Tuesday, April 7, 2009

वर्ण और भाव

गुण (influence of nature) : तम (नियंत्रण) : रज (byproduct, कर्म फल) : सत (मौलिक स्वभाव), निर्गुण (सत्य)
कर्म (work): काम (consumerism and disease): अर्थ (understanding, by learning, experiments outside of self) : धर्म (original research, self knowledge): मोक्ष (liberation)
भाव (motivation,): क्षति पूर्ति (compensation, unequal agreement, making up for loss of liberty) : मूल्य (voluntary agreement between two equals, price) : दान (investment ^close approvimation in english) : भिक्षा ^no english word found
वर्ण (aptitude, trait): शूद्र (insecure, uncomprinising owner, bonded to a desire of control): वैश्य (exchange, in business of give and take) : क्षत्रिय (freely giving, satisfied in independent nature) : ब्राह्मण (almighty)

स्वभाव में परिवर्तन बाहरी कारणों से नही हो सकता। एक नीबू के बीज से कितना भी खाद, पानी डालें, आम का पेड़ नही बनाया जा सकता। नीबू का अपना स्वभाव है, प्रकृति उसके विकास की सम्भावना को प्रभावित कर सकती है, किंतु उसके स्वभाव को नहीं । नीबू का बीज अपनी सारी संभावनाओं को ले कर ही आता है । लेकिन नीबू यदि प्रकृति के प्रभाव से अपने को बचा सके, तो वह आम भी बन सकता है। अर्थात हर पदार्थ और प्राणी में, स्वभाव का परिवर्तन स्वेच्छा से सम्भव है। प्राणी के बीज में ही निहित इस एक सम्भावना को उसका धर्म कहते हैं। धर्म, ज्ञान द्वारा स्वभाव में परिवर्तन लाने का मान चित्र है। अर्थात, स्वभाव में शुद्धता लाने के मार्ग का ज्ञान, (जो प्रकृति के गतिशील प्रभाव से स्वभाव की रक्षा करता है,) ही धर्म है। धर्म एक शास्त्र या मार्ग दर्शक ज्ञान है। धर्म का ज्ञान हर जीव को होता है जिसे किसी से सीखने की जरूरत नहीं होती। स्थिर मन से सोचने पर, धर्म के इस ज्ञान का पता स्वतः चलता है। और इसे जानने के बाद, यदि जीव इस पर चलना चाहे, और अपने स्वभाव को बदलने का इच्छुक होगा, तभी वह इस पथ पर चलेगा, जिसे कर्म कहते हैं। कर्म क्रियात्मक है, जबकि धर्म एक शाश्वत ज्ञान है। यदि किसी प्राणी या व्यक्ति का कार्य, धर्म के विपरीत है तो उसे अधोगति, और यदि उसके दिशा में है तो उस कर्म को सद- गति या शास्त्रोक्त कर्म कहते हैं। धर्म मार्ग या शास्त्र के प्रति अपनी श्रृद्धा (पात्रता या योग्यता ) और विश्वास का दृढ होना ही भक्ति है।

ज्ञान, भक्ति और कर्म का प्रसंग मिलकर ही योग बनता है। इस्पात बनाते समय, खनिज को भौतिक शास्त्र की प्रक्रिया से शुद्ध किया जाता है। अंग्रेजी में शास्त्र को सिस्टम कहते हैं, जैसे भौतिक शास्त्र या फिसिकल सिस्टम या फिसिकल साइंसेस, या फिसिक्स। शास्त्र ही यज्ञ की विधि है। शास्त्र, सिस्टम या साइंस या विज्ञान एक ही शब्द हैं। विज्ञान, शास्त्र या सिस्टम तो काल से भी परे, अपने आप में ही सिद्ध है चाहे इसकी मनुष्यों के द्वारा इसकी खोज अब हुई हो या अभी तक खोज होना बाकी हो। या, इस्पात के बनाये जाने की उसको अभी जरूरत है, या नहीं। लेकिन इस्पात, भौतिक शास्त्र के ज्ञान (धर्म) और इच्छुक व्यक्तियों के कार्य (कर्म) के बिना नहीं बनाया जा सकता। इस्पात बनाने वाले का, भौतिक शास्त्र (धर्म) में श्रृद्धा और विश्वास ही, भक्ति है। कर्म (इस्पात बनाना), धर्म के मार्ग का ज्ञान (भौतिक शास्त्र) और भक्ति (श्रृद्धा और विश्वास या, ज्ञान पर कर्म की पकड़ ) एक दूसरे के पूरक हैं। खनिज के इस्पात बनने के विभिन्न् चरणों में, अर्थात कर्म की परिपक्वता के अनुसार उसका रंग और गुण बदलता रहता है, जिसे वर्ण कहते है। श्री कृष्ण ने कहा है चातुर्वर्ण (चारों रंग ) मया सृश्तिम (बनाये गए हैं) गुण कर्म (कार्य द्वारा विभिन्न गुण की प्राप्ति की पहिचान के लिए ) विभागशः। कर्म द्वारा गुण के क्रमशः बदलने को वर्ण या रंग से जाना जा सकता है।

वर्ण, व्यक्ति का रंग या उसकी चेष्टा को कहते है जो वर्तमान में उसके कर्म की धर्म के मार्ग पर स्थिति है। यदि चली गई दूरी छोटी या छुद्र है, उस वर्ण को शूद्र कहते है। शूद्र में ज्ञान के न होने से असुरक्षा होती है, इस लिए वह मालिक या पदवी के अंहकार से अपना परिचय देता है। वह हमेशा अपने को ही देखता है, जिसके लिए वह कठोर श्रम भी करता है। दासत्व, या नौकरी या जिन्हें कोई जिम्मेदारी दे दी गई है, वे लोग एक खूंटे से बंधे पशु की तरह होते हैं, जिन्हें पहिचान (award) देकर, और जीविका के लिए, क्षति-पूर्ति (compensation) पर निर्भर बना कर, उनका स्वभाव नष्ट किया जा चुका है। इन व्यक्तियों में निष्ठां के अंहकार की अधिकता के कारण, सोचने की शक्ति नहीं होती या उसे दबा दिया जाता है। इस तरह, ये, धर्म और स्वभाव की परवाह किए बिना, निष्ठा या पहिचान की रक्षा में निस्वार्थ युद्ध करते हैं। शूद्र वह है, जिनका हार-जीत लक्ष्य है, जो अंध विश्वासी है, और जो कभी समझौता नहीं कर सकते।

महाभारत में सूत पुत्र कर्ण, का चरित्र एक श्रेठ शूद्र का वर्ण है। आज्ञा पालन, नियंत्रण करने वाले या नियंत्रण में रहने वाले व्यक्ति जैसे, योद्धा, प्रतिनिधि, (अधिकृत किया गया) सरकारी अधिकारी, नौकरी करने वाला व्यक्ति, कैदी, या अपनी इज्ज़त की रक्षा स्वयं करने वाले क्रूर शासक इसके उदाहरण हैं। क्षति-पूर्ति ( वेतन, कर, आदि आर्थिक सुरक्षा) इनका हक़ है, क्योंकि ये लोग अपने स्वभाव की छोड़ कर एक निष्ठां से बाँध दिए गए हैं। और इन्हे, अपने मन के विरुद्ध कार्य (श्रम ) करने के बदले, इनकी जीविका (भूखे न रहने) और पहिचान / अंहकार के लिए नाम आवश्यक है। कर्ण, अपने कर्म से क्षत्रिय बने, और उनका यह कर्म अपने रक्षा का त्याग था। जब तक कर्ण को अपना ज्ञान नहीं था तब तक वह शूद्र था, और पहचान और जीविका के लिए दुर्योधन पर निर्भर था। स्व-धर्म के ज्ञान प्राप्ति के बाद, जब उसने अपना रक्षा (कवच और कुंडल) दान में दे दिया तब वह, क्षत्रिय वर्ण का बन गया।

जो व्यक्ति अपने अंहकार या नाम या पहिचान की चिंता नही करता है, वह शूद्र नही होता। वह न तो स्वयं को और न ही दूसरों को बाँध सकता है अर्थात नियंत्रण जिसे प्रिय नहीं। उस व्यक्ति का वर्ण वैश्य कहलाता है। वैश्य का अर्थ है जो विषयी है। जो ज्ञान मौलिक नहीं है, अर्थात वह सीखा गया है, या शरीर में बने छिद्रों से अन्दर आता है, उसे विषय (विष युक्त) कहते हैं। सीखने वाला, उत्सुक व्यक्ति, प्रतिदिन नए नए स्वाद के लिए प्रयोग करना चाहता है, और उसे कभी भी एक विषय या व्यवसाय से बंधे रहना अच्छा नही लगता। वैश्य, नए अनुभव की चाहत में शत्रु से युद्ध करने के बजाय उनसे समझौता करने, और लेने देने में निपुण होता है। इस तरह वह शूद्रों के हार - जीत के बजाये लाभ -हानि के प्रति सतर्क रहता है। एक वैश्य बुद्धिमान और पेशेवर होता है, और स्वार्थ इनके चरित्र की विशेषता है। उसकी निष्ठां विश्वास नहीं सिखाती, और वह निहित स्वार्थ के कारण विश्वासपात्र तो हो ही नहीं सकता। वैश्या या वैश्य से विश्वास का सम्बन्ध बनाना सदैव ही गैरकानूनी माना जाता रहा है, इसलिए किसी वकील, व्यवसायी या आडिटर या अन्य पेशेवर को अपने ग्राहक के सन्दर्भ में एक दूसरे से स्वतंत्रता का सिद्ध करना जरूरी है । वैश्य श्रम नहीं करता है, अर्थात अपने मन के विरुद्ध भय या बल पूर्वक कार्य नही करता बल्कि परिश्रम (अर्थात विशेष या अलग तरह से बुद्धि योग का श्रम) करता है।

उदाहरण के लिए, पुराने समय में योद्धा और क्रूर शासक, बल पूर्वक स्त्रियों का शोषण करते थे। बहुत स्त्रियों ने परदा करना सीख लिया, लेकिन जिन स्त्रियों ने सुन्दरता को अस्त्र बना कर, अपना व्यावसायिक कर्म कर, उनको अपने इशारे पर नचाया उन्हें वैश्य कहा गया। वैश्य शूद्र से श्रेष्ठ होता है। वैश्य बुद्धिमान होता है, और उसे शूद्र को जीतने के लिए बल की आवश्यकता नहीं होती। आज की बाज़ार की सभ्यता उन्ही वैश्य वर्ण का प्रतीक है। वैश्य कभी क्षति - पूर्ति (compensation) नहीं ले सकता, क्योंकि वह मूल्य (price) का अधिकारी है। मूल्य एक समझौता है जो दो विरोधियों के बीच तब होता है, जब एक दूसरे की ताकत की बराबरी जान कर, हार जीत के बजाय दोनों लेने देने पर तैयार होते हैं। शत्रु भावः का होना ही वैश्य का रक्षा कवच है। धन ही वैश्य की रक्षा करता है, इस लिए वैश्य को निर्धन रहना उचित नहीं। फ़िल्म की अभिनेत्रियाँ, अंहकार नहीं कर सकती, और उनकी निष्ठां उन गुणों के प्रति है जो उसे धन कमाने में सहायक हैं। धन (अर्थ या बुद्धि योग) के लिए ही वे सुन्दरता और अन्य आकर्षण का उपयोग करती हैं। वे अपनी जीविका के लिए क्षतिपूर्ति या वेतन पर निर्भर नहीं हैं। यदि वे निर्धन होंगी, तो उनको शोषण से कभी बचाया नहीं जा सकता। वे किसी संगठन के प्रतिनिधि या नियंत्रण के अधिकार, या अंहकार से पोषित या रक्षित नहीं हैं। इसी तरह भारत में लघु उद्योग करने वाले निर्धन व्यवसायी, भ्रष्ट सरकारी लोगों या अवांछित तत्वों के प्रायः शिकार बनते हैं। जबकि, बड़े उद्योगपतियों के पास सरकारी लोग बहुत तमीज से पेश आते हैं। वैश्य का स्थान स्वर्ग है जहाँ किसी सुख की कमी नही होती, जब तक धन उपलब्ध होगा। वैश्य मालिक नहीं होता वह सुख का उपभोग करता है। उदहारण के लिए होटल का मालिक शूद्र है क्योंकि उसे होटल के अपना होने की जिम्मेवारी, और उसकी रक्षा करने में सारा दिमाग लगाना पड़ता है, किंतु होटल में रहने वाले वैश्य हैं जो किसी मालिकाना जिम्मेवारी या अंहकार से बंधे नहीं हैं।

अर्जुन से श्री कृष्ण ने कहा यदि तुम युद्ध में असफल होते हो तब तुम्हें स्वर्ग मिलेगा और यदि सफल हो जाते हो तो मोक्ष मिलेगा। अर्जुन अपने कर्म की उस स्थिति में क्षत्रिय वर्ण का था इसलिए यदि उसकी अधो गति होती, तो वह वैश्य वर्ण के अनुसार स्वर्ग का अधिकारी तो था ही, और यदि वह ब्रह्मण बन जाता है, तो वह मोक्ष प्राप्त करेगा। क्षत्रिय वर्ण उन लोगों का है जो वैश्य नहीं हैं और जो शूद्र भी नहीं हैं। वे शूद्रों की भावः से न तो क्षति पूर्ति या वेतन या कर लेते हैं और न ही वैश्य भावः में मूल्य ही लेते हैं। मूल्य शत्रु भावः में किया गया एक बराबरी का समझौता है, किंतु क्षत्रिय समझौता नहीं कर सकता। शूद्र नियंत्रण में रह अपने मन के विरुद्ध कार्य करने का प्रतिफल या वेतन या क्षति पूर्ति प्राप्त करता हैं इसलिए क्षत्रिय उसका भी अधिकारी नहीं। क्षत्रिय, इसलिए दान लेता है। दान किसी उद्देश्य या संकल्प की पूर्ति के लिए क्षत्रिय स्वीकारता है, लेकिन वह समझौता नहीं हो सकता। धर्म पत्नी और धर्म पति एक क्षत्रिय व्यवस्था है, यह विश्वास का सम्बन्ध है, जिसमें हर एक दूसरे को अधिक और श्रेष्ठतम रचना प्रस्तुत करना चाहता है। वैश्या या वैश्य इसके विपरीत अपने निहित स्वार्थ के कारण विश्वास का सम्बन्ध नहीं बना सकता, इसलिए उनसे व्यक्तिगत सम्बन्ध अपवित्र या गैर कानूनी माना जाता है और उनका स्वतंत्र होना जरूरी है, क्योंकि वे समझौते से ही जुड़ते हैं। अनुभव से जब, चरित्र के विकास से डर या असुरक्षा समाप्त हो जाता है, तब वैश्य क्षत्रिय में बदला जाता है. बिल गेट्स का एक व्यवसायी बुद्धि को त्याग कर समाज के हित में काम करना, उसके चरित्र में बदलाव का सूचक है. भारत में सनातन समृध्द समाज, व्यावसायिक सगठन में बदले जा रहे हैं, जो एक दुखद स्थिति है। वहां उसे इस गिरावट को विकास कहते हैं. किसान जो प्रकृति से जीने की विधि सीखता है, उसे मूल्यांकन नहीं आता। उसे अन्न की मूल्य का पता नहीं होता क्योंकि वह स्वभाव से क्षत्रिय है। जब वह क्षत्रिय प्राणी, बाज़ार में वैश्य या वैश्या के संपर्क में आता है, तब उसका स्वभाव गिरने लगता है, जिसे सहन न कर पाने से उसे आत्म हत्या भी करनी पड़ती है। यही धर्म या दो स्वभाव का युद्ध है। भारत में किसान, सरकारी लोगों से डरते हैं, क्योंकि वे उनकी जमीन का मूल्य लगाते हैं, जिस से उनका पवित्र और पाकृतिक विश्वास का सम्बन्ध रहा है और पौराणिक काल से उसकी पूजा की जाती रही है। किसान या क्षत्रिय वर्ण को निर्धन होना अनुचित नहीं है, जबकि वैश्य के लिए निर्धन होना अनुचित है। क्षत्रिय का धनहीन होने से वह गिरता नहीं है, क्योंकि वह उस स्थान को आश्रम (श्रम विहीन) बना देता है, और वह वैश्य के श्रम साध्य स्वर्ग से बढ़ कर है।

एक शिक्षक अपने शिष्य को शिक्षा देता है, यह शिक्षा मूल्य से नापा नहीं जा सकता। यही दान है। क्षत्रिय एक पुरूष होता है, जिसे श्री-मन भी कहते हैं, जो मनोयोग या मन की गहराइयों को जान पाने में समर्थ है। वैश्य एक स्त्री है जिसे श्री मति भी कहते हैं, जो बुद्धियोग या सांसारिक संकल्पों और विषयों को जान पाने में समर्थ है। स्त्री (बुद्धि, मति) को पुरूष (मन, धर्म) का अनुसरण करना उचित है। पुरूष (नर, श्रीमान ) और स्त्री (नारी, श्रीमती) लिंग सूचक शब्द बिल्कुल नहीं हैं। राम चरित मानस को मानस इसलिए कहा जाता है की यह मन के लिए ही बनाया गया है। मौलिक ज्ञान जो सीखा न गया हो, और जो स्थिर मन के खेत की उपज हो, उस ज्ञान की खेती करने वाला ही क्षत्रिय है। एक लेखक, एक कलाकार जो किसी उदेश्य के लिए कार्य करता है, और जिसके कार्य का मूल्य लगाना सम्भव नहीं हैं, इस लिए ही उसे दान कहते हैं। इन कार्यों का मूल्यांकन नहीं हो सकता।
क्षत्रिय एक समाज या कुल में रहता है जो स्वभाव के अनुकूल उद्देश्य में श्रद्दा एवं विश्वास से निश्चिंत है। समाज और संगठन एक दूसरे के विरोधी भी हो सकते हैं। जो व्यक्ति रोग मुक्त समाज की कल्पना के लिए कर्म करता है, इस उद्देश्य के कारण वह क्षत्रिय है। उद्देश्य में हानि लाभ या, नाप तौल, मूल्यांकन और फल की अपेक्षा का प्रश्न नहीं होता। लेकिन, विभिन्न अस्पताल और इंश्योरेंस कम्पनी जो इसी उद्देश्य के लिए बने संगठन हैं। संगठन का कारण भय, असुरक्षा या प्रतिस्प्रधा या व्यावसायिक गोपनीयता होती है; जबकि समाज, संगठन निरपेक्ष होता है, एवं व्यक्ति की मौलिकता और समानता के सिद्धांत से बनता है। राष्ट्रीयता, हिंदू- मुस्लिम, व्यावसायिक संस्थान, संगठन के उदाहरण हैं।

फालतू या अधिक होने पर फेंकने के तुल्य (surplus), या मूल्य (price) या क्षति पूर्ति (compensation) को दान नहीं कहते. दान एक तरह का निवेश (investment) है जिसके द्वारा लाभ या कल्याण की आशा तो होती है, किन्तु उसका मूल्यांकन या उन पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता. स्टाक मार्केट में धन लगाना इस तरह का ही एक आसुरी दान है. शिक्षा के लिए जब हम विद्यालय में जाते हैं तब उद्देश्य तो होता है किन्तु हमें फल की मात्रा का अंदाजा नहीं होता. कन्या दान भी इस तरह का समाज में एक निवेश है. यह स्वेच्छा से किया जाता है, और इसके फल का मूल्यांकन नहीं हो सकता.
कन्या दान भी दान है। एक पिता अपने पुत्री को विवाह में एक योग्य व्यक्ति को देता है, जिसमें कोई समझौता या मूल्य नहीं होता। ये सभी कार्य स्वान्तः सुखाय होते हैं जो तभी हो सकता है जब वह कार्य स्वभाव से किया जाय, और उसे करने में श्रम न हो। यह बुद्धियोग से किया गया परिश्रम भी नहीं है। यही आश्रम अर्थात श्रम का अभाव है, जो यद्यपि तपस्या की तरह दुर्गम है, किंतु श्रम साध्य या परिश्रम से भी साध्य नही है। वैज्ञानिक खोज, कला या मौलिक अभिव्यक्ति में व्यक्ति अपने द्वारा प्राप्त सुख या ज्ञान को सब लोगों में बाँटना चाहता है, क्योंकि इसकी खोज उसके अपने मन की गहराइयों से हुयी है। क्षत्रिय स्वतंत्र होता है, और वह उद्देश्य की पूर्ति के लिए कर्म करता है, और उसके द्वारा हुए व्यवहार दान कहलाते हैं। स्वभाव की खोज में अन्य विषयों से मन को शुद्ध करने का युद्ध (अर्थात विषयों की शाखाओं को काट कर ज्ञान के स्वरुप की प्राप्ति ही) क्षत्रिय का लक्ष्य है।

जो क्षत्रिय भी नहीं है, और जो किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए दान नहीं ले सकता। वह वैश्य भावः में मूल्यांकन की क्रिया में निपुण या मूल्य का अधिकारी भी नहीं है। और शूद्र के भावः में, क्षतिपूर्ति या वेतन का अधिकारी नहीं है। वह ब्राह्मण भिक्षा लेता है। गौतम बुद्ध, भिक्षा लेने चुन चुन विभिन्न घरों में जाते थे। इस तरह, वे लोगों की आर्थिक और भावनात्मक स्थिति को जानना चाहते थे। निर्धनता भिक्षा का कारण नहीं था, वे स्वयं एक राजा के पुत्र थे, और सत्य की खोज कर चुके थे। शूद्र का असुरक्षा-नियंत्रण- संग्रह, वैश्य का शत्रु-समानता- व्यवसाय, और क्षत्रिय का मित्र - धर्म- आत्म शुद्धि के लक्ष्य से आगे ब्रह्मण है, जो सत्य को जानता है। भ्रमण के दौरान जिस घर में उन्होंने भिक्षा ली, वह परिवार उस कुरीतिक व्यवस्था में अछूत था, जबकि वह राज्य उनका ससुराल था। भगवन शिव जो पृथ्वी पर जल अन्तरिक्ष से लाये हैं उन्हें भारत के लोग जल चढाते हैं। यह प्रथा इस लिए है जिससे भगवन शिव को हम याद दिलाते रहें की पृथ्वी पर सभी प्राणियों को स्वच्छ जल प्रचुर मात्रा में सद्दैव ही उपलब्ध है। बुद्ध या शिव को भोजन या जल का अर्पण केवल हमारा उनको संतुष्टि का प्रदर्शन है। उन्हें कुछ दिया नहीं जा सकता, और न ही वे हमारे व्यक्तिगत उद्देश्य के लिए कोई कार्य करेंगे, जो कार्य क्षत्रिय का है। ब्रह्मण कभी व्यवसाय भी नहीं करता जिससे समझौता किया जा सके और मूल्य का आकलन हो। भिक्षा, ब्राह्मण को देने का अर्थ सिर्फ़ यह है, की उसका दिया सब कुछ हमारे पास है, और यह हम उन्हें दिखा सकते हैं और धोखा नहीं दे रहे । भिक्षा की महिमा विचित्र है। श्री कृष्ण जो द्वारका के राजा हैं और उन्हें कोई कमी नहीं है, वे निर्धन विदुर के घर जा कर बचा हुआ खाना प्रेम से मांग कर खाते हैं। वे पांडवों के जंगल में बने निवास में रहते हैं, और श्रद्धा युक्त दिया गया भोजन बिना किसी संकोच, करते हैं। जबकि दुर्योधन के सत्कार और वैभव और उनके अन्न से वे हमेशा बचना चाहते हैं। स्वेच्छा से अर्पण या माँगना तो फ़िर भी ठीक है, किंतु श्री कृष्ण ने भिक्षा के कीर्तिमान चोरी और छीन कर भी स्थापित किया। गोकुल में, समृद्धशाली यशोदा के पुत्र हो कर, उन्होंने अपने सभी निर्धन भक्तों के घर जा जा कर, माखन जो आसानी से उपलब्ध वस्तु है, उसकी चोरी कर उनका बड़े-छोटे, गरीब अमीर, जाती-पांति का संकोच ही समाप्त कर दिया और लोग स्वतंत्र हो कर अपने भावः से श्री कृष्ण से जुड़ गए। उन्होंने सुदामा के तीन मुट्ठी चावल छीन कर खाए, जो उन्हें अर्पण करने के लिए ही लाये थे, किंतु संकोच के कारण श्री कृष्ण को कभी देना नहीं चाहते थे।

दुर्भिक्ष, भिक्षा का उल्टा है। जो लोग दिल्ली की सड़कों पर अपनी लाचारी का प्रदर्शन करते हैं, उन्हें क्षतिपूर्ति या पुनर्वास की जरूरत होती है, क्योंकि वे किन्ही कारणों से स्वयं में समर्थ नहीं हैं। वे शूद्र बनने के पात्र हैं, और उन्हें, जीविका के साधन, उनके लायक नौकरी, और सुरक्षा की आवश्यकता है। दुर्भिक्ष होना निर्धनता का लक्षण नहीं है। अर्थात निर्धन व्यक्ति जैसे कबीर, तुलसीदास या गाँधी दुर्भिक्ष नहीं हैं। जबकि भारत के करोड़पति भ्रष्ट सरकारी कर्मचारी जो बिना रिश्वत लिए काम करना पाप समझते हैं, वे अधिक लाचार व दुर्भिक्ष हैं। क्योंकि वे यह भी नहीं जानते हैं, की उन्हें क्या चाहिए। दुर्भिक्ष निवारण, समाज का कर्तव्य है। यदि यह नहीं किया गया तो उन प्राणियों के अन्दर क्रोध पैदा होगा, और वे बदले की भावना से अपराधी, आतंकवादी बन, या विचारधारा से संगठित हो कर शासक बन कर, स्वाभाविक समाज को नष्ट कर सकते हैं। व्यक्ति जब अपने स्वयं द्वारा प्रयत्न में असफल हो जाता है तब वह असंतुष्ट होता है, और उस व्यक्ति को जब अन्य लोगों से तिरस्कार मिलता हैं या उसे सहायता नहीं मिलती तब वह, कालांतर में (असहाय + क्रोध =) दरिद्र बनता है, और अंत में अपराधी। वही अपराधी, शूद्र वर्ण ले कर, नियंत्रण और सुरक्षा के लिए योद्धा या शासक बनते हैं। कानून तोड़ने वाला ही नए कानून बना सकता है। अतः, अपराधी जो (तिरस्कार के दर्द को सह कर,) कानून तोड़ने पर भी स्वीकारणीय है, वही शासक बनने योग्य है। फ़िर वही शूद्र, अपने कर्म के द्वारा क्रमशः उन्नत हो कर, वैश्य, या क्षत्रिय और अंत में ब्राह्मण बनता है। ब्राह्मण जो भिक्षा ही ले सकता है, यदि यह ज्ञान न रहे तो वह पतित हो जायगा, और वह दान लेने हेतु किसी संकल्प से बंधने को बाध्य हो जायगा। या, वह वैश्य बन कर अपने ज्ञान और कला का मोल-तौल करेगा, और या जीविका की सुरक्षा के लिए मन के विरुद्ध कार्य का दास बनेगा या आतंक वाद, भष्टाचार, या दुर्भिक्ष को प्राप्त करेगा। गिरने की ऊंचाई जितनी अधिक होगी, नुकसान भी अधिक होगा।

गाँधी, दक्षिण अफ्रीका में अंग्रेजों का एक तिरस्कार पाकर ही, भारत के गुलाम रहे करोड़ों लोगों की पीड़ा को समझ सके और, तभी इस देश के समाज में स्वतंत्रता की चेतना पैदा हुई। महाभारत में द्रौपदी का दुश्शासन द्वारा तिरस्कार की तुलना गाँधी के अंग्रेजी सरकार (बुरा शासन या दुस्शाशन) के तिरस्कार से की जा सकती है। दोनों असहाय व्यक्तियों ने मार्ग दर्शन के लिए, श्री कृष्ण का सहारा लिया और धर्म युद्ध का कारण बने। इसका अर्थ यह है की अंग्रेजों की इस गलती को हमें दुहराना नहीं चाहिये, और किसी भी दुर्भिक्ष या लाचार व्यक्ति का कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये और जितना हो सके, सहानुभूति और सहयोग देना चाहिये। सब जानते हुए भी आज के भारत में, आम लोगों का सरकारी कार्यालयों में जाने पर यदि तिरस्कार न हो, तो यह आश्चर्य लगता है। दुर्भिक्ष, भ्रष्टाचार, आतंक, और दुस्सह -शासन का निवारण आवश्यक है। भारत में भ्रष्टाचार, आतंकवाद , या दुर्भिक्ष भी व्यवसाय बन गए हैं, और लाखों लोगों की जीविका के साधन हैं। यदि भारत में कानून को सरल बना दिया जाय तो नेता, वकील या सरकारी लोग उसका विरोध करते हैं, क्योंकि व्यवसाय प्रभावित होगा, इस कारण भारत में दुर्भिक्ष को दूर करना एक चुनौती भी है।

प्रार्थना
बुद्धि के स्वामी श्री गणेश और वाणी सरस्वती, वर्ण के इस अर्थ के संग्रह को रस की रूचि से युक्त करने की कृपा करें और यह लेख मन को स्थिर करने में समर्थ छंद बन कर समाज के अध्यात्मिक कल्याण का कारक बने
- श्री तुलसी कृत राम चरित मानस के प्रथम श्लोक का हिन्दी अनुवाद