |
मुआफ़ी पहले चाह लूं।
दृष्टिकोण थोडा सा हट कर तो लगा, और चिंतन में नयापन भी।
पर दो नावों की सवारी से अंततः घालमेल ही चित्त में बचा रह जाता है।
कोई एक पक्ष चुनलें, आप एक अच्छे प्रवक्ता हैं, साधुवाद।
narayan narayan
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