जेम्स एलेन की प्रस्तुति
जेम्स एलेन द्वारा सौ वर्ष पूर्व लिखित यह "ध्यानस्थ मन", दुनिया भर में लाखों व्यक्तियों का प्रेरणा- श्रोत बन उनके आत्मिक विकास को विशेष रूप से प्रभावित करता रहा है. नार्मन विन्सेंट पेले, आर्ल नाइतंगल, डेनिस वेतले, और अन्थोनी राबिन्स जैसे तत्कालीन लेखक और विचारक उनमें शामिल हैं जो कि इस पुस्तक से प्रेरित हैं.
"ध्यानस्थ मन" से लिए गए शब्द .....
"मन, जब तक अपने को बाहरी परिस्थितियों से निर्मित मानता है, वह विचलित रहता है; किन्तु जब वह यह जान जाता है कि वह स्वयं में ही सृष्टि के बीज और भूमि का नियंत्रक है और वही उसका कारण है, जिससे कालांतर में सारा संसार भौतिक हो उठता है, तब अपने इस स्वभाव को पुनः प्राप्त कर, वह स्वतंत्र होता है.
मन में गिरे हुए या रोपे गए विचारों के बीज के जड़ को जब फैलने दिया जाता हैं, तब वह बीज अपने आप ही पौधा बन, परिस्थितियों और अवसर का लाभ लेकर फलित होता है. इस तरह, अच्छे विचार, अच्छे फल, और बुरे विचार बुरे फल देते हैं."
प्रार्थना [प्रथम शब्द]
यह छोटी सी प्रस्तुति जो मेरे ध्यान और अनुभव का फल है, विचार की उन असीमित शक्तियों के व्याख्या के लिए नहीं है जो पहिले से ही बहुत लिखा जा चुका है. यह एक सहायता भर है न कि ज्ञान के विस्तार का प्रयत्न. इसका लक्ष्य है कि लोगों को इस सत्य की खोज और उसके अनुभव, कि वे स्वयं ही अपने निर्माता हैं, के लिए प्रोत्साहित किया जाय.
अपने ही चुने हुए विचारों के प्रोत्साहन से, मन एक जुलाहे की तरह इन धागों से इस शरीर के लिए उसका चरित्र, नाम का एक आंतरिक कपडा बुनता है और बाहर के लिए, परिस्थितियों के नाम से एक अलग कपडा बुनता है. इन कपडों के होते हुए भी, अज्ञानता और दर्द सहने वाले, इस सत्य को जान, यदि चाहें, तो अपने लिए आह्लाद और प्रसन्नता का चुनाव कर सकते हैं.
असाधारण राजा का चरित्र भी असाधारण होता है, और इस असाधारण चरित्र के कवच के कारण, उन्हें कभी डर नहीं लग सकता.
जेम्स एलेन
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अध्याय 1: विचार और चरित्र
"जैसा एक मनुष्य का मन सोचता है, वही वह बन जाता जाता है" यह अंतर्ज्ञान, व्यक्ति के समूचे अस्तित्व को ही नहीं बल्कि, इतना ... व्यापक है कि उससे हर एक मानसिक दशा .. और जीवन की सभी परिस्थितियों को, समझा सकता है. मनुष्य वस्तुतः वही है जो उसे उसकी सोच बनाती है; और चरित्र, उसके सभी विचारों का एक जोड़ है.
जैसे कोई भी पौधा जो दिखता है, बिना बीज के नहीं हो सकता इसी तरह मनुष्य का हर एक प्रयत्न, किसी न किसी विचार के छुपे हुए बीज के बिना संभव नहीं है. यह दोनों अवस्था में बराबर है चाहे अचानक या बिना सोचे हुए हुआ हो, या जान बूझ कर किये गए हों.
कर्म, विचारों के बीज से बना एक पौध है, और प्रसन्नता या रोग उनके ही फल. इस लिए, मनुष्य को प्राप्त होने वाला मीठा या कडुआ फल, उसके अपने ही बाग़ की खेती से हैं.
मन के विचार हमें बनाते हैं. जो भी हम हैं, विचारों द्वारा पकाए गए, और निर्मित.
यदि विचारों में शैतानी है तो दर्द तो होगा, जैसे पहिये आगे हों और बैल उस गाडी को पीछे से धकेलता हो.
जो विचारों की शुद्धता के लिए प्रयत्नशील है, निश्चित है, कि आत्मिक आनंद, परछाई की तरह उसका पीछा नहीं छोड़ता.
मनुष्य के विकास को निर्धारित करने वाला, एक शाश्वत सिद्धांत है; कोई आकस्मिक चमत्कार नहीं ! कारण और उसके प्रभाव की परस्पर निर्भरता उतनी ही सत्य और शाश्वत, मन के विचारों में होती है जितना कि साधारण दिखने वाले घटनाओं या पदार्थों में. ध्यान रहे, एक श्रेष्ठ और ईश्वरीय चरित्र को पाना किसी भाग्य या कृपा का फल नहीं होता; बल्कि यह निरंतर किये गए सही सोच का एक अवश्यम्भावी परिणाम, और ईश्वर के शुद्ध विचारों के साथ प्रेम पूर्वक रहने का प्रभाव है. एक आदर्श और शुद्ध चरित्र, विचारों की इस खेती में लगी निरंतर एकाग्रता और मेहनत का फल है.
मनुष्य ही है जो अपने को बनाता और बिगाड़ता है. अपने ही विचारों से बने अस्त्रों से वह आत्म हत्या करता है और उसके वही साधन हैं जिससे वह आनंद, सहनशीलता और शांति प्रदायक स्वर्गीय लोकों का निर्माण भी करता है. विचारों के सही चुनाव और सात्विक प्रयोग द्वारा ही उसे उत्तम दैवीय पद प्राप्त होता है, और विचारों के दुरूपयोग और गलत प्रयोग से, वह शैतान जैसा गिर भी जाता है. इन दोनों सिरों के बीच सारे चरित्र स्थित हैं, और हर-एक को बनाने वाला, और उनका मालिक, कोई न कोई मनुष्य ही है.
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