Sunday, August 24, 2008

अर्थ शास्त्र 2

उपयोगिता का मतलब उसकी मांग से है। Marginal utility principle

बाज़ार में वस्तु का मूल्य इस पर अधिक निर्भर होता है कि कौन कितना भूखा है न कि उस वस्तु की उपयोगिता। भूखा व्यक्ति ही आय का श्रोत है। जहाँ भूखे लोग ज्यादा हैं, आय की मात्रा भी ज्यादा होगी। दरअसल, बाज़ार की व्यवस्था, भूखे व्यक्ति की ही देन है।

  • एक धनी व्यक्ति यात्रा कर रहा था। उसे भूख लगी। उसे एक अन्य व्यक्ति मिला जिसके पास चार रोटी थी। भूखे व्यक्ति ने पहली रोटी के लिए, चार रूपये दिए। किंतु, रोटी खाने के बाद उसकी भूख कम हो गई। और इसलिए, दूसरी रोटी के लिए उसने तीन रूपये का प्रस्ताव ही रखा। इस तरह तीसरी रोटी केवल दो रूपये में ही बिक सकी। उसके बाद जब उसकी भूख नहीं रही, तो रोटी का मूल्य भी नही रहा।
  • एक व्यक्ति की नौकरी नए शहर में लगी। उसे रहने के लिए घर चाहिए। घर को तुंरत खरीदने के लिए उस व्यक्ति को ५० लाख रूपये देने पड़ेंगे। किंतु यदि दो वर्ष का इंतज़ार करें तो उसे वही घर २० लाख रूपये में मिल सकता है। यदि जमीन खरीद कर स्वयं घर बनवाना हो, तो उसकी कीमत १० लाख रूपये होगी।

आवश्यकता आविष्कार की जननी है। असुरक्षा भूख की जननी है।

मांग का कारण उसकी असुरक्षा है, आवश्यकता या उपयोगिता नहीं। मालिक होना मांग है। हीरे की कीमत वही लगाते हैं जो उसे खर्रिदना चाहते हैं क्योंकि उसका उपयोग आर्थिक सुरक्षा हैं। हीरे की आवश्यकता देखने की है, जबकि मालिक होने से मांग बढ़ती है । मांग का कोई अंत नहीं है, किंतु आवश्यकता पूरी हो सकती है। मांग के न पूरे होने का डर ही लालच है। इस से नियंत्रण की भावना पैदा होती है। कैपिटल मार्केट एक अनंत मांग का सिद्धांत है, रिटेल मार्केट आवश्यकता या उपयोगिता का सिद्धांत है। कैपिटल मार्केट के कारण रिटेल मार्केट पर बुरा असर पड़ता है, किंतु रिटेल मार्केट से काप्तल मार्केट पैर बुरा असर नहीं पड़ता।

रोटी खर्रिदने वाले ने रोटी की कीमत अपनी आवश्यकता के पूरे होने पर कम कर दी। किंतु खरीदार के असुरक्षा के कारण रोटी की कीमत आवश्यकता पूर्ति के बाद भी कम नहीं होगी। जो फर्क असुरक्षा और uप्योगिता में है वाही मांग और आवशकता में है। लाच

जो हमें चाहिए उसका पता नहीं किंतु जो नहीं मिल रहा उसकी चिंता है। असुरक्षा की भूख, आवश्यकता को भुला देती है। भूखे लोग उपयोगिता का अर्थ समझ नहीं सकते इसलिए धन उनकी दरिद्रता का समाधान नहीं है।

  • हीरा पानी से महंगा क्यों है। इसलिए क्योंकि हीरा कम है, लोगों में उसकी मांग अधिक है। उसकी कीमत अधिक है। पानी की उपयोगिता जो निर्विवाद है, किंतु उसका उसका मूल्य तब तक नहीं हो सकता जब तक पानी की कमी नहीं हो जाए। बाज़ार भूखों से चलता है, इसलिए कमी पैदा करना ही व्यवसाय है।

पैसे की भूख अनंत है (Money is only commodity with insatiable demand)

जो जितना सुरक्षित है, उसकी असुरक्षा उतनी ही होगी. धन या रुपया , आर्थिक सुरक्षा / भविष्य- निधि का एक भरोसा है. धन की यह सुरक्षा जितनी होगी, असुरक्षा भी बढेगी, और इस लिए धन की मांग कभी भी पूरी नहीं हो सकती.

Market is a zero sum game. Profit of one is filled by loss of others.

. काल या भविष्य का डर और धन कि इच्छा ही, एक भर-पेट और धनी मनुष्य को भूखा और दरिद्र ( असंतुष्ट) बनाने में सफल है. मनुष्य में धन की चाहत का न होना, उसे कर्तव्य में स्थिर करती है, जिससे वह काल या भविष्य की सुरक्षा के लिए धन पर निर्भर नहीं होता. संतुष्ट और सृजनात्मक व्यक्ति, धन को गणित का अंक और प्रयोग समझते हैं, आर्थिक सुरक्षा नहीं.

Saturday, August 23, 2008

अर्थ शास्त्र 1

अर्थ शास्त्र सूत्र
अर्थ economic = परस्पर स्वभाव की समझ। अर्थात, मनुष्य को प्रकृति में स्थित प्राणियों और पदार्थ के गुणों को समझ कर जीवन निर्वाह और व्यवहार (interaction, give-take) करने का ज्ञान ।

शास्त्र system = शस्त्र के उपयोग के ज्ञान की साधना को शास्त्र कहते हैं। शास्त्र के उपयोग से 'विषय (subject, empirical information)' में से अज्ञान नष्ट कर उसके शुद्धिकरण द्वारा 'ज्ञान (knowledge)' की प्राप्ति की जाती है। अज्ञान के नष्ट होने की इस क्रिया से ज्ञान की शुद्धता बढती है और अंततः सत्य (truth) की प्राप्ति, ज्ञान की शुद्धता की पराकाष्ठा है। शास्त्र, ध्यान कि सही दिशा और स्थिति हेतु मार्ग/दिशा दर्शक उपकरण हैं। शास्त्र एक दिशा सूचक उपकरण हैं जिसके प्रयोग से अज्ञान से ज्ञान और ज्ञान से सत्य की यात्रा की जा सकती हैं। नाम, रूप या पद या अधिकार के तात्कालिक मिश्रण से मनुष्य को वास्तविकता का भ्रम होता हैं। यही विषय हैं। विषय, विष की तरह भूख (demand/expectation), बेचैनी (anexiety), नियंत्रण और रोग (disease) पैदा करता है। जबकि ज्ञान, सनातन या हमेशा रहता हैं इसलिए उसके पात्र एतिहासिक नहीं हो सकते अर्थात पात्रों का एक नाम या रूप या पद नहीं होता। ज्ञान में वास्तविकता को समझने हेतु तर्क द्वारा बनाए गए सांकेतिक भाषा का ही प्रयोग होता हैं। ज्ञान ही निर्भयता, संतोष, भरोसे (preditability), विश्वास, कला और उत्साह का कारण है। और, सत्य का अनुभव बिना हिचक परित्याग और प्रेम है जहाँ अलगाव का भाव नहीं आता। उदहारण के लिए, बाज़ार या युद्ध, विषय के भयानक प्रयोग हैं। परिवार और समाज का निर्माण या मित्रों का सम्बन्ध स्वभाव की परस्पर स्वतंत्रता के ज्ञान से किया जाता है। और, प्रेम तथा निर्वाण, सत्य का प्रयोग है जैसे दूध मुहे बच्चे और उसकी माँ का सम्बन्ध।

अर्थ शास्त्र economic system/ economics = इस तरह का व्यवहार ( interaction) या प्रयोग जिससे प्रत्येक मनुष्य प्रकृति में स्थित अन्य प्राणियों व् पदार्थ के बारे में जान -समझ कर, उनका या अपना स्वभाव बिना गिराए, अपने अपने जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। अपने या दूसरों के स्वभाव के महत्व का उद्देश्य नष्ट होने से, लोग क्रूरता और तोड़-फोड़ कर सीखते हैं किंतु अलग रह कर आत्म नियंत्रण और ध्यान से कभी नही सोचते। इस तरह स्वभाव के नष्ट होते ही भूख (demand), अनिश्चितता (anexiety), अंहकार ( authority, power), तुलना (comparison), प्रतिस्प्रधा (competition), नियंत्रण की इच्छा (control), विरोध (conflict) और रोग (death, disease) बढ़ते हैं, और सह-अस्तित्व, उत्साह, प्रसन्नता और शान्ति कायम नहीं रह सकती।

इस विश्व में अर्थ शास्त्र के सही ज्ञान की नितांत आवश्यकता है, जिससे सभी प्राणी अपने अपने जीवन लक्ष्य को स्वयं के बल पर प्राप्त कर सकें, और क्रूरता से सीखने की विधि द्वारा विश्व का विनाश न हो। अर्थ-शास्त्र 'विषय' तब हो जाता है, जब सीखने का तरीका हिंसक, भौतिक या विनाशकारी होता है, और जिसके प्रभाव से व्यक्ति अपनी संज्ञा या स्वभाव खो दे। और यदि, स्वभाव गिराए बिना स्वान्तः सुखाय कर्म होते हों जिस से स्वभाव में उन्नति होता हो, तो वह अर्थ-शास्त्र 'ज्ञान' है। अपने स्वभाव को गिरने से बचाने में लगातार सफलता को, वीरता कहते हैं। वीर वह है जो परतंत्र नहीं है। लालच, तुलना और प्रतिस्प्रधा उसे आकर्षित नहीं करते, और वह स्वभाव में स्थिर रह कर, स्वान्तः-सुखाय कार्य कर सकता है। विषय, विष के प्रभाव से, ज्ञान को नष्ट करता है, और भूख एवं असुरक्षा को लगातार बढाती है। जबकि शास्त्र द्वारा ज्ञान की शुद्धता से स्वभाव के अनुसार आत्म संतुष्टि में कार्य करने से उत्साह, प्रसन्नता और प्रेम बढ़ता है।

विषय information = विषय, देखे-सुने गए प्रमाण, तथ्य, या सूचना, नाम, रूप, या इतिहास से बना एक तात्कालिक भ्रान्ति चित्र (illusion) है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा। अर्थात, विषय का प्रभाव तीव्र किंतु अस्थायी होता है। जो विचार या व्यक्ति आज ठीक लगते हैं, वे हमेशा उसी तरह नहीं होंगे। उदाहरण के लिए, कोर्ट के रिकार्ड विषय हैं, जहाँ अपराधियों के नाम और धटना के तथ्य ठीक ठीक लिखे जाते हैं। इसी तरह, अखबार वाले, या इतिहासकार भी तथ्यों को ही लिखते हैं और वे लोगों को नाम से पहचानते हैं, या बनाये गए नाम से पहचान देना चाहते हैं। विषय अधिकार दे सकता है ज्ञान या योग्यता नहीं। बंटवारा, प्रतिस्प्रधा, वैमनस्य, विरोध, युद्ध, समझौता, और इलाज ही व्यवसाय और आय के श्रोत हैं। यदि अपराध या दुर्भाव न हों तो सरकार, या न्याय व्यवस्था में लगे लोग या तो बेरोजगार हो जायेंगे या इनकी प्रतिष्टा कम हो जायगी। विषयी समाज में सुरक्षा या भय का एक बड़ा व्यवसाय है और वहां जीवनोपयोगी कार्य की प्रतिष्ठा कम होती है। इसका प्रमाण है जापान जैसे देश में वकील नहीं मिलते, जबकि अमेरिका में वकील को प्रतिष्ठा मिलती है। इसीलिए अपराध, व्यभिचार, हिंसा और भोगवाद में अमेरिका जापान से बहुत आगे है। अमेरिका के पास संसाधन की कोई कमी नहीं है और फ़िर भी वह इस छोटे से देश जापान का कर्जदार है। जिस देश में हथियार (युद्ध), कानून (लडाई झगडा) और दवाइयाँ (बीमारी) इस्तेमाल अधिक होती हैं, आर्थिक विकास नहीं हो सकता। अर्थ शास्त्र में विषय का यही प्रभाव है।

ज्ञान knowledge = फिजिक्स में तथ्य, सूचना, या इतिहास नहीं होता। F को बल, V को गति g को गुरुत्व का अंक कहते हैं जो सांकेतिक (symbolic) हैं किंतु अवास्तविक (not unreal) नहीं। F, V और g सनातन हैं, और हर समय और हर कार्य में अलग अलग मात्रा में उपस्थित रहेंगे। जबकि विषयों में प्राप्त, विभिन्न नाम, रूप या कार्य दरअसल, तात्कालिक घटनाओं में इतिहास के पात्र भर हैं। अतः फिसिक्स, ज्ञान का एक उदाहरण है और इतिहास के पात्र एक विषय है। सांकेतिक किंतु सनातन वास्तविकता में उपस्थित ज्ञान से किसी भी विषय अर्थात तात्कालिक इतिहास को आसानी से समझा जा सकता है। एक किसान, वैज्ञानिक, कला कार या साहित्यकार की निर्भयता और स्वतंत्रता इसका प्रमाण है कि वे अधिकार प्राप्त (विषयी) व्यक्तियों जैसे वकील, जज, सरकारी अधिकारियों या इतिहासकारों (जो रिकार्ड बनाने और सँभालने में लगे रहते हैं) से स्वभाव में किस तरह भिन्न होते हैं।

zyan ya रचनात्मक कार्य का कोई नाम नहीं होता, उसका रूप भी नहीं होता। सृजन करने वाला उससे स्वभाव से पहिचानता है, उसके रूप, नाम या स्वाद से नहीं। फिसिक्स का उदाहरण है की कैसे ज्ञान एक प्रमेय या दर्शन (theory) है, जिस से किसी भी काल का पूर्वाभास हो सकता है जिसमें इतिहास, उसकी विभिन्न संभावनाओं में से कोई एक होता है। अज्ञात को ज्ञात करने की यह विधि आध्यात्मिक है। जैसे एक माँ का पुत्र या पुत्री से जुडाव। माँ की तरह ही, सृजन करने वाला व्यक्ति अपनी खोज या रचना पर कभी भी अधिकार नही जताता। फल पैदा करने वाले किसान से कोई यदि कोई फल मांगेगा तो वह उसे खुशी से दे देगा, किंतु फल बेचने वाला फल पर अधिकार समझ, उसे बिना पैसे लिए फल नहीं देगा। किसान या वैज्ञानिक या कलाकार का गरीब होना कोई रहस्य नहीं है, किंतु वे ज्ञान की सनातन सत्ता में रह, किसी भी तरह व्यवसायिओं या सरकारी अधिकारियों या वकील की तरह तंगदिल नहीं हो सकते। ज्ञान और विषय का यही भेद है।

सत्य truth = ज्ञान की प्राप्ति से समय/ काल का प्रभाव या तात्कालिक विषयों के भय से मुक्ति मिलती है, और स्वयं में विश्वास या भरोसा बनता है, जिसका आधार सनातन है। ज्ञान से, मनुष्य अपना और दूसरों का स्वभाव जान लेता है, और वह प्रचलित विषय जैसे तात्कालिक नाम, रूप, नियमों या अंहकार, से घबराता नहीं और न ही आकर्षित होता है। निश्चिंत हो, वह अपने लक्ष्य की दिशा में ही चलता है। किंतु, इसमें फ़िर भी, लक्ष्य और यात्री के बीच दूरी का भाव बना रहता है। जबकि सत्य वह स्थिति है जिसमें अपेक्षा करने को कुछ भी शेष नहीं रहता। इसमें ज्ञान (या सांकेतिक तत्त्व से बना सनातन वास्तविकता की समझ का वह उपकरण ), की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। सत्य का अनुभव होने पर, स्वभाव में अज्ञान समाप्त हो जाता है, और सभी प्राणियों को अपनी ही तरह समझ कर, उनके लिए प्रेम और परित्याग की भाव जागृत होता है। माँ अपने दूध-मुहें बच्चे से परस्पर प्रेम इसलिए कर पाती हैं कि माँ को, उसके स्वयं में और बच्चे में, कुछ भी अलग नहीं लगता। इसका अर्थ यह है कि सत्य में, सभी का दृष्टि-कोण एक ही हो जाता है, और इस तरह विरोध या भ्रम या हिंसा नहीं हो सकती। वह उसे प्यार भी करती है, उसके लिए जान भी दे देगी और बच्चे को शिक्षा हेतु दंड भी देती है। सत्य के आध्यात्मिक प्रभाव को, और प्रेम के इस सबंध को ज्ञान (तर्क, परीक्षा), या विषयों (इतिहास, तथ्य, नाम, रूप) से नहीं समझा जा सकता। गाँधी ने सत्य को अहिंसा के गुणों से पहिचाना। कृष्ण ने प्रेम और परित्याग की स्वतत्रता को सत्य का लक्षण कहा। श्री कृष्ण ने यह भी बताया की प्रेम के प्रभाव में ज्ञान की आवश्यकता स्वतः समाप्त हो जाती है क्योंकि एक दूसरे के बारे में जानना व देखना ही सम्भव नहीं होता क्योंकि दोनों एक दिशा में देखते हैं। यही योग है।