Friday, July 31, 2009

व्यवसाय क्षेत्र में धर्म व्यवस्था शास्त्र (क्वालिटी मनेजमेंट सिस्टम)

क्वालिटी और मनेजमेंट, धर्म और युद्ध की तरह हैं. क्वालिटी धर्म है, और मैनेजमेंट युद्ध है. इस धर्म-युद्ध की व्याख्या ही महाभारत या कुरु क्षेत्र (या कार्य ) है. युद्ध, भला धर्म कैसे हो सकता है? अर्थात मैनेजमेंट या युद्ध से क्वालिटी कैसे बन सकती है? व्यवसाय इसका एक प्रयोग है. व्यवसाय में या बाज़ार में, हर व्यक्ति का स्वार्थ (point of view, दृष्टिकोण ) अलग अलग होता है, किन्तु वे लडाई कर, या लूट कर उसे पूरा नहीं करते. वे एक बराबरी का समझौता कर लेते हैं और इस तरह दो शत्रु एक भाव पर सहमत हो जाते हैं, जिसमें किसी की हार नहीं होती. व्यवसाय का कार्य, बाज़ार में रहते सीखा जा सकता है, जो धर्म भी है, और युद्ध भी. युद्ध में विजय होती है. विजय जिसका अर्थ है वह विशेष जय जिसमें कोई पक्ष हारे नहीं. युद्ध या व्यवसाय हमेशा उनसे ही किया जाता है जिनका सम्बन्ध तो दृढ है किन्तु दृष्टिकोण में फर्क है, इसलिए उसे छोड़ा नहीं जा सकता. जिन्हें आसानी से या कठिनता से छोड़ा जा सकता हो, युद्ध करना उचित नहीं.




व्यवसाय का क्षेत्र बिन लादेन (१००,०) से बिल गेट्स (५०,५०) के बीच की अवस्था है अर्थात जो संगठन के नियंत्रण में रह, असुर से सुर बनने की कठिन यात्रा है. इसमें कठोरता और नियमो की जरूरत होती है क्योंकि लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. यहाँ ऊंचे लक्ष्य सिर्फ इस लिए रखे जाते हैं जिसे किसी का अकेले प्राप्त करना संभव नहीं हो, तभी लोंग संगठन से जुड़ सकते हैं. लक्ष्य को प्राप्त होने पर लोंग झगड़ते हैं, इसलिए संगठन में लक्ष्य का अप्राप्त होना और कठिन होना आवश्यक है. इस खतरे और असफलता के कारण, कार्य को व्यवस्थित करने के लिए स्टैण्डर्ड की जरूरत होती है.

असुर का गुण कभी स्थाई नहीं होता. इसका एक इतिहास है. आंतकवादी संगठन जो पहिले लूट पाट कर धन कमाते थे, उनको नीति और रक्षा के कार्य में लगाए जाने से वे ही राष्ट्र वादी (सरकारी) संगठन बन गए. इसलिए आतंक या असुर होना और उन गुंणों का सदुपयोग, शासक का एक गुण है. राष्ट्र की भी अनंत श्रेणियां हैं. इनमें सीमा या व्यवसाय के लिए लडाई होती रहती है. इसलिए सभी आतंक-वादी, एक न एक दिन अपना अलग राष्ट्र बना लेना चाहते हैं. लेकिन राष्ट्र की सिमित परिभाषा से व्यवसाय अधिक श्रेष्ठ है. राज नेता, इसलिए अपना छोटा मोटा व्यवसाय बना लेना चाहते हैं. और व्यवसाय की भी अनंत श्रेणियां हैं. वैश्य या वैश्य जो व्यवसाय पर निर्भर है, उसका का निर्धन होना उचित नहीं होता. उसका स्थान स्वर्ग है. व्यवसाय के शीर्ष पर सोनी, बी एम् डब्लू, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल जैसे व्यवसाय का नाम उनके सुर स्वभाव के कारण आदर से लिया जाता है.

सुर या संगीत की तरह भरोसेदार होना ही संगठन का लक्ष्य होता है. जैसे, हर पंडित अपना अलग अलग मार्ग (जैसे हिंदू, इस्लाम, ईसायी इत्यादि ) बताता है, ठीक उसी तरह व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्र की सफलता के लिए क्वालिटी मनेजमेंट सिस्टम की परीक्षा के लिए, विभिन्न स्टैण्डर्ड उपलब्ध हैं। जापान में कार्य को धर्म समझते हैं, इस लिए वे लोग व्यक्ति के चरित्र निर्माण के द्वारा व्यवसाय में सर्व श्रेष्ठ बन गए. जबकि अमेरिका में या पश्चिमी देशों में, कार्य को युद्ध समझा जाता है, इसलिए वहां का कार्य संगठन से होता है और मैनेजमेंट पर लोग अधिक निर्भर होते हैं. इन देशों में क्वालिटी की मार्ग दर्शन के लिए बनाये गए, परिभाषा और स्टैण्डर्ड भी अलग अलग होते हैं. उदाहरण के लिए डेमिंग अवार्ड, माल्कम बल्रिज अवार्ड, आई एस ओ ९०००, सिक्स सिग्मा इत्यादि। तत्त्व यह है कि स्टैण्डर्ड चाहे कोई भी अपनाया जाय, सफलता इसमें है कि संस्था को उससे क्वालिटी मनेजमेंट सिस्टम का ज्ञान प्राप्त हो और उसकी त्रुटी हीन कार्य करने की क्षमता बढे।

स्टैण्डर्ड का इस्तेमाल बेवजह नहीं है। व्यावसायिक संस्थाओं में ग्राहक के एक भारी आर्डर लेने, और उसे पूरा करने तक का कठिन कार्य, एक चौडी नदी को पार करने जैसा है। शुरू में, डरना तो स्वाभाविक है किंतु प्रबंध की कला में अभ्यस्त तैराक इस नदी को तैर कर पार करना जानता है। इसके अतिरिक्त, एक सावधान तैराक के पास नदी की गहराई नापने के लिए कोई डंडा या यंत्र भी होना चाहिए। जिसके होने से, उसे आत्म बल (self confidence) मिलता है और वह इससे अपने प्रबंधन की कला को स्वयं देख-देख कर, प्रति दिन बेहतर बन सकता है। नापने के विभिन्न यन्त्र ही आदर्श या स्टैण्डर्ड की भूमिका निभाते है। इसकी सहायता से तैराक सावधान रह, और निरंतर नया ज्ञान या कला सीखने के लिए उत्सुक रहता है। उसे ग्राहक का आर्डर लेते समय कभी डर नहीं लगता क्योंकि नापने वाले डंडे के प्रयोग से वह यह जान गया है कि किस तरह वह ग्राहक की आवश्यकताओं पर कितनी बार वह खरा उतर चुका है। संस्था में प्रबंधकीय अनुशासन का यह माप दंड ही आदर्श (या स्टैण्डर्ड) कह लाता है। यह नापने का यन्त्र, आदर्श या स्टैण्डर्ड, तैराक का स्थान कभी नहीं ले सकता अर्थात स्टैण्डर्ड पढ़ कर कोई प्रबंध करना नहीं सीख सकता। किंतु एक प्रबंधक के लिए स्टैण्डर्ड का प्रयोग, उसे अनुशासन (स्वयं पर शासन) का महत्व और आत्म बल का ज्ञान करा ही देता है। स्टैण्डर्ड को समय और परिस्थितिओं के अनुसार बदलते रहना चाहिए ताकि उसे अपनी छमता के आकलन में इसलिए ग़लतफ़हमी न हो कि उसने एक अनुपयोगी स्टैण्डर्ड का सहारा लिया था।

बाज़ार का क्या इतिहास है, बाज़ार कौन बनाते हैं?

1. युद्ध की मर्यादा पर आधारित मुक्त बाज़ार / युद्ध आवश्यक क्यों है? / कर्म को धर्मं युद्ध क्यों कहते हैं।
बाज़ार एक युद्ध क्षेत्र है। इसमें दो योद्धा अपनी अपनी बात को कायम रखने के लिए लड़ते है, और इस तरह दोनों अपने बराबरी के शत्रु का चुनाव कर, उनके बल, कला-कौशल और चरित्र की अच्छी तरह थाह लेते हैं। इस युद्ध में, दोनों पक्ष हार-जीत या मरने -मारने के बजाय समझौता (agreement) कर लेते हैं। युद्ध की समझौता में समाप्ति, ही व्यवसाय है। बाज़ार के सम्बन्ध का आधार कभी संकल्प (committment) नहीं होता बल्कि वह एक समझौते (agreement) से जुड़ता है। बराबरी की परीक्षा ही युद्ध है, क्योंकि किसी भी समझौता के लिए पक्षों का बराबर होना जरूरी है, जिससे हाथ मिलाने के बाद कोई भी पक्ष हाथ को मरोड़ न सके। उदाहरण के लिए, भारत और अमेरिकी सरकारों में, परमाणु उर्जा के लिए समझौता एक भयानक युद्ध है। दोनों पक्षों का इस समझौते को निभा पाना ही व्यवसाय है। जब हम भी बाज़ार में कुछ खरीदने के लिए जाते हैं, तो हम किसी वस्तु का मूल्य १० रूपये लगाते हैं, किंतु बेचने वाला उसे २० रूपये में ही देना चाहता है। यही युद्ध है। बिक्रेता हमें अलग अलग वस्तु दिखाता है, और मूल्य के सही होने की जिद करता है। अंतत दोनों १५ रूपये पर समझौता कर लेते हैं, और यह तय होता है की दोनों उस समझौते का सहर्ष पालन करेंगे। इसलिए, बाज़ार में खरीदने वाले और बेचने वालों को सतर्क रहने की हमेशा जरूरत होती है, और कोई भी व्यावसायिक सम्बन्ध हमेशा के लिए बन पाना जरूरी नहीं है।

असुरक्षा की भावना ही बाज़ार की शक्ति है। जो योद्धा नही हैं अर्थात चरित्र हीन या धोखे बाज़ हैं, या सतर्क नहीं होते, या दयालु या हिसाब किताब में असावधान होते हैं, वे सभी बाज़ार में मारे जाते हैं। आकर्षण के लिए छल, व्यवसायिक व्यूह नीति या तकनीकी गुप्त ज्ञान का युद्ध में इस्तेमाल, युद्ध की मर्यादा पर निर्भर है। मर्यादा की सीमा रेखा ही अपराधी और योद्धा को अलग करती है जबकि बुद्धि, धन या अस्त्र की शक्तियों दोनों के लिए बराबर हैं। बाज़ार के सिद्धांत इस लेख में आगे विस्तार में दिए गए हैं।

२। संगठनात्मक अलगाव (formation of interest groups) की व्यवस्था (जातिप्रथा, राजनीतिक, व्यवसायिक या धार्मिक संगठन का रहस्य)

अलगाव वादी विशेषण से जुड़ कर अपने को धर्म युद्ध से बचाने की कला ।
समझौते के निर्वाह की समस्या युद्ध के इतिहास से जुड़े हैं। जातिप्रथा और बाज़ार, युद्ध में हुए समझौते के अलग अलग प्रयोग हैं। दुनिया में असंख्य उदाहरण हैं जब हारने वाले योद्धा ने समझौते में अपने पुत्री को जीतने वाले योद्धा को दी। इससे जातिगत समूह बन गए और शक्तियों को पारिवारिक धरोहर बना दिया गया। आज भी डाक्टर के पुत्र -पुत्री, व्यवसाइयों के पुत्र-पुत्री, अपराधियों के पुत्र-पुत्री स्व-जातीय विवाह द्वारा अपने शक्ति को परिवार के दायरे में ही रखना चाहते हैं। छुआछूत और जातीय अलगाव से लोगों में घृणा पैदा होती गई, और लोग संगठन बना प्रतिस्प्रधा से बचने लगे। इस तरह युद्ध की मर्यादा नष्ट हो गई, और उनके अपने अपने संकीर्ण विचारों से बाज़ार नहीं बन सका।

शत्रु भाव या प्रतिस्प्रधा के न होने पर, डाक्टर का बेटा डाक्टर, शासक का बेटा शासक, पंडित का बेटा पंडित, बिना किसी परीक्षा या योग्यता के कारण बनते गए। इस कारण, अलगाव, अज्ञान और अंधविश्वास बढ़ता ही गया और, भारत जैसे देश सदियों तक गुलाम बने रहे या रहेंगे। मुस्लिम और हिंदू धर्म से अलग नहीं हैं, बल्कि इतिहास से अलग हैं। मुस्लिम शासकों का इतिहास आज उस असमानता की कीमत चुका रहा है, जिसके कारण मुस्लिम आज भी समाज में उचित प्रतिष्टा न पा सके और विकास से अलग हो गए। आज के नए शासक कल के दुर्भिक्ष बनेंगे। उदाहरण के लिए, एक वकील या दरोगा या पोलिस कर्मचारी या सरकारी अधिकारी को घर किराये पर मिलना मुश्किल होता है। प्राइवेट बैंक उन्हें लोन भी नहीं देते। लोग यह सोचते हैं की ये लोग अपनी ऊंची पहुँच से घर पर कब्जा कर लेंगे या उनसे किराया लेना मुश्किल होगा। कानूनी वेश में गैर कानूनी लोग, कालांतर में समाज से बहिष्कृत कर दिए जाते हैं। यही अस्प्रश्यता का सिद्धांत है। जाति या संगठन के इतिहास के कारण एक अच्छा मुस्लिम, एक अच्छा वकील या पंडित या, एक अच्छा पोलिस कर्मचारी केवल इस लिए अभिशिप्त है, की वह कभी असमानता का प्रतीक रहा था या है। इन्हें अपना मान लेने में वक्त लगेगा। इसके विपरीत, गाँधी या राम या जीसस क्रिस्ट को जातीय, या राजनीतिक या धार्मिक संगठन से जोड़ने वाले अपराधी इन महापुरुषों को भी अस्प्रश्य बनाने और अलगाव पैदा करने का प्रयत्न करते हैं। संगठन किसी का नहीं होता इसका एक तात्कालिक उद्द्येश्य होता है, स्वभाव परिवर्तन इसका लक्ष्य नहीं है । एक पोलिस की लड़ते हुए मृत्यु होने पर समाज में इतनी चिंता नहीं होती जितनी एक सामान्य व्यक्ति की दुर्घटना से हुयी मृत्यु की । आतकवादी का नाम समाज में जाना जाता है, किंतु एक पोलिस कर्मचारी का नाम उसके मृत्यु के बाद उसका स्वामी (जो सरकारी व्यवस्था है) भी नहीं जानता।

धर्म (गुण-दोष 'डिफेक्ट' निवारण ) और वर्ण (शूद्र - वैश्य- क्षत्रिया - ब्राह्मण ) व्यवस्था का जाति या संगठन ( मुस्लिम, हिंदू, डाक्टर का बेटा डाक्टर, शासक का बेटा शासक, पंडित का बेटा पंडित) से, या जन्म - दाता या, जन्म समय या स्थान से, सम्बन्ध केवल एक संयोग ही हो सकता है। जन्म, या विवाह के सम्बन्ध या एक जातिप्रथा, शत्रु-भावः को समाप्त नही कर सकते, महाभारत का युद्ध एक ही परिवार की लड़ाई थी।

बाज़ार 'समझौता' की पद्धति से किस तरह काम करती है?
माँ के हाथ का बना खाना व्यवसाय क्यों नहीं है? होटल का खाना माँ के हाथ के खाने से क्यों भिन्न है? फ़िल्म में काम करने वाली अभिनेत्रियाँ किस तरह शारीरिक सुन्दरता को अस्त्र की तरह ले बाज़ार में युद्ध करती हैं। हमें यह जानना ही होगा कि व्यवसाय में शत्रु-भाव या प्रतिस्प्रधा कितना आवश्यक है। जहाँ शत्रु भावः नहीं होगा, व्यवसाय पनप ही नही सकता। जो लोग अपनी अच्छी कीमत पा रहे हैं वे ही सफल व्यवसायी हैं। व्यवसाय में समझौता की रक्षा के लिए दो पहरेदार नियुक्त हैं। यदि ये न हों तो, समझौता या बाज़ार फेल हो जायगा।

१। नाप (measurement)
२। कानून के भय से शक्ति-संतुलन (equality by means of laws and judiciary)

माँ के द्वारा दिए गए खाने में कोई नाप नहीं होता और न ही कोई कानून। इस लिए क्योंकि वहां शत्रु भावः नहीं होता। माँ और बच्चे के बीच सम्बन्ध कभी भी बाज़ार या व्यवसाय नहीं बना सकते। जबकि होटल में, हर खाने वाले वस्तु की नाप और मूल्य तय होती है। नाप के कम या ज्यादा होने की अवस्था में उनके बीच हुए समझौता का उल्लंघन हो जाता है। यदि खाने में कोई त्रुटी पायी गई है तो कानून का डर होता है, और दोषी को दंड भी मिलेगा। जहाँ कानून नहीं है या नाप तौल के नियम नहीं बने हैं, वहां बाज़ार या युद्ध सम्भव नहीं होते। अच्छा व्यवसायी उसे कहते हैं जो नाप तौल का माहिर है ,और उसे कानून पालन और न्याय प्रणाली का लाभ लेना आता है। यही लड़ाकू लोग, पेशेवर कहलाते हैं। अमेरिका में बाज़ार की व्यवस्था सफल सिर्फ़ इसलिए है की वहां लोग कानूनी लडाई में अभ्यस्त हैं और डरते नहीं। लोगों में लड़ने की यह प्रवृत्ति ही, अन्याय और अपराध से व्यवसाय की रक्षा करती है। भारत में इसका उल्टा है। यहाँ लोग अपराधियों से डरते हैं, और उनका सम्मान करते हैं। यह स्वाभाविक है कि भ्रष्ट व्यवस्था में व्यवसाय पर अपराधियों का ही नियत्रण होता है। सफल रहे व्यवसायिक संगठन का भारत में यह अनुभव रहा है कि कानून और नाप तौल की जानकारी रख कर ही बाज़ार में सुरक्षित रहा जा सकता है, और सरकारों या अन्य शक्तिशाली शत्रु से उनके बचाव का यही एक साधन है।

पैसा कमाने के लिए खतरा उठाने वालों का हर बाज़ार में स्वागत होता है। बाज़ार धर्म निरपेक्ष होता है जहाँ किसी को धर्म या अधर्म की परवाह नहीं होती। क्या करना समाज के लिए उचित है या और क्या अनुचित, यह बाज़ार का विषय नहीं है। लेकिन वह कार्य तात्कालिक व्यवस्था में, गैर-कानूनी नहीं होना चाहिये। बन्दूक या युद्ध के उपकरण या नशीले पदार्थ बनाना, वैश्या -वृत्ति इत्यादि कार्य हिंसा और चारित्रिक पतन को जन्म देते हैं किंतु गैर कानूनी न होने से यह एक बड़ा व्यवसाय है। कोई भी खेल, व्यवसाय या युद्ध जिसमें प्रतिस्प्रधा और शत्रु भावः हो, उसमें कानून का बीच में रहना जरूरी होता है। जहाँ कानून का प्रभाव नहीं होता है, वहां अपराध और व्यवसाय में फर्क करना मुश्किल होता है। यह भी ध्यान रहे की समानता या स्वतंत्रता के बिना व्यावसायिक प्रतिस्प्रधा या कोई भी युद्ध अनैतिक होता है। जो लोग कानून बनाते हों या हिसाब किताब रखते हों या जिन्हें दंड देने का अधिकार है उन्हें बाज़ार में कभी भी भाग नहीं लेना चाहिए, यह बेईमानी है। सरकारों, न्याय व्यवस्था और बैंकों को बाज़ार से अलग रखना चाहिए। लाचार और लालची लोगों का सम्बन्ध इस लिए ही भ्रष्ट होता है, और इस तरह के बाज़ार में लोगों का आत्म-बल गिरता है। लोग फ़िर बाज़ार से ही डरने लगते हैं।

युद्ध, लड़ाई या प्रतिस्प्रधा बुरी चीज नही है, किंतु वहां, किसी भी पक्ष को अनुचित लाभ या असमानता का लाभ नहीं मिलना चाहिए। समानता ( equilibrium) ही प्राकृतिक न्याय (natural justice) है जबकि नियंत्रण के सिद्धांत समानता के सिद्धांत से विपरीत है। कानून का पालन, सरकारों और संगठित व्यवस्था के लिए सिरदर्द होता है, जबकि वे कानून का दुरूपयोग दूसरों के नियंत्रण के लिए ही करना चाहते हैं। संगठन की शक्ति, समानता को सहन नहीं करती। भारत में कानून बनाने वाले, और बाज़ार के खेल में कानून के रेफरी (जज) भी नागरिकों के लिए बने कानून से स्वयं को बचाए रखना चाहते हैं। किसी भी प्रजातान्त्रिक देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है?

कानून, नियंत्रण नहीं, बराबरी है ।
भारत के निवासी जो पत्थर, वृक्षों, संतों, नदियों की पूजा करते हैं और कठोर व्रत करना जिनकी परम्परा है, वे ही लोग साधारण से साधारण कानून का भी पालन नही करते और सरकारी तंत्र से घृणा करते हैं। जबकि, अन्य देशों में, आम आदमी कानून को इसलिए अपनाना चाहता है, जिससे उसकी स्वतंत्रता को संगठित गिरोहों से खतरा न हो, अर्थात, आम आदमी का कानून, किसी भी संगठन के शक्ति या उसके एकाधिकार के लिए उचित तोड़ बने। बाज़ार के लिए कानून जरूरी तभी है जब वह प्रतिस्प्रधा और समझौते के इस खेल में, सभी लोगों में बराबरी का भावः पैदा कर सके। और न्याय, स्वतंत्रता से जीने वाले आम आदमी के लिए, और संगठन के सुरक्षा में जीने वाले ख़ास आदमी, दोंनों के लिए निष्पक्ष रहे। इतिहासिक कारणों से भारत में सरकारों या संगठनो को कानून इसलिए चाहिए था जिससे गुलाम देश के निवासियों पर नियंत्रण रखा जा सके। जिस देश में कानून नियंत्रण के लिए बनाया जाता है, और कानून से संगठित, और असंगठित/स्वतंत्र दोनों में, बराबरी या स्वतंत्रता का भावः नही प्राप्त होता, स्वस्थ बाज़ार की सम्भावना नहीं हो सकती। यहाँ, कानून में इन दोनो की रूचि, अलग अलग कारणों से होती है। सरकारों या संगठन के सुरक्षा के प्रतीक, कानून के दुरूपयोग से लाभान्वित होते हैं, जबकि स्वतंत्र व्यक्ति कानून इसलिए अपनाना चाहता है, जिससे संगठित शक्तियों से या सरकारों से उसकी रक्षा हो सके, और वह उनसे डरे नहीं।

जिस देश में कानून होते हुए भी, आम आदमी को सरकारों से, या संगठित ख़ास लोगो, से डर लगता हो, उस देश में बाज़ार पनप ही नहीं सकता। वहां कभी भी प्रतिस्प्रधा पर आधारित बराबरी के समझौते नहीं हो सकते। भारत के तरह इन देशों में भी भष्टाचार, डर और नियंत्रण के लिए कानून का दुरूपयोग होता है। भारत में विकास एक कुख्यात शब्द है। सरकारें, विकास के लिए, किसानों या अन्य असहाय लोगों के जमीन या अधिकार जबरदस्ती ले लेती है, और उससे आम आदमी और संगठन की शक्तियों में फर्क का पता चलता है। जो कानून बराबरी नही दे सकती, वह विकास किस काम का ? यही अनर्थ का कानून है, और भारतीय अन्धविश्वासी, अति संवेदनशील और स्वभाव से अहिंसक और आज्ञापालक होते हुए भी साधारण से साधारण कानून का पालन नहीं करते और, सरकारों से घृणा करते हैं।

भारत में कानून की दुर्गति और अश्रद्धा किसी खोज का विषय नहीं है। कोई बिरला व्यक्ति ही हो सकता है जिसने सरकारी भ्रष्टाचार की स्वाद न लिया हो। बिजली, पानी, मकान, सीवर लाइन, रोड, टेलेफोन, सभी कार्यों में सरकारी नियंत्रण है। किंतु सरकारी या कोई भी संगठित भ्रष्टाचार, जो कानून से कम नही हो सका, वह प्रतिस्प्रधा से या मुक्त बाज़ार की व्यवस्था से कम हो रहा है। आज भारत, बाज़ार के महत्व और व्यक्ति की समानता और स्वतंत्रता की विकास में अभिव्यक्ति को समझ रहा है। प्रतिस्प्रधा से बने बाज़ार में बराबरी का अनुभव लेना, न्यायालय में जाने से बेहतर है। बाज़ार के न्याय में, हारने वाले को ज्ञान मिलता है, सजा नही; और जीतने वाले को प्रोत्साहन। कानून की शक्ति आम आदमी के पास होनी चाहिए, और बाज़ार में उसके द्वारा अच्छे बुरे की चुनाव की स्वतंत्रता ही न्याय है। यही कारण है नैतिक बल, कला, विज्ञानं और खेल में भारत की गिनती होने लगी है। युद्ध का अपना ही कानून होता है, और श्रेष्ठ कानून वह है जो बाज़ार या युद्ध में सभी के लिए समान हो। यही बाज़ार की आधार है, जिस से वास्तविक विकास सम्भव है। कानून, सरकार या किसी भी शक्तिशाली संगठन का अस्त्र या नियंत्रण का साधन नही होता।

जिन देशों में आम आदमी कानून को अपनाने से स्वतंत्र और बराबरी की अनुभव करता हो, और उसे डर न लगता हो, वहां, मुक्त बाज़ार से देश का विकास होता है। अमेरिका इसका एक उदाहरण है। भारत के लोग भारत से भाग कर अमेरिका जा कर वहां, सफलता प्राप्त करते हैं। इन दोनों देशों में कानून की परिभाषाएं अलग अलग हैं। भारत में कानून एक नियंत्रण का साधन है, जबकि अमेरिका में यह लोगो में बराबरी के भावः लाने का माध्यम है।

बाजार के खतरे क्या हैं?
बाज़ार खतरे का खेल है। आख़िर यह युद्ध ही तो है? देखने में यह जितना आकर्षक है उसे बनाने में लगी पीडा भी उतनी अधिक है। गणित के द्वारा बांटे गए हर मनुष्य को अपने अपने एकाधिकार की रक्षा के लिए सतर्क और स्वार्थी रहना ही है, और उसे अपने ही बुद्धि के द्वारा बनायी गई असुरक्षा से बचने के लिए प्रतिस्प्रधा और शत्रुता में जीने का अभ्यस्त होना पड़ेगा। बाज़ार में लोग आत्मनिर्भर नहीं रह सकते, इसलिए उनके पास जो भी है, उसे बचाए रखने और, सुरक्षा के लिए संग्रह की आवश्यकता होती है। जिनके पास पैसे नहीं होते, उनके लिए बाज़ार मरुस्थल है। एक आदमी जंगल और पहाडों में जिन्दा रह सकता है, किंतु बिना पैसे या बेचने-खरीदने की योग्यता के, वह शहर या बाज़ार में नहीं रह सकता। बाज़ार में रहने वाले धीरे धीरे असुरक्षा के इस प्रभाव से क्रूर और असंवेदनशील बन जाते हैं। उनका अनुशासित और आकर्षक व्यवहार, दया, रक्षा, चापलूसी, और सेवा का प्रदर्शन भी घातक अस्त्र ही होते हैं। जबकि परिवार, समाज और प्रकृति की व्यवस्था बाज़ार से उलटी होती है क्योंकि वहां शत्रुता, प्रतिस्प्रधा, न्याय और माप तौल की जरूरत नहीं होती। शासन और बाज़ार से इन तीनो व्यवस्थाओं (प्रकृति, परिवार, समाज) को हमेशा खतरा होता है। भारत में किसानो का आत्महत्या करना इसका प्रमाण है। किसानो को प्रकृति (पेड़ पौधों और पशुओं) के साथ रहने से उनमें शत्रु भावः पैदा ही नहीं होता और वे अपने श्रम का मूल्य नहीं लगा सकते। यदि उनसे कुछ मांगे भी तो वे उसे मुफ्त में दे देंगे और लिखने पढने में उनका विश्वास नहीं होता; किंतु, बाज़ार में यह सब नहीं होता और वे बाज़ार का भाषा में गरीब कहलाते हैं। वे धन का उपयोग करना सीख नहीं सकते। जब बाज़ार की व्यवस्था उनके प्राकृतिक स्वभाव को नष्ट कर देती है, तो वे लाचार हो कर आत्महत्या कर लेते हैं। प्रकृति भी आत्म हत्या कर लेती है। उसका भी स्वभाव पहिले जैसा नहीं रहा, और भयानक त्रासदी आने वाली है। परिवार और समाज में भी विकृति आ गई हैं।

बाज़ार का अर्थ-शास्त्र, भूख और असुरक्षा पर आधारित है. भूख और असुरक्षा जितनी अधिक होगी, बाज़ार में मूल्य और आर्थिक विकास की दर उतनी ही अधिक होगी. यह सिद्ध है कि एक भूखे व्यक्ति को पहली रोटी ४ रुपये में बेचीं जा सकती है, किन्तु जैसे ही उसकी भूख थोडी कम होगी, उसी एक रोटी का मूल्य ३ रुपये की होगी, और जब भूख बिलकुल नहीं रहेगी, उसी एक रोटी का मूल्य शून्य हो जायगा. रोटी पैदा करने वाले, भूख को मिटाते हैं, जबकि रोटी बेचने वाले रोटी बनाते नहीं, वे उसकी कमी या भूख की मात्रा पर ध्यान देते हैं. गाय अपना दूध नहीं बेच सकती. व्यवसाय और सृजन विरोधी सिद्धांत हैं. गणित के प्रयोग और ला आफ डिमिनिशिंग उतिलिटी के इस सिद्धांत के पंडित यह जान गए कि रोटी का महत्व, रूपए से कम है. और, गणित से बने इस अस्त्र धन (या रुपये) से रोटी की भूख ( उत्पादन और खपत) पर नियंत्रण किया जा सकता है. और इस तरह भूख का आर्थिक अस्त्र की तरह उपयोग, विलक्षण है. एक असुर योद्धा के लिए, इस से श्रेष्ठ अस्त्र भला क्या हो सकता है? धन या रुपये को चलाने का एकाधिकार ही राष्ट्र के शासक या असुर योद्धा की शक्ति है. किसी योद्धा का चित्र पहिले उसके प्रिय अस्त्र के साथ होता था, किन्तु बाज़ार में, योद्धा का अस्त्र, धन के प्रतीक रूपये या डालर पर, इन शासकों के चित्र देख कर ज्ञान होता है.

अर्थ शास्त्र की शक्ति, निर्दय और अप्राकृतिक है. बाज़ार देने-लेने के व्यवहार का नाम नहीं है. एक माँ और उसके बच्चे का सम्बन्ध, या पिता -पुत्र का सम्बन्ध या पति पत्नी का सम्बन्ध भी देने लेने का व्यवहार है किन्तु यह बाज़ार से भिन्न है. बाज़ार, बेचने और खरीदने का व्यवहार है जो कि अधिकार के लेने-देने (sale = transfer of title) की लडाई है, न कि आवश्यकता पूर्ति हेतु देन-लेन का एक व्यवहार. भारत जो एक नया बाज़ार है वहां पति और पत्नी जब बच्चे या घर के अधिकार के लिए लड़ते हैं, तब बच्चे को प्यार करने, और विवादस्पद घर में रहने का लाभ एक नौकरानी को मिलता है. इन बाजारू पति या पत्नियों को बच्चा या घर नहीं चाहिए, बल्कि सिर्फ उन पर अपना अधिकार चाहिए. सरकारें भी देश के नाम पर लड़ती हैं, किन्तु उन्हें देश से कभी प्यार नहीं होता. वे अपने अधिकार की रक्षा करती हैं, देश की नहीं. गाँधी, इसे जानते थे, इस लिए वे भारत की स्वतंत्रता की जिम्मेवारी के लिए वे पाश्चात्य, आसुरी शासकीय व्यवस्था के विरुद्ध थे. असंख्य उदाहरण है कि भारत के शासक, इस देश को कितनी बार, हार चुके है और कितनी बार यह देश दास बन चुका है, जबकि आम नागरिक असहाय रहता है. किसी भी राष्ट्र को उनके नागरिक कभी हानि नहीं पहुंचाते. असुर सभ्यता का यह आर्थिक अस्त्र मनुष्य के प्राकृतिक गुणों को धीरे धीरे समाप्त कर देता है.

अर्थ शास्त्र के पंडित जो मूल्य और भूख के सम्बन्ध को जान चुके थे, मूल्य और उपयोगिता में कोई सम्बन्ध नहीं ढूंढ पाए. अर्थ-शास्त्र में इसे जल और हीरे के मूल्य का तर्क कहते हैं जिसका अर्थ है, हीरा का उदाहरण यह सिखाता है
कि गोपनीय और दुर्लभ वस्तुओं का मूल्य उसकी उपयोगिता पर निर्भर नहीं होता बल्कि इसलिए अधिक होता है, क्योंकि न मिटने वाली वह विशेष भूख (दरिद्रता) या उसकी कमी पैदा की जा सकती है. और वे ही वस्तुएं व्यवसाय के लिए उपयुक्त हैं. इसके विपरीत 'जल' जो उपयोगी, भूख मिटाने में कारगर, और सुलभ है, उसका मूल्य कम ही रहता है. श्रेष्ठतम वस्तुएं हमेशा अमूल्य होती हैं, क्योंकि उनकी उपयोगिता, मूल्य पर कभी निर्भर नहीं होती. और प्रकृति उनका उत्पादन स्वयं करती है. प्राकृतिक जीवन शैली में रहने वाले, जैसे कृषक, या पशु पालक कभी बाज़ार में सफल नहीं सकते. इसके विपरीत, ग्रीक सम्राट या अन्य शासक, योद्धा या व्यवसायी अपनी क्रूरता, गोपनीय और दुर्लभ कार्यों द्वारा, और वे जिन वस्तुओं की खोज में रहे, जिनकी भूख मिट नहीं सकती (अर्थात दरिद्र की परिभाषा में आते हैं), वे ही अर्थ-शास्त्र का लाभ ले सकते हैं.

दरिद्रता, मन की एक विशेष स्थिति है. दरिद्र, भूखे और असंतुष्ट व्यक्ति को कहते हैं, भले ही वह महान रोगी, या सम्राट, या अधिकारी, या कोई उद्योगपति क्यों न हो. निर्धन व्यक्ति को दरिद्र नहीं कहा जा सकता. धन प्राप्त करना, निर्धन रहने से सरल है. एक पारिवारिक गरीब स्त्री या पुरुष, और वैश्य या वैश्या में फर्क होता है. एक वैश्य या वैश्या, के लिए निर्धन होना अनुचित है और दरिद्रता उचित, क्योंकि बाज़ार की शक्ति दरिद्र हैं, न की निर्धन. गाँधी, तुलसीदास, बुद्ध को निर्धन कहा जा सकता है किन्तु दरिद्र नहीं. धन, दरिद्रता को दूर करने में समर्थ क्यों नहीं है, यह खोज का विषय नहीं है. स्वाभाविक है कि भूख को पैदा करने में ही धन का अस्तित्व है, और भूख के समाप्त होने पर धन का मूल्य गिर जाता है. अधिकार की लडाई ही भूख को पैदा करती है, और वही, व्यापार या व्यवसाय का कारण है. जबकि प्राकृतिक जीवन में, आवश्यकता की पूर्ति सिर्फ इसलिए ही हो जाती है, कि वस्तु पर किसी के अधिकार या नियंत्रण (टाइटल) का प्रश्न नहीं होता. भूख का सम्बन्ध अधिकार, असुरक्षा, और बेचने- खरीद से है, जबकि आवश्यकता वस्तु के लेन-देन और पात्रता पर आधारित है. देवताओं का गुण असुरों से भिन्न होता है. देवता यह कहते हैं कि उनका अपना कुछ नहीं है, और जो भी है वह उन्हें दूसरों से या परमात्मा से ही मिली है. उन्हें संग्रह की जरूरत नहीं है, क्योंकि सृजन और देना उनका स्वभाव है. जबकि व्यवसाय का पंडित, असुर, उस वस्तु को खरीदने के अधिकार के कारण, अपना कहता है, और देने वाले का नाम भी याद नहीं रखता. भूख और आवश्यकता में भिन्नता को समझने का यही मनोविज्ञान है.

जब असुरों को व्यवसाय के यह रहस्य का ज्ञान हो जाता है, तब वे अंहकार या अधिकार के झूठे कवच को त्याग देते हैं क्योंकि इससे वे कभी संतुष्ट नहीं रह सकते. इस ज्ञान से वे धन से ऊपर उठ, भौतिक ज्ञान और अनुसन्धान करते हैं, और उनका वर्ण परिवर्तन हो जाता है. वे अधिकार की लडाई छोड़, सृजन की प्रतिभा का विकास कर, विश्व में ख्याति प्राप्त करते हैं. कालांतर में, असुरों को सुर, और मोक्ष की प्राप्ति होती है.

धर्म और कानून अलग अलग शब्द हैं, इसलिए दोनों के क्षेत्र भी अलग अलग होते हैं जो एक दुसरे के पूरक हो सकते हैं, और नहीं भी. धर्म, अध्यात्मिक या शुद्ध -ज्ञान (विज्ञान = अलग तरह का, विशेष ज्ञान) है, जबकि कानून एक विषय है जो भौतिक या बाहरी या सांसारिक व्यवहार की परिभाषा है. धर्म-युद्ध का लक्ष्य, स्वभाव की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए होता है, जबकि कानूनी लडाई किसी न किसी अधिकार के लिए ही होती है. उदाहरण के लिए, भारत की अंग्रेजों से हुए स्वतंत्रता संग्राम में मरने वालों की संख्या, भारत-पाकिस्तान विभाज़न में हुए गृह-युद्ध से कम थी. अंग्रेजी, भारतीय और पाकिस्तानी शासक की "अधिकार की लड़ाई" में, स्वतंत्रता की लड़ाई से अधिक लोगों की जान गयी थी. व्यवसाय या युद्ध, किसी देश की रक्षा के लिए नहीं बल्कि उस पर अधिकार की रक्षा की लिए होती है. कानून सिर्फ मृत्यु के अस्त्र का एक नया प्रयोग है, जिसे शासक या अधिकारी, स्वयं यह अपने अधिकार की रक्षा के लिए बनाता है जिससे उसका नियंत्रण बना रहे. जिसके पास अधिकार नहीं है या जो निर्धन या पद-हीन है, उसके लिए कानून का कोई अर्थ नहीं है. अर्थ-शास्त्र रोटी के मूल्य को भूख की मात्रा से नापता है, उसकी उपयोगिता से नहीं. बिक्री, रोटी का लेन-देन नहीं है, बल्कि, कानून द्वारा रोटी पर अधिकार का परिवर्तन है. एक भूखे-प्यासे व्यक्ति का भोजन प्राप्त होना धर्म है, किन्तु वह उस भोजन को उन लोगों से छीन नहीं सकता जो उसे बर्बाद कर रहे हैं क्योंकि उनके भोजन या जल के दुरूपयोग का अधिकार कानून से रक्षित है. धर्म, इसलिए ही कानून से भिन्न है. दुर्भाग्य से, कानून, युद्ध या विरोध या नियंत्रण का अस्त्र है, जबकि धर्म, शांति का साधन. गाँधी जो दुर्भाग्य से एक वकील थे, उन्होंने, उस समय के शासक द्वारा बनाये असंख्य कानून तोडे, और कई बार जेल भी गए. सिद्धांत के अनुसार, जज एक सज्जन व्यक्ति नहीं होता बल्कि जज, कानून का पुतला या किसी विषय का पंडित होता है, जिसमें मानवीय गुण का होना एक संयोग है, किन्तु वे अपेक्षित नहीं होते. कानून, (अधिकार के लिए) बीमार हुए लोगों के लिए दवा या विष है, लेकिन धर्म, जीवन को स्वस्थ रखने के लिए नित्य का भोजन है. कानून के धर्म संगत होने से समाज (जहाँ मूल्यांकन और भय न हो) का विकास होता है, और कानून के धर्म संगत न होने से व्यवस्था (नाम तौल, मूल्यांकन, और कानून का भय) का विकास होता है.

कानून और नीति, असुर या इन्तेर्ष्ट ग्रुप की सभ्यता की देन है, जबकि धर्म, सुर या व्यक्ति की सोच के अनुसार उसकी बदलती दृष्टि कोण का लक्षण है. हिन्दू, इस्लाम, भारत, डाक्टर, वकील, व्यवसायी, आदि व्यवस्थाएं, संगठन या इन्तेस्ष्ट ग्रुप हैं, जबकि गाँधी, राम, गुरु नानक, कबीर का चरित्र धर्म है. एक सुर, या धर्म परायण व्यक्ति फल की चिंता नहीं करता, इसलिए वह आंतकवादी भी हो सकता है, किन्तु संगठन नहीं बना सकता. प्रकृति की शक्तियों की तरह, धर्म या ज्ञान अपने विश्वास पर दृढ होता है, जिसके प्रकोप को कानून से नहीं रोका जा सकता. व्यवसायी, फल की चिंता करता है, इसलिए, उसकी रक्षा कानून या संगठन करता है. असुर शासक भी एक व्यवसायी है, जिसका व्यवसाय आतंक है, किन्तु उनके परिष्कृत और नए अस्त्र-शस्त्र, अर्थ शास्त्र और कानून होते हैं.


व्यवसायी चरित्र की श्रेष्ठता
व्यवसाय युद्ध का ही परिष्कृत या शुद्ध रूप है। युद्ध में लड़ने वाले प्रायः मूर्ख किन्तु शक्तिशाली होते हैं। जो जीता वो ही सिकंदर। आज भी, दुनिया में बिन लादेन का नाम अमेरिका के अंहकार को नष्ट करने के कारण ही जाना जाता ही। युद्ध का कारण अंहकार होता है। शासक या अपराधी या योद्धा अपने अपने अंहकार की रक्षा के लिए ही लड़ते हैं। उनका लक्ष्य हार-जीत या मरना-मारना होता है, जिससे उन्हें स्वयं की पहिचान प्राप्त हो। प्रायः, मरने के बाद ही लोग उन्हें याद करते हैं। इन्हें, अपने स्वभाव की ठीक समझ नहीं होती। पुराने जमाने में, योद्धाओं या अपराधियों की उनके शक्ति के कारण बहुत इज्ज़त होती थी। वे ही शासक कहलाते थे। किन्तु, आज युद्ध के शक्तिशाली अस्त्रों का बाज़ार, सुन्दरता के बाज़ार की तुलना में बहुत छोटा हो गया है। क्या आपने सोचा है कि दुनिया के सभी देशों में, बुद्धिमान और युवा लोग क्यों सेना, रक्षा, अपराध, सरकारी पदों, या अन्य शक्ति-प्रयोग के कार्यों में नहीं जाना चाहते ? और उन्हें व्यवसाय या सृजन के कार्य क्यों आकर्षित करते हैं। विकास का यही दर्शन यह सिद्ध करता ही कि कालांतर में शक्ति का प्रभाव किस तरह घटता जा रहा है, और कैसे लोग समझदार और निर्रहंकार होना अधिक पसंद कर रहे हैं। भारत में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के चुनाव में कलाकार, साहित्य, व्यवसाय या खेल में प्रसिद्द लोग सबसे आगे, और अंहकार से शक्तिशाली बने लोग जैसे शासक, वकील, या सरकारी व्यक्ति या राजनीतिक लोग सबसे पीछे रहते हैं। चरित्र में हो रहे इस परिवर्तन को ही विकास कहते हैं। किसी व्यक्ति या राष्ट्र का शक्तिशाली बनना उसका पतन निश्चित करता है।

क्वालिटी क्या है, किस तरह वह बाज़ार के खतरों को कम करने में सहायक है?
क्वालिटी, बाज़ार में आशा का किरण है। यह अंधों की लाठी है। बाज़ार को निरापद बनाने का ज्ञान ही क्वालिटी है। इसके रहस्य को ठीक से समझे। यह शत्रु भावः में रह कर परस्पर विश्वास करने की कठिन साधना है। हर एक का अपने अपने समझौते का निष्ठां से पालन ही इस की नियति है, जिसमें सबका भला है। शहर में बच्चे यह नहीं जानते की दूध गाय से प्राप्त होता है। वे जानते हैं की दूध एक मशीन से पैसा डालने पर निकलता है। दूध का मशीन जिसके पास है वह दूध को ट्रक वाले से प्राप्त करता है। ट्रक वाले दूध को एक पस्तुरिजेशन प्लांट से लेते हैं। वहां वह दूध हर रोज ग्रामीण इलाकों में बने संग्रह स्थान से आता है। संग्रह स्थान पर, दूध किसान लाते हैं। किसान, वह दूध गाय से प्राप्त करता है। बाज़ार का यह जाल अंधों का खेल है। यहाँ हर एक व्यक्ति की एक सीमा है और उसे उससे आगे नहीं दीखता। न चाहते हुए भी हर एक को समझौते का पालन करना पड़ता है। इसमें ही सब की भलाई है। यदि एक भी कड़ी टूटेगी तो बाज़ार में बच्चों को रोज दूध नहीं मिल सकता। बाज़ार एक महा जाल है इसमें करोड़ों लोग एक दूसरे पर अपने अपने समझौतों से जुड़े होते हैं और यह बाज़ार, शत्रुता से भरा होने पर भी सुरक्षित रहता है। आज जो भी विकास के कार्य होते हैं उनके पीछे करोड़ों लोग अपनी अपनी अलग अलग क्षमता से जुड़े होते हैं, और हर एक का अपना कार्य एक दूसरे के प्रति ठीक तरह से करना ही, क्वालिटी है। बिना खून खराबे के, शत्रु या प्रतिस्प्रधा करते हुए, समझौते के पालन में निपुण व्यक्ति, हर कार्य को खेल की भावना, जवाबदेही और लक्ष्य बना कर करते हैं। यही खेल की व्यवस्था ही व्यवसाय का आदर्श है।

क्वालिटी मनेजमेंट सिस्टम के अपनाने वाली संस्था के क्या लक्षण वर्णित है?
बाज़ार में क्वालिटी का अर्थ एक दूसरे से हुए समझौते का पालन करने में सफलता की योग्यता है। क्वालिटी मनेजमेंट सिस्टम के अपनाने का प्रमाण यह है की संस्था यह दिखा सके की वह ग्राहक से हुए समझौते और कानूनी नियंत्रण के नियमित पालन में कितना समर्थ है। इसके अतिरिक्त वह संस्था यह भी दिखाए की क्या वह ग्राहक को संतुष्ट करने के प्रति सचेत है, और उसकी यह क्षमता उसके कार्य विधि द्वारा हमेशा बनायी रखी जा रही है। यदि कार्य करने में कोई विधि नहीं अपनाई गई है तो कार्य की सफलता की हमेशा बने रहने की गारंटी और गलतियों से सीख लेने का अवसर नहीं होगा।

संगठन की रचना का उद्देश्य क्या है?
संगठन की रचना किसी ऊंचे उद्देश्य के लिए ही की जाती है। बाज़ार में संगठन का बनना यह सूचित करता है की कोई वह कार्य होने वाला है जिसे अकेले नहीं किया जा सकता। जो कार्य अकेले किया जाना सम्भव है वह लक्ष्य या तो छोटा है जिसे अन्य लोगों को बताने से झगडा ही होगा क्योंकि उसे हर व्यक्ति अकेले ही प्राप्त करना चाहेगा। लेकिन जो कार्य अकेले असंभव है, उसमें लोग मिल कर ही कार्य करते हैं, और ऊंचे लक्ष्य को प्राप्त करने की मिल कर iचेष्टा करते हैं। छोटे संगठन अपने छोटे उद्देश्य के कारण ही बिखर जाते हैं और लोग लबे समय तक साथ नहीं देते। ऊंचा लक्ष्य ही संगठन को बचाए रख सकता है। दुष्ट बच्चों को सँभालने का यही एक तरीका है। अतः आर्थिक विकास के कार्य, बाज़ार की एक मजबूरी भी है। यदि यह न होगा तो लोग बिना वजह झगडा करने लगेंगे और उन्हें रोकना मुश्किल हो जायगा। अमेरिका और रूस जैसे देश नित नए लक्ष्य की खोज इसलिए ही करते हैं।

व्यवस्था और गुण का सम्बन्ध Quality + Management
दुष्ट या अशांत प्रकृति के व्यक्ति, जबतक संगठन में रह कर और ऊंचे लक्ष्य के प्राप्ति में लगे रहेंगे तभी काबू में रहते हैं। वे शांत, अकेले और छोटे छोटे कार्य कर कभी खुश नहीं रह सकते। गाँधी या आइंस्टाइन ने वह छोटे छोटे काम किए, जो सभी के लिए आसन, अकेले किया जाने वाला, और अनुकर्णीय हैं; जबकि सिकंदर या अन्य योद्धाओं के साहसिक कार्य, केवल संगठित हो कर, और ऊंचे लक्ष्य बना कर ही, किया जा सकता है। छोटे लक्ष्य और असंगठित रहने से, दुष्ट व्यक्ति आपस में ही लड़ते रहते हैं। इसलिए उनके लिए ऊंचे लक्ष्य और संगठन की बहुत जरूरत होती है। केमिस्ट्री के ज्ञाता इस रहस्य को तत्त्व से जानते हैं। सोडियम अकेले शांत नहीं रहते। क्लोरीन भी अकेले नहीं रह सकती। लेकिन सोडियम और क्लोरीन मिल नमक बन कर प्रकृति में मुक्त होकर रह सकते हैं। नमक, सोडियम और क्लोरिन का संगठन है। जबकि गाँधी या आइंस्टाइन क्रियाशील नहीं हैं। सोना कहीं भी अकेले रह सकता है, जिसे संगठन की आवश्यकता कभी नहीं होती। सोना अकेले रहते हुए भी अति सवेदनशील होता है जिसका उपयोग संचार उपकरणों में किया जाता है। इसके विपरीत, सोडियम और क्लोरीन अति सक्रिय तत्त्व हैं, किंतु उनमें संवेदनशीलता नहीं होती, और सुरक्षा के लिए वे संगठित बन कर ही रहते हैं। व्यक्तियों की यही सक्रियता, प्रतिक्रिया या असहनशीलता उनका गुण है। ज्ञात रहे, बिन लादेन दुनिया में संगठन या व्यवस्था का महान पंडित है, क्योंकि वह सक्रिय और असहनशील है। पूर्व में दुष्ट रहे, या दुष्टों के इतिहास (पुराण) पढ़े हुए और शंकालु व्यक्ति (जैसे वकील, आडिटर) ही अर्थ या न्याय या संगठन व्यवस्था की सही परीक्षा कर सकते हैं।

व्यवस्था या मनेजमेंट का विचार, दुष्ट या सोडियम सरीखे (गुण के कारण) हुए सक्रिय व्यक्तियों को संगठित करके, उनके दुष्प्रभाव को कम करके उनकी शक्तियों को ऊंचे लक्ष्य की प्राप्ति में लगाना है। सोना निर्गुण है; इसलिए व्यवस्था, मनेजमेंट या संगठन उसका विषय कभी नहीं है। व्यवस्था, मैनेजमेंट या संगठन के प्रयोग से मनुष्यों के सुधार के लिए अशैतानीकरण या devilization की क्रिया है। जबकि सभ्यता (या सिविलिजेशन) सदैव प्राकृतिक होता है, जिसे व्यवस्था या बल के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। अर्थात जहाँ अव - गुण (short of quality) है वहां ही व्यवस्था (management) है।

गुण और व्यवस्था और शास्त्र
असुर, दुष्ट या शैतान स्वभाव को बल या चालाकी (=गोपनीयता + भय+ लालच+ तुलनात्मकता) के द्वारा नियंत्रित कर, उन्हें सुर या संगीत की तरह क्रियाशील बना देना ही व्यवस्था का लक्ष्य है। व्यवस्था, अनियंत्रित के नियंत्रण में लाने को कहते हैं। Management is a journey from chaos to order. जिस तरह पानी के तेज और अनियंत्रित बहाव को रोक कर, उसे पाइप में बहा कर, टरबाइन द्वारा उसकी शक्ति को उससे अलग कर बिजली बना दी जाती है, और पानी के अशक्तिकरण से उसके शांत स्वभाव को पुनः प्राप्त किया जाता है, इस जल-विद्युत् पावर-प्लांट के सिद्धांत को ही व्यवस्था कहते हैं। गतिशील पानी की तरह ही, वर्ण-संकर अर्थात मिश्रित गुण वाले मनुष्य भी, असुर ( अनिश्चित स्वभाव वाला) या दुष्ट होते हैं। और, जब उसका गुण दोष, या वर्ण संकर (या मिश्रित गुण) प्रकृति अलग- अलग हो जाती है, तब ही मनुष्य को उसके सही स्वभाव की जानकारी मिलती है। व्यवस्था से बने कठोर कार्य और कष्ट के बाद ही मनुष्य को उसकी पहचान हो पाती है। यही गुण दोष पर आश्रित व्यवस्था अशैतानिकरण या दोष निवारण (devilization) पद्धति है। क्वालिटी मैनेजमेंट का एक मात्र लक्ष्य है, दोष निवारण। दोष या डिफेक्ट के दूर हो जाने से मनुष्य में नियंत्रण आ जाता है, और उसका कार्य सुर ( नियंत्रित गति जैसे संगीत) हो जाता है। अर्थात, वह भरोसे लायक या विश्वास करने योग्य (quality assured) हो जाता है। जो भरोसे के लायक नहीं होते, या अनियंत्रित होते हैं, उन्हें ही असुर (या जो सुर में न हो) कहते हैं।

गुण-दोष निवारण (क्वालिटी -गुण, मैनेजमेंट - दोष निवारण व्यवस्था ) को ही 'धर्म' कहते हैं। सिस्टम को संस्कृत में 'शास्त्र' कहते है। शास्त्र, व्यवस्था या संगठन का अंग नहीं है जबकि व्यवस्था, शास्त्र के बिन न चल सकती है, न रुक सकती है। शास्त्र या सिस्टम या सनातन ज्ञान सदैव बिना बदले, एक सा ही रहता रहता है, और समय के अनुसार व्यवस्था या संगठन बनते रहते हैं। समाज या देश अलग अलग हो सकते हैं, जबकि समाज शास्त्र (social system) का ज्ञान एक है। सिस्टम और शास्त्र एक शब्द है। उदाहरण के लिए, फिसिक्स या फिसिकल सिस्टम ही भौतिक शास्त्र, इकोनोमिक्स या इकानामिक सिस्टम को अर्थ शास्त्र और सोलर सिस्टम को ज्योतिष शास्त्र कहते है। क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम का संस्कृत या हिन्दी में अनुवाद है, गुण (क्वालिटी) - दोष निवारण व्यवस्था (मैनेजमेंट) - शास्त्र (सिस्टम)। गुण दोष निवारण व्यवस्था को धर्म कहते है, इस लिए यह धर्म शास्त्र भी कहलाता है।

क्वालिटी जितनी ऊंची होगी, मैनेजमेंट या व्यवस्था की जरूरत उतनी ही कम होती है। क्वालिटी जितनी ख़राब होगी, व्यवस्था या मैनेजमेंट उतनी ही अधिक होनी चाहिए। साथ ही, यदि व्यवस्था या मैनेजमेंट न हो, तो भी क्वालिटी खराब हो सकती है। कम से कम व्यवस्था या मैनेजमेंट के द्वारा, किस तरह क्वालिटी को सर्वोच्च बनाये रखा जा सकता है। सही दिशा में यह सोच ही को सिस्टम या शास्त्र कहते हैं। शास्त्र या सिस्टम यह सिखाता है कि भरोसा इस तरह हो, जो बिना कंट्रोल के सम्भव हो।
जापान में क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम को धर्म या आराधना की क्रिया मानी जाती है, इस लिए वहां डिफेक्ट, या दोष या प्रदूषण या अत्याचार, शंका/अविश्वास आदि, व्यवसाय के अंग नहीं होते। जबकि अमेरिका या योरोप में व्यवसाय, युद्ध की परिणति थी; इस लिए, जापान के विपरीत, वहां, व्यवसाय की व्यवस्था में अत्याचार, प्रदूषण, भय, लालच, तुलना और शंका का अधिक प्रयोग होता है। जापान में वकील या न्याय या सरकार या इंस्पेक्टर की उतनी जरूरत नहीं होती जितना अमेरिका में है। जापान में व्यवस्था का सिद्धांत, अमेरिका से उल्टा है। जापान की तरह, ग्रामीण भारत में भी हर कार्य जैसे घर बनाना, खेत में बीज डालने, हल चलाने, फसल काटने, जन्म, विवाह के कार्य को धार्मिक उत्सव कहा जाता है, और ये सारे कार्य संगीत और प्रसन्नता से किए जाते थे। यही धर्म है। लेकिन, सिद्धांत के बदलने से, अब यह परम्परा समाप्त हो रही है, और लोग ठेके पर, हिसाब-किताब और हिंसा या पैसे के बल पर काम करवाते हैं, जिससे ये धार्मिक उत्सव के कार्य न रह कर, अत्याचार, युद्ध या जल्दी बाजी के प्रतीक और दोषपूर्ण होते जा रहे हैं। इस कारण अब दोष, प्रदुषण और अपराध के बढ़ने से, क्वालिटी कंट्रोल के लिए, भारत में भी उलटी सोच के पंडित जैसे, वकील, इंस्पेक्टर, जज, पोलिस, लेखाकार, और आडिटर की मांग बढ़ रही है। प्रकृति के विरुद्ध जाने से श्रम बढ़ता है; और उलटी सोच या सतर्कता के कार्यों में, बुद्धि को सृजनात्मक कार्य की तुलना में श्रम अधिक करना पड़ता है। मोहनदास गाँधी भी इंग्लॅण्ड से कानून की शिक्षा पायी थी, और वे अपराधियों और अंग्रेज सरकार का बचाव करते हुए, पैसों में लोट रहे होते, लेकिन उन्होंने न केवल अपने दिमाग के सोच के दिशा बदली बल्कि आदिवासी भारतीयों की वेश भूषा भी अपना ली। मन के इस विचित्र परिवर्तन ने उन्हें महात्मा बना दिया। इस सीधी सोच से, उनका श्रम (प्रकृति के विरुद्ध सोच) समाप्त हो गया, और वे आश्रम अर्थात जहाँ श्रम न हो, में रहने लगे। उनके निवास को आज भी साबरमती आश्रम कहते हैं।

व्यक्ति के चारित्रिक विकास और संगठनात्मक व्यवस्था में क्या सम्बन्ध है ?
व्यवस्था ही वह जल विद्युत् मशीन है जिस से पानी के अनियंत्रित बल को और उसके शांत स्वभाव को अलग अलग किया जाता है। संगठन ही वह प्रयोगशाला या चिकित्सालय है जिसमें व्यक्ति एक विशेष युद्ध या सर्जरी करवा कर, अपने चरित्र में सुधार ला सकता है। ज्ञान से प्राप्त निर्भयता और संवेदनशील होना चरित्र परिवर्तन का लक्ष्य है। इस चिकित्सालय से बाहर आकर मनुष्य को मनुष्यता का बोध होता है। विकास की इस क्रिया को निम्नलिखित उदाहरण से समझा जा सकता है। किसी संगठन में, व्यवस्था की शुरू में बहुत जरूरत होती है, और वह बहुत मजबूत रहती है; किंतु कालांतर में, चारित्रिक दुर्बलता के कम होने पर, वह स्वतः समाप्त हो जाती है।

१) शुद्र चरित्र: छोटी बुद्धि वाला, आतंकवादी या योद्धा या शासक जो अंहकार, शत्रु भाव, असुरक्षा और भय से संचालित है, और हार -जीत जिसका लक्ष्य है, जो अपनी प्रकृति को नही जान सकता और अपनी ही महत्वाकांक्षा का दास बन कर कठिन श्रम के लिए मजबूर है ( बिन लादेन) ;

२) वैश्य चरित्र: व्यवसायी, उद्योग, तकनीक या मनोरंजन क्षेत्र के प्राणी जिसका अंहकार, देने -लेने, नाप तौल, और कानून अपनाने से कम हो रहा है, और जो रचनात्मक प्रतिस्प्रधा, प्रदर्शन, नए अनुभव, और स्वार्थ से संचालित है और लाभ-हानि जिसका लक्ष्य है ( बिल गेट्स) ;

३) क्षात्र चरित्र: वैज्ञानिक, दार्शनिक, साहित्यकार, जिसमें कलाकार, लेखक या समाजसेवक भी शामिल हो सकते हैं, और जो बिना किसी संगठन के, अपनी मूल प्रकृति (स्वभाव) को जान कर , बिना श्रम किए, केवल स्वान्तः सुखाय कार्य करता है, और किसी अंहकार, शत्रु भाव व् संगठन से अलग है और धर्म-अधर्म (सही-ग़लत) जिसका लक्ष्य है (गाँधी, टेरेसा, आइंस्टाइन );

४) निर्गुण ब्राह्मण जो सत्य के लक्ष्य को प्राप्त है, और सत्य -असत्य से परिचित है (कृष्ण, राम, बुद्ध)।

स्वभाव में स्थिर मनुष्य (सोने की तरह) प्रतिक्रियाहीन और संवेदनशील होते हैं, और उनके कार्य सभ्यता (civilization) कहलाते हैं। यहाँ बल, भय, कानून, न्याय या दंड नहीं होते। सभ्यता का लक्ष्य मनुष्य की स्वतंत्रता या मोक्ष है। इसे ही विकास या (development) कहते हैं। Development is a journey from order to liberation. विकास की क्रिया मनुष्य के चिंतन से और ध्यान से प्राप्त होती है, व्यवस्था या संगठन से नहीं। स्वभाव में स्थिर मनुष्य को संगठन की जरूरत नहीं होती, न ही उनके लिए कोई व्यवस्था ही होती है। इन्हे कुल कहते है। कुल का उदाहरण है .... पक्षी के झुंड, या तीर्थ यात्री, जो एक दिशा में जाते हैं और किसी का किसी से गोपनीयता या प्रतिस्प्रधा या भय नहीं होता, किंतु वे एक दूसरे पर निर्भर भी नहीं होते। इसको समाज भी कहते हैं, क्योंकि सभी का लक्ष्य एक होने पर भी, प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान से अंहकार-रहित, समान और आत्मनिर्भर बने रहते हैं। भारत में आदिवासी जीवन, या विचारक जैसे कबीर, गाँधी, तुलसीदास, गुरु नानक, ज्ञान के निस्वार्थ प्रसार से, कुलपति या कुल-गुरु कहलाये; और उनके चले पंथ (मार्ग) पर लाखों लोग आदिकाल से निर्भर हैं। यह अध्यात्म का मार्ग है। कुल या समाज, एक खेत की तरह होता है, क्योंकि व्यक्तियों के मन में गुरु का डाला गया ज्ञान का बीज, कभी नष्ट नही होता, और उनकी बुद्धि उचित समय पर उस ज्ञान को संसार में कर्म के रूप में बढ़ते हुए देखती है। जबकि अज्ञान का बीज, मन के उस खेत में नष्ट हो जाते है, या उनके कार्य सीमित काल तक लाभ पहुंचाते हैं, और कुल नहीं बना पाते। कुल का, पारिवारिक या जन्म देने वाले व्यक्तियों से सम्बन्ध होना आवश्यक भी नहीं है। ज्ञान की खोज में लगे लोगों की संस्था को आज भी व्यवसाय या दुष्टों का संगठन नही कहते, उसे ऋषि-कुल, आश्रम, या विश्व०विद्यालय कहते हैं, और उसका नेता कुलपति कहलाता है। छात्र जिसे छत्रिय धर्म का ज्ञान होना चाहिए; उनका कार्य, ज्ञान की यात्रा या तीर्थ-यात्रा द्वारा तीनो गुण से या विकारों से मुक्त होना (अर्थात 'त्रि' गुण का 'क्षय') है। क्षत्रिय, जब तीनो गुण या विकारों से मुक्त हो जाता है, तब उसका वर्ण निर्गुण, निर्विकारी या ब्राह्मण हो जाता है।

भारत में राक्षसों का विशेष सम्मान होता रहा है जबकि पतित राक्षसों के वध की स्मृति में उत्सव होते हैं। राक्षस का जीवन व्यक्तिगत त्याग और संगठन के जिम्मेवारी की कठिन परीक्षा है। राक्षस, संस्कृत भाषा का शब्द है, यह, दरअसल, रक्षा करने वाले (जैसे पोलिस, जज, मिलिटरी, राजनेता, योद्धा या वर्दी में छिपे शक्ति-तंत्र ) को कहते हैं। इनमें मिश्रित गुण होते हैं, इसलिए ये, स्वयम असुर (भरोसे के लायक न) होते हुए भी, व्यवस्था को शत्रु-भाव, युद्ध या विरोधियों को तर्क से हराने के बाद, सतर्क रह कर चलाते हैं। न्याय, शक्ति, छल, धन के माध्यम से जितना सम्भव हो सकता है, संगठन बना कर रक्षा और व्यवसाय के ऊंचे लक्ष्य के कार्य में लोगों को लगाए रखने से शान्ति बनी रहती है। राक्षसों की अप्राकृतिक शक्ति से ही उद्योग और व्यवसाय सफल होते हैं तथा, संगठन और व्यवस्था के कमजोर होते ही, उद्योग और व्यवसाय समाप्त हो जाता है। क्षत्रिय और राक्षस योद्धा शत्रु नहीं होते, किंतु राक्षस, ( शत्रु भाव से संचालित हुए) किसी भी संगठन का स्वामी, हमेशा नहीं रह सकता और कभी न कभी अपनों के हाथ ही मारा जाता है। इसलिए राक्षस को कभी भी अपने संगठन, या उसके बल, या व्यवस्था के सिद्धांतों का गर्व नहीं करना चाहिए। भारत में, मनुष्यों के आदर्श या मर्यादा पुरूष को राजा कहते हैं। जो व्यक्ति अनुकर्णीय होता है, और जिस से लोग स्वेच्छा से प्रेरित हो जाते हैं, उसे राजा कहते हैं। राम, या गाँधी या कबीर कभी शासक होने के कारण नहीं जाने गए, बल्कि उनका व्यक्तित्व दुनिया के लिए एक आदर्श बन गया। इनका अनुकरण करने में कोई हानि नहीं है। हर समाज या कुल में राजा एक मार्ग दर्शक होता है। जबकि राक्षस, जैसे शासक, पोलिस या जज या अधिकारी या योद्धा जो संगठन की शक्ति के प्रतीक हैं, उनका आचरण कभी भी अनुकर्णीय नहीं होता। एक साधारण मनुष्य के लिए अपराधी बनने की स्वतंत्रता नहीं है, इसी तरह यदि वह स्वयं को जज मान कर न्याय के कार्य करे, या पोलिस तरह अस्त्र के प्रयोग से रक्षा या युद्ध करे, तो भी यह गैर कानूनी कहलाता है, और यह दंडनीय हो सकता है। संगठन में कार्य करना व्यवसाय है, इस लिए यहाँ स्वेच्छा भी नहीं होती, और भरोसा या अनुकरण करना भी उचित नहीं, और शत्रुओं से अपनी रक्षा करते हुए, नीति से ही लक्ष्य की प्राप्ति की जानी चाहिए।

व्यवस्था के लिए भूख (डिमांड) की अनिवार्यता।
भारत का ज्ञान दुनिया भर के लिए समस्या है। यहाँ प्रकृति में रचे बसे लोगों को व्यवस्था की जरूरत ही नहीं है। भूख के कारण ही लोग युद्ध या व्यवसाय करते हैं। जैसे जैसे भूख (demand) बढती है, लोंग अशांत होने लगते हैं। फलस्वरूप असुरक्षा, अपराध और बीमारी बढती है। भूख, अपराध और बीमारी के द्वारा व्यवस्था के सिद्धांत बनते है, जिस पर सरकार, चिकित्सा, न्याय और रक्षा के साधन निर्भर हैं। व्यवस्था चलाने वाले के हित में यही है की वे 'स्वभाव' (स्व+ भाव) को नष्ट करें और 'भाव' (शत्रुता, मूल्य, या दया ) का प्रयोग सीखें। भारत कभी एक विकसित सभ्यता रहा था किंतु दुर्भाग्य से उन मनुष्यों में विकास की परिभाषा का ज्ञान न रहा। अब उन्हें यह रास्ता पुनः सीखने के लिए अविकसित बनने के लिए एक नई व्यवस्था पर निर्भर होना पड़ रहा है। अविकसित होने की यह क्रिया ही शैतानीकरण या evilization है। इस क्रिया से शांत मनुष्य को अशांत और मिश्रित स्वभाव में बनने के लिए प्रेरित किया जाता है, और फ़िर उन्हें बल पूर्वक व्यवस्था से पुनः नियंत्रित कर, और फ़िर विकास के लिए पुनः लाया जाएगा। अविकसित (evilization) - विकासशील (devilization)- विकसित (civilization) का चक्र जान लेने पर ही इस चक्रवुय्ह से निकला जा सकता है। यही दिशा ज्ञान, शास्त्र (system) कहलाता है जिसके द्वारा मनुष्य का स्वभाव पतित (गिरने लायक ) नहीं होता।

Friday, July 10, 2009

ध्यानस्थ मन

जेम्स एलेन की प्रस्तुति

जेम्स एलेन द्वारा सौ वर्ष पूर्व लिखित यह "ध्यानस्थ मन", दुनिया भर में लाखों व्यक्तियों का प्रेरणा- श्रोत बन उनके आत्मिक विकास को विशेष रूप से प्रभावित करता रहा है. नार्मन विन्सेंट पेले, आर्ल नाइतंगल, डेनिस वेतले, और अन्थोनी राबिन्स जैसे तत्कालीन लेखक और विचारक उनमें शामिल हैं जो कि इस पुस्तक से प्रेरित हैं.

"ध्यानस्थ मन" से लिए गए शब्द .....

"मन, जब तक अपने को बाहरी परिस्थितियों से निर्मित मानता है, वह विचलित रहता है; किन्तु जब वह यह जान जाता है कि वह स्वयं में ही सृष्टि के बीज और भूमि का नियंत्रक है और वही उसका कारण है, जिससे कालांतर में सारा संसार भौतिक हो उठता है, तब अपने इस स्वभाव को पुनः प्राप्त कर, वह स्वतंत्र होता है.

मन में गिरे हुए या रोपे गए विचारों के बीज के जड़ को जब फैलने दिया जाता हैं, तब वह बीज अपने आप ही पौधा बन, परिस्थितियों और अवसर का लाभ लेकर फलित होता है. इस तरह, अच्छे विचार, अच्छे फल, और बुरे विचार बुरे फल देते हैं."

प्रार्थना [प्रथम शब्द]
यह छोटी सी प्रस्तुति जो मेरे ध्यान और अनुभव का फल है, विचार की उन असीमित शक्तियों के व्याख्या के लिए नहीं है जो पहिले से ही बहुत लिखा जा चुका है. यह एक सहायता भर है न कि ज्ञान के विस्तार का प्रयत्न. इसका लक्ष्य है कि लोगों को इस सत्य की खोज और उसके अनुभव, कि वे स्वयं ही अपने निर्माता हैं, के लिए प्रोत्साहित किया जाय.

अपने ही चुने हुए विचारों के प्रोत्साहन से, मन एक जुलाहे की तरह इन धागों से इस शरीर के लिए उसका चरित्र, नाम का एक आंतरिक कपडा बुनता है और बाहर के लिए, परिस्थितियों के नाम से एक अलग कपडा बुनता है. इन कपडों के होते हुए भी, अज्ञानता और दर्द सहने वाले, इस सत्य को जान, यदि चाहें, तो अपने लिए आह्लाद और प्रसन्नता का चुनाव कर सकते हैं.

असाधारण राजा का चरित्र भी असाधारण होता है, और इस असाधारण चरित्र के कवच के कारण, उन्हें कभी डर नहीं लग सकता.

जेम्स एलेन

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अध्याय 1: विचार और चरित्र
"जैसा एक मनुष्य का मन सोचता है, वही वह बन जाता जाता है" यह अंतर्ज्ञान, व्यक्ति के समूचे अस्तित्व को ही नहीं बल्कि, इतना ... व्यापक है कि उससे हर एक मानसिक दशा .. और जीवन की सभी परिस्थितियों को, समझा सकता है. मनुष्य वस्तुतः वही है जो उसे उसकी सोच बनाती है; और चरित्र, उसके सभी विचारों का एक जोड़ है.

जैसे कोई भी पौधा जो दिखता है, बिना बीज के नहीं हो सकता इसी तरह मनुष्य का हर एक प्रयत्न, किसी न किसी विचार के छुपे हुए बीज के बिना संभव नहीं है. यह दोनों अवस्था में बराबर है चाहे अचानक या बिना सोचे हुए हुआ हो, या जान बूझ कर किये गए हों.

कर्म, विचारों के बीज से बना एक पौध है, और प्रसन्नता या रोग उनके ही फल. इस लिए, मनुष्य को प्राप्त होने वाला मीठा या कडुआ फल, उसके अपने ही बाग़ की खेती से हैं.


मन के विचार हमें बनाते हैं. जो भी हम हैं, विचारों द्वारा पकाए गए, और निर्मित.
यदि विचारों में शैतानी है तो दर्द तो होगा, जैसे पहिये आगे हों और बैल उस गाडी को पीछे से धकेलता हो.
जो विचारों की शुद्धता के लिए प्रयत्नशील है, निश्चित है, कि आत्मिक आनंद, परछाई की तरह उसका पीछा नहीं छोड़ता
.

मनुष्य के विकास को निर्धारित करने वाला, एक शाश्वत सिद्धांत है; कोई आकस्मिक चमत्कार नहीं ! कारण और उसके प्रभाव की परस्पर निर्भरता उतनी ही सत्य और शाश्वत, मन के विचारों में होती है जितना कि साधारण दिखने वाले घटनाओं या पदार्थों में. ध्यान रहे, एक श्रेष्ठ और ईश्वरीय चरित्र को पाना किसी भाग्य या कृपा का फल नहीं होता; बल्कि यह निरंतर किये गए सही सोच का एक अवश्यम्भावी परिणाम, और ईश्वर के शुद्ध विचारों के साथ प्रेम पूर्वक रहने का प्रभाव है. एक आदर्श और शुद्ध चरित्र, विचारों की इस खेती में लगी निरंतर एकाग्रता और मेहनत का फल है.

मनुष्य ही है जो अपने को बनाता और बिगाड़ता है. अपने ही विचारों से बने अस्त्रों से वह आत्म हत्या करता है और उसके वही साधन हैं जिससे वह आनंद, सहनशीलता और शांति प्रदायक स्वर्गीय लोकों का निर्माण भी करता है. विचारों के सही चुनाव और सात्विक प्रयोग द्वारा ही उसे उत्तम दैवीय पद प्राप्त होता है, और विचारों के दुरूपयोग और गलत प्रयोग से, वह शैतान जैसा गिर भी जाता है. इन दोनों सिरों के बीच सारे चरित्र स्थित हैं, और हर-एक को बनाने वाला, और उनका मालिक, कोई न कोई मनुष्य ही है.

Saturday, July 4, 2009

ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म

८.१ अर्जुन उवाच
किं तद ब्रह्म, किं अध्यात्मं, किं कर्म, पुरुषोत्तम ?

हे पुरुषोत्तम श्री कृष्ण, वह जिसे आप ने ब्रह्म कहा है वह क्या है? अध्यात्म क्या है, और कर्म क्या है?

८.३ श्री भगवान उवाच
अक्षर ब्रह्म परमं, स्वभाव अध्यात्म उच्च्यते
भूत भाव उदभव करो, विसर्गः कर्म संजितः


अक्षर ब्रह्म परमं
जिसका नाश कभी नहीं होता, उसे ही ब्रह्म कहते हैं. उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक भी अब जान गए हैं कि प्रकृति की सभी शक्तियां और ज्ञान जो सभी वस्तुओं और जीव में निहित हैं वे ब्रह्म ही हैं क्योंकि उनका एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तन तो होता है. किन्तु नाश कभी नहीं होता. जो तत्व ज्ञानी, श्री कृष्ण द्वारा दी गयी ब्रह्म की इस परिभाषा को जान लेते हैं, वे ब्रह्म को समस्त विश्व में हर जगह और हमेशा देखते हैं.

स्वभाव अध्यात्म उच्च्यते
स्वभाव ( स्व अर्थात मौलिक और भाव अर्थात गुण) अर्थात मनुष्य का (सहज या निर्मल) स्वभाव ही अध्यात्म कहलाता है. अध्यात्म का मौलिक होना यह सिद्ध करता है कि यह बाहर से सीखा नहीं जा सकता, जो भय या प्रतिक्रिया या अपेक्षा से रहित है, और उसका प्रमाण वह स्वयं है. नवजात शिशु का स्वभाव, अध्यात्म का प्रत्यक्ष दर्शन है.

भूत भाव उदभव करो, विसर्गः कर्म संजितः
भाव, जो स्व+भाव नहीं है, और जो सीखा जा सकता है, प्रमाण द्वारा, तर्क से सिद्ध है, और प्रतिक्रिया या एक दूसरे की अपेक्षा के लिए होता है, उससे ही भौतिक संसार की सृष्टि होती है. इस प्रतिक्रिया में लगने वाले भाव जिस से सृष्टि का उदभव होता है,वही कर्म है.

अध्यात्म (अर्थात "स्व+भाव" ) में कर्म फल की अपेक्षा नहीं होती क्योंकि वह मौलिक या स्वयं से ही उद्भूत है जबकि "भूत + भाव " (अर्थात भौतिक या सांसारिक ज्ञान), कारण और फल (cause and effect) से बंधा है. संत तुलसी दास ने इसे इस तरह लिखा "करम प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करै, सो तस फल चाखा".

विश्व या संसार, एक रचित या प्रतिक्रिया से निर्मित कर्म-क्षेत्र है, इस युद्ध को ज्ञान और भगवत कृपा से विजय करने के उपरांत ही, अध्यात्म प्राप्त होता है. अर्थात, आत्मा में प्रवेश के लिए मन के द्वार एक एक कर खुलने लगते हैं. कर्म के फल शुभ और अशुभ दोनों ही हो सकते हैं,जिस पर उसका अधिकार नहीं होता, और भौतिक शास्त्र के प्रभाव और परिस्थितियां उसको करने के लिए विवश करती है. इस लिए कर्म फल के त्याग से ही, मनुष्य, कारण रूपी मन, और स्वभाव को जानने का प्रत्न कर सकता है.

८.१ अर्जुन उवाच
अधि भूतं च किं प्रोक्तम, अधि दैवं किं उच्च्यते ?

हे पुरुषोत्तम श्री कृष्ण,"अधि भूत" किसे कहते हैं, और आपने "अधि दैव" किसे कहा है?

८.२ अर्जुन उवाच
अधि यज्ञः कथं को अत्र देहे अस्मिन मधु सूदन
प्रयाण काले च कथं ज्ञयो असि नियतात्म भिः

हे मधु-सूदन श्री कृष्ण, आप के द्वारा जिसे "अधि यज्ञ" कहा गया है, जो इस देह में सदैव होता रहता है, वह क्या है? और इस देह धारण के काल की समाप्ति पर ज्ञात होने वाले, अर्थात आत्म ज्ञान में स्थिर होने की दशा क्या है?

८.४ श्री भगवन उवाच
"अधि भूतं" क्षरो भावः, पुरुष श्च "अधि दैव" तं
"अधि यज्ञ" अहम् वा अत्र देहे, देह भृताम वर


श्री कृष्ण उत्तर में कहते हैं, कि देह धारियों में श्रेष्ठ हे अर्जुन, भाव (भौतिक या सांसारिक प्रभाव) अर्थात प्रतिक्रियात्मक या सक्रिय तत्व जो स्वभाव नहीं है, उसका क्षय या कम होना ही "अधि भूत" है. इसका अर्थ है कि कर्म, (स्वभाव से या) मौलिक होना चाहिए, भाव से (मजबूरी, दिखावा, अंहकार, या भय या किसी अपेक्षा के कारण) नहीं. इसका अर्थ यह भी है कि (बौद्धिक) कर्म से (मन का) स्वभाव कभी नष्ट न हो. स्वान्तः सुखाय निष्काम कर्म उसका एक उदाहरण है. स्वभाव की रक्षा कर पाना ही वीरता है. अर्थात जो सही गलत को निष्पक्ष जानता है, दृढ निश्चयी है, वही वीर है.

मन की शुद्धता अर्थात पुरुष ही "अधि दैव" है. मन की शुद्धता, आत्म ज्ञान में प्रवृत्ति, भगवत भक्ति, और सांसारिक तत्वों के मूल कारण को जान लेने के संतोष से मिलती है. एक बार मन जब साफ़ होने लगता है, तो वह दुबारा सांसारिक गंदगी में नहीं जाना चाहता. उसकी इच्छाएं अपने आप शांत होने लगती हैं और देवताओं के सहयोग से वह इसमें सफल भी हो जाता है.

हे देह धारियों में श्रेष्ठ अर्जुन, मेरे अतिरिक्त "अधि यज्ञ" कौन है? अर्थात इस देह में "अधि यज्ञ" मैं (परमात्मा का स्वरुप) हूँ. देह की समाप्ति केवल एक जीवन या अनगिनित जीवन-मृत्यु की बात नहीं है, जब जब, प्राणी की चेतना या मन, पुनः देह धारण करता रहता है, उसे अपने मन में आत्म-ज्ञान का अनुभव नहीं होता. और, जब उसका ध्यान, इस ओर जाता है, उसका देह त्याग या प्रयाण या मोक्ष सफल हो जाता है.

शंकर भाष्य (शंका को दूर करने का प्रयास )

विश्व या संसार एक गतिशील रचना या एक फ्लक्स है, वह रुक नहीं सकती, इसलिए शरीर के संवेदक उपकरणों को वह वास्तविक लगती है. वास्तविक लगने वाला यह चल चित्र, सच इसलिए नहीं है क्योंकि हर व्यक्ति इसे अलग अलग तरह देखता और समझता है. भौतिक जगत में, हर क्रिया एक प्रतिक्रिया है और इस तरह सत्य को इस वास्तविक संसार या विश्व से अलग हुए बिना नहीं जाना जा सकता है. ध्यान, तर्क या ज्ञान के माध्यम, मृत्यु और जन्म के बीच का समय, या निद्रा- स्वप्न की स्थिति में, या असफलता और तिरस्कार किये जाने पर, सत्य और वास्तविक लगने वाले विश्व को अलग-अलग कर समझा जा सकता है. चेतना या समझने वाला या समझने की शक्ति, संसार का भाग होते हुए भी उससे अलग है, क्योंकि उसे वास्तविकता और सत्य में इस फर्क से बड़ी चिंता रहती है.

स्वाभाविक है कि वास्तविक लगने वाले, इस सापेक्षिक गति, या प्रतिक्रिया के कारण, और उसके कारण, और उसके कारण की लगातार खोज तब तक की जानी चाहिए जब तक इस संसार या विश्व का अंतिम आधार या मूल कारण न मिल जाय. और केवल तभी, प्रयोग द्वारा वैज्ञानिक खोज, या जीवन-मृत्यु, निद्रा-स्वप्न, या ज्ञान-ध्यान, असफलता-तिरस्कार की आवश्यकता न होगी. यह मूल प्रकृति (या मूल/ अंतिम कारण जिसके होने का कोई कारण नहीं हैं), जो संसार का आधार है वह अविनाशी है, और इस अविनाशी या अक्षर तत्व को ही ब्रह्म कहते हैं. इस ज्ञान की प्राप्ति से चित्त की स्थिरता ही मोक्ष है वह स्थिति जीवन- मृत्यु या काल-निद्रा में या त्याग- भोग सभी में, सम-भाव से रहने के लिए स्वत्रन्त्र है, मोक्ष, न तो त्याग (छोड़ देना) है, और न मोह, यह पूर्णता या योग या स्वतंत्रता का भाव है.

संसार की मूल प्रकृति (अंतिम कारण) के निरंतर खोज में अनगिनित जीवन लग सकता है इस लिए, जो महा पुरुष, सत्य को प्राप्त हैं या उसके समीप हैं, उनके बताये गए ध्यान मार्ग पर चलने से सुविधा हो सकती है, यही भक्ति (श्रृद्धा और विश्वास) है. चेतना, भक्त बनती है, जीव का शरीर और उसका व्यक्तित्व नहीं. इस लिए श्री कृष्ण, चेतना की अंतिम स्थिति हैं , अतः सभी जीवों की अधूरी चेतना उनका हिस्सा है. श्री कृष्ण, चेतना की गति द्वारा सदैव ही सुलभ हैं. यह रहस्य सिखाया नहीं जा सकता क्योंकि सभी इसे स्वतः जानते हैं. संसार जैसा भी है, उसका इलाज सांसारिक ज्ञान जिससे वह बना है, नहीं किया जा सकता. सरकारें या संगठन इस लिए ही स्थायी समाधान नहीं हैं. संसार से अलग हो कर ही उसे समझा जा सकता है चाहे संसार में रह कर अलग रहा जाय या एकांत में रहें. चेतना (वास्तविकता और सत्य के निर्णय की शक्ति) का विकास होने से सांसारिक इच्छाएं कम होती हैं और, इन्द्रियों और व्यक्तित्व के पूर्वाग्रह से उसे स्वतंत्रता मिलती है. जब तक जीव का स्वरुप जीव को मालुम नहीं होता, वह संसार से अलग नहीं हो पाता और इन्द्रियों और व्यक्तित्व पर आश्रित बना रहता है, और यही मोक्ष नहीं है.

ध्यान की निरंतरता से जान पाने वाले उस अविनाशी तत्त्व (मूल कारण, जिसके होने का आगे कोई कारण नहीं हैं) को ब्रह्म कहते हैं. उस ब्रह्म की खोज करने वाला उपासक (समीप जाने वाला), मन (स्वभाव, अध्यात्म) है. और मन का उपासक, बुद्धि (भूत भाव, भौतिक या सांसारिक लेन -देन का ज्ञान) है. शरीर (ज्ञान और कर्मेन्द्रियां) और अंहकार (व्यक्तित्व), बुद्धि के रक्षा कवच हैं. इस तरह, जीव (या चेतन देह-धारी, प्राणी) जो शरीर (संवेदन-ज्ञान, भौतिक कर्म और शक्ति संचार के उपकरण), अंहकार (नाम, पहिचान, व्यक्तित्व, सम्बन्ध ), बुद्धि (स्मृति, तर्क, विचार, भाव, चेष्टा ) , और मन (इच्छा, संकल्प, स्वभाव) का एक संग्रह है, और जिनके जन्म -मृत्यु का कारण भ्रम है और वह प्रकृति के गुणों (cause and effect) से चक्र से मोक्ष की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्न करता है. मन के यह शुद्ध होने की क्रिया या इस प्रयत्न, जिसमें बुद्धि एक पत्नी की तरह सहायक है, उसके अलग अलग तरीके हैं उसमें, कर्म (path of action), तप (path of inaction), और ज्ञान ( path of inquiy) और उनका मिश्रण है.

किन्तु, मन, ब्रह्म का उपासक तभी बना रह सकता है, जब बुद्धि का उसे सहयोग मिले. इस तरह, मन और बुद्धि द्वारा मिलकर की गयी ब्रह्म की उपासना ही अधि-यज्ञ या योग की क्रिया है जो मोक्ष कारक है. मन की पवित्रता को अधि-दैव या पुरुष बनना कहते है. और बुद्धि के अपने सीमित सांसारिक और व्यक्तित्व के पूर्वाग्रह से ऊपर हो कर सोचने की क्षमता को ही अधि-भूत कहते हैं. वही मन या पुरुष,"श्री मन" कहलाता है, और वही निर्विकार मति या बुद्धि ही "श्री मति" कहलाती है. श्रीमन और श्रीमति, लिंग सूचक शब्द नहीं हैं.

इस सिद्धांत को समझने के लिए कल्पना करें, मन अरबों वर्ष का या अनादि काल का एक बूढा है. वह मर नहीं सकता. इच्छानुसार वह कोई भी शरीर लेने के लिए समर्थ है. बुद्धि या श्री मति उसकी पत्नी है जो एक, दस, बीस या पचास वर्ष की हो सकती है जो शरीर में रहती है, और अपने सांसारिक गुणों से मन की सेवा करती है. पत्नी अर्थात बुद्धि का उद्देश्य, मन को उसकी मुक्ति के मार्ग पर स्थिर करना है. भला बुद्धि जो उम्र में इतनी छोटी है, बूढे मन को क्या समझा सकती है? मन भी मुक्ति चाहता है और उसे वास्तविक जगत के आधार सत्य तक पहुंचना है. जब मन को बुद्धि से वह ज्ञान मिलता है,जिससे तर्क, विवेक, ध्यान से उसके सभी शंका के समाधान हो, और इच्छाएं कम हों. इस स्वतंत्रता से काल-जयी सर्व-व्यापी मन प्रसन्न होता है और बुद्धि और शरीर को भय या असफलताएं नहीं मिलती और संसार में वह जीव साहसी और संतुष्ट बना रह सकता है. यह संतुष्टि, जो मन और बुद्धि की यज्ञ क्रिया है, प्रारब्ध ऐश्वर्य कहलाती है. इसका फल, मन को मूल प्रकृति या ब्रह ज्ञान की प्राप्ति या मोक्ष की प्राप्ति है.

हर एक अरबों वर्ष के पुरुष के लाखों में पत्नियाँ हैं जिसमें कुछ व्यभिचारी और कुछ सार्थक होंगी. इन सार्थक पत्नियों से प्राप्त प्रारब्ध या पूर्व जन्मो का ज्ञान, मन को अपनी वर्तमान जन्म में नयी पत्नी चुनने और उसका पालन करने में सहायक होती है. मन एक चेतना है, वह बंट भी सकता है, और जुड़ भी सकता है. जिस तरह, भौतिक शास्त्र की चेतना, मेकानिक्स, थर्मोदिनामिक्स, ओप्तिक्स में अलग अलग रह कर जिन्दा रहता है, उसी तरह जीव का मन, मूल प्रकृति की खोज में अलग अलग धाराओं में जीवित रहता है और ये धाराएँ पुनः जुड़ भी सकती हैं. काल और क्रम भी बदले जा सकते हैं, योनियाँ या शरीर रचना भी बदल सकती है. लेकिन मन, इस प्रारब्ध के संस्कार या संबंधों के कारण दूसरे मन को अवश्य जानता है, या मन की रूचि उनके इतिहास को जानना चाहेगी, भले ही उसकी नयी पत्नी, और उसका नया व्यक्तित्व इसका कारण न जाने. यह उसी तरह है, जैसे दो दोस्त बहुत समय के बाद जब मिलते हैं तब उनकी स्थितियां, व्यवसाय और व्यक्तित्व बदला होता है, किन्तु वे फिर भी दोस्त रहते हैं. संसार में, एक व्यक्ति दूसरे से विश्वास द्वारा तभी जुड़ता है, जब उसका प्रारब्ध एक हो, और आगे की दिशा भी एक हो. मन से मन मिलता है भले ही उनकी पत्निया (बुद्धि) और बच्चे (अंहकार) इसके विरोध में हों. इसके विपरीत यह भी होता है, कि व्यक्ति, शारीरिक या व्यवसाय या पद के अंहकार से सारा जीवन जुड़े तो रहें, किन्तु मन उस पर कभी ध्यान न दे. इसका प्रयोग हम सभी रोज ही देखते हैं. कोई भी मनुष्य अपना परिचय नहीं दे सकता. एक कलाकार जिसने जन्म से अब तक अरबों जीवन में अलग अलग भूमिका की है, वह कभी यह नहीं जान सकता कि वह अपना सही परिचय क्या दे? बुद्धि या स्मृति के माध्यम से, एक बार कोई परिचय देने के बाद वह स्वयं उससे बंध जाता है. मन के इस सिद्धांत का इतना महत्त्व है, कि आदमी जो प्राणी जगत का एक उदाहरण है, उसे अंग्रेजी में मैन और संस्कृत में मनुष्य भी कहा गया.

इच्छा-मृत्यु के सकल्प से बंधा मन, शरीर या बुद्धि से कभी बंधा नहीं होता क्योंकि वह इनका चुनाव कभी भी कर सकता है और उसके गलत चुनाव का फल भी भोगता है. जो पत्नी (बुद्धि) व्यभिचारिणी होती है, और अपने बूढे पति (मन) को मूर्ख बना कर सांसारिक कार्यों और भौतिक सुख की कामना करती है, मन की वह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है. उस जीव में साहस और संतोष नहीं पाया जाता. इस तरह, शरीर और बुद्धि, मन को व्यथित कर देते हैं और जीव को आत्म हत्या तक करनी पड़ सकती है.

आत्मा (ब्रह्म, योग, सत्य, अधि यज्ञ ), मन (स्वभाव, अधि आत्म, पुरुष, अधि दैव) ) और बुद्धि (कर्म, सृष्टि, सांसारिक व्यवहार, निर्वाह) की इस विशेष स्थिति में मन (श्री मन) और बुद्धि (श्री मति) ही चेतना हैं जिन्हें ब्रह्म लीन होना है. हर एक जीव में, मन पुरुष है, और बुद्धि स्त्री है. मन, अनादि जीवन-मृत्यु को झेल चुका वृद्ध पुरुष है जबकि बुद्धि, जन्म और मृत्यु के बीच के काल और भौतिक संसार की श्रृष्टि है. मन का संसार में बुद्धि, पति है, और अध्यात्म में, बुद्धि का पति मन है. अतः दोनों का पतिव्रत होना मोक्ष के लिए आवश्यक है. मन अपनी अधूरी इच्छाओं या अधूरे काम की पूर्ति के लिए ही संसार में पुनः जन्म लेता है जो बिना बुद्धि के सहयोग के संभव नहीं होता.

किन्तु मन के अपने प्रारब्ध से भटक जाने पर, बुद्धि अर्थात पत्नी का हरण हो जाता है. इस अवस्था में पुरुष (अर्थात पति) को अपनी और पत्नी की मर्यादा और धर्म की रक्षा के लिए, सांसारिक शत्रुओं और व्यवस्था के दोषों से युद्ध करना पड़ता है. श्री राम (श्री मन) और श्री मति सीता (बुद्धि) आदर्श हैं. किन्तु जब रावण ने श्री राम की बुद्धि अर्थात सीता जी का हरण कर लिया था, तब श्री राम अर्थात परम पुरुष (मन) भी इस संसार से विचलित हो गया. तत्पश्चात रावण का वध कर, सांसारिक व्यवस्था को ठीक करने के कारण ही, अवध (जहाँ वध न होता हो) के निवासी श्री राम एक आदर्श राजा कहलाये. कितना आश्चर्य है, कि अयोध्या के राजा राम, योद्धा के नाम से पूजित हैं. भारत में आज भी मनुष्य की बुद्धि रावण की व्यवस्था से हरण कर लिया गया है. आज भी उस रावण के हजारों हाथ और सर हैं जो कुत्सित व्यवस्था के प्रतीक हैं. गाँधी जो श्री राम के उपासक हैं, उन ने, उस समय की सरकारों से बिना किसी अस्त्र के, और जन साधारण व्यक्तियों को एक जुट कर, युद्ध किया, और राक्षसी संस्कारों का वध किया था. हर काल में, धर्म की रक्षा के लिए, राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी का जन्म होता रहता है, जिन्हें महा-पुरुष भी कहते हैं जो अपहृत बुद्धि, अर्थात नारी जगत को कुत्सित व्यवस्था से मुक्त करते हैं. आज का जगत, नारी-जगत (बुद्धि के विषय का संसार) है, जहाँ पुरुष या नर नहीं हैं. केवल इस लिए ही संत तुलसी दास ने नारी (विषयी जगत) को दंड पाने का अधिकारी कहा है. राम चरित मानस या भगवत गीता में पुरुष-स्त्री, नर- नारी, पति-पत्नी, श्रीमति-श्रीमन शब्द लिंग सूचक शब्द बिलकुल नहीं है.

जो पुरुष (मन), अपनी पत्नी (बुद्धि) कर हरण हो जाने पर उसे वापस प्राप्त करने के लिए युद्ध नहीं करता, वह क्षत्रिय नहीं, बल्कि वैश्य, वैश्या, या व्यवसायी है. वह पति, व्यवस्था से समझौता कर लेता है, और अपनी पत्नी (बुद्धि) को व्यभिचार या विषयों में जाने से नहीं रोकता, और उससे प्राप्त सांसारिक सुख का भोग करता है. इसके बावजूद मन, एक बुद्धि पर स्थिर नहीं रहता, और विषय की भूख मिटने के लिए, अन्य बुद्धियों का हरण भी कर लेता है. कालांतर में, पुरुष की संसार में रक्षा करने वाली बुद्धि, उस पति (पुरुष, मन) को लगभग त्याग देती है जिससे शरीर में रोग, दुर्घटना या शत्रुता से मृत्यु हो जाती है, या मन स्वयं आत्म हत्या कर लेता है. इस तरह, जीवन निरर्थक हो जाता है.

द्वापर युग में श्री कृष्ण ने न तो श्री राम की तरह युद्ध का आदर्श प्रस्तुत किया और न ही व्यवसाय का. योग प्रणेता श्री कृष्ण रण-छोड़ कहलाये और महा भारत में, उन्होंने अस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की. उन्होंने जीवन को ज्ञान और कर्म द्वारा समझ लेने की प्रेरणा दी जिस से अंहकार (व्यक्तित्व ) का त्याग प्राप्त होता है, और सभी अनुभव बिना उस से बंधे हुए ही प्राप्त हो सकते हैं. भगवत गीता, मन और बुद्धि के नियोग के मार्ग को ठीक ठीक सिखलाता है.

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Krishna Gopal (KG) Misra
e-mail : qualitymeter@gmail.com,

Thursday, July 2, 2009

जल का अध्यात्म

भारत देश कभी हिंदुस्तान के नाम से भी जाना जाता था. वेदों और पुराण के संस्कृत वांग्मय में सिन्धु, समुद्र को कहते हैं. कालांतर में एक नदी जो अब पाकिस्तान में से हो कर बहती है उसे भी सिन्धु नदी कहा गया. और आज का प्रचलित शब्द हिन्दू, उसी सिन्धु अर्थात समुद्र का अपभ्रंश है क्योंकि फारसी लोग़ आज भी “श” को “ह” ही बोल पाते हैं. उसी पाकिस्तान के नाम से जाने वाले देश में सिंध नाम का एक प्रान्त आज भी है जो सिन्धु या समुद्र का अपभंश है. इसी तरह, इंडिया नाम भी ग्रीक लोगों की जिह्वा की देन है जो सिन्धु को इंदु या इंदस कहते थे. इस कारण, फारसी लोगों का हिंदुस्तान, और ग्रीक लोगों का इंडिया, दरअसल संस्कृत में "सिन्धु" (या सामुद्रिक) देश का नाम है. हिन्दू, वह सभ्यता है जिसने असीमित जल के श्रोत "सिन्धु" को जीवन का और आस्था का आधार बनाया, और उसी नाम से जाना जाता रहा.

एक कौआ सफ़ेद नहीं हो सकता क्योंकि उसके नाम में ही काला रंग है किन्तु दुर्भाग्य से इंडिया या हिंदुस्तान, या सिन्धु (सिंध) देश जिसके नाम और शब्द रचना एवं संविधान में जल है, वहां शहरों में आज जल पीने के लिए भी उपलब्ध नहीं है. भगवान जाने ! जहाँ जल का स्थान नहीं, वह हिंदुस्तान या इंडिया या सिंध देश कब तक कहलायेगा?

भारत ही दुनिया का एक ऐसा देश है जहाँ जल का अध्यात्म से सम्बन्ध सार्वजनिक है. यहाँ प्रायः सभी जानते हैं कि गंगा, यमुना, कावेरी, नर्मदा, गोदावरी, सरयू आदि नदियाँ, वैकुण्ठ में रहने वाली प्रकृति की संचालक देवियों के ही सांसारिक स्वरुप हैं. और इस कारण, उनके इन सांसारिक स्वरुप को "माँ" जो हर प्राणी के जीवन की रक्षा करती है, कहा गया. उदाहरण के लिए गंगा एक नदी ही नहीं, वह गंगा मैया है. मरते समय आज भी पारंपरिक भारतीय लोग़ मुह में गंगा जल डालते हैं ताकि उन्हें यह संतोष रहे कि वे जीवन के अंतिम क्षणों में भी अपनी गंगा माँ से जुड़े हुए हैं. उनका अध्यात्म यह जानता है कि एक माँ की रक्षा ही उसे जीवन के आगे की यात्रा में काम आएगी. जीवन की रक्षा करने वाली माँ को किसी भी प्रदूषण से बचाना, हर सुपुत्र का प्रथम कर्त्तव्य है.

आज भी भारत के विशाल क्षेत्र में प्रतीकात्मक शिव मंदिर हैं. यथार्थ में, मंदिर मन के भीतर के स्थान को कहते हैं. उस मन में, गंभीर चिंतन द्वारा यह जाना जा सकता है कि भगवान शिव, भौतिक (व्यक्त, भव, भूत) और ब्रह्म (अव्यक्त,अविनाशी ज्ञान ) दोनों लोकों के ज्ञाता हैं, वैज्ञानिक भी अब यह जान गया है कि जीवन की उत्पत्ति जल से होती है; और जल की उत्पत्ति का कारण वे परिस्थितियां हैं जहाँ भौतिक या जड़ प्रकृति और ब्रह्म रुपी ज्ञान का मेल हो सकता है. उन परिस्थितियों में एक, “शिव (अति कल्याणकारी, संवेदनशील)” है जो मूल प्रकृति (रूट काउस) की वह परिस्थिति है जिसे जीवन दायनी गंगा (अर्थात जल) के आविष्कार के लिए मुख्य रूप से जाना जाता है. जो भी उस शिव अर्थात अचल ध्यान की स्थिति को, तत्व से जानता है, वही प्राणी शिव है.

आज भी, मनुष्यों द्वारा बनाये गए आस्था के मानस चित्रों में शिव के सांकेतिक गूढ़ रहस्य का फारमूला छिपा है. जिसमें एक समाधिस्त व्यक्ति की कल्पना की गयी है जिसके मस्तिष्क में जल का एक भाग है. इस स्मृति को सदैव ताजा रखने के लिए ही प्रतीकात्मक शिव मंदिर में, या सूर्य को अर्घ देने के लिए जल के प्रयोग की परंपरा बनी थी. भगवान शिव की मूर्ति को जल सिर्फ इस प्रदर्शन के लिए ही चढाया जाता है कि लोगों में यह जागृति है कि वे जल का महत्त्व समझते हैं और उसे प्रदूषण से बचा पा रहे हैं; और, शिव द्वारा आविष्कृत जल, पृथ्वी पर स्वच्छ और सर्व सुलभ है. औद्योगिक या भोग-वादी सृजन में जल के दुरूपयोग की सांसारिक घटना ही समुद्र मंथन का चरित्र है. जो सृजन, अप्राकृतिक प्रयोग से चिरस्थायी नहीं हैं, उसके लिए श्रम और मानसिक युद्ध को ही समुद्र मंथन कहते हैं. आज जो हम देखते हैं, कि औद्योगिक कचरा, भोग-रोग की उत्पत्ति और विपरीत आर्थिक समाधान से, जीवन का अध्यात्म नष्ट हो गया है. हर मनुष्य एक रोबोट या मशीन बनने की होड़ में है. हम किसलिए शक्तिशाली हैं जब संवेदनशील नहीं ? जल (जो जीवन का आधार है,) संवेदनशीलता का प्रतीक है. और जब समुद्र मंथन में, प्राणियों की संवेदनशीलता नष्ट हो रही थी, तब, भगवान शिव अर्थात विशेष ज्ञान द्वारा बनी परिस्थितियों ने उस हलाहल विष का पान किया था.

कलियुग में आर्थिक विकास का आधार विचित्र है. मृत्यु -बीमारी, भूख - खपत, और अपराध-अप्राकृतिक जीवन शैली ही आर्थिक विकास का माप-दंड हैं. दवाएं और हास्पिटल के आर्थिक विकास का कारण औद्योगिक कचरा, बीमारी और मृत्यु के भय की वृद्धि हैं. बाज़ार के आर्थिक विकास का कारण मूलभूत प्राकृतिक संसाधन का नष्ट होना, उसकी कमी, असुरक्षा का डर, भूख और संग्रह की प्रवृति है. न्याय, युद्ध के उपकरण/ रक्षा के साधन और सरकारी व्यवस्था के विकास का आधार, अपराध और अपराधी हैं. अर्थ शास्त्र का एक सूत्र (ला आफ डिमिनिशिंग युटिलिटी) यह कहता है कि जो जितना भूखा, बीमार या अपराधी होगा, वही अधिक कीमत देगा. और जैसे जैसे यह भूख (डिमांड)कम होगी, बाज़ार में मूल्य गिरेंगे और आर्थिक विकास की दर गिरेगी. केवल पेट भरने या भूख मिटने से कोई संतुष्ट नहीं होता, संतुष्ट तभी हुआ जा सकता है, जब प्रकृति (मूल कारण ) के चक्र का ज्ञान हो. किसान या साहित्यकार या संत सदैव ही संतुष्ट होते हैं क्योंकि वे साक्षात प्रकृति को जानते हैं, और उनका जीवन धन या व्यापार पर निर्भर नहीं होता. वे निर्धन तो हो सकते हैं किन्तु दरिद्र नहीं. जल का अध्यात्म पेट की भूख को मिटा कर,दरिद्रता के कारण को दूर करता है. याद रहे, भूखे और दरिद्र (असंतुष्ट) ही बाज़ार की शक्ति हैं. भारतीय ग्रंथों में धन हीन व्यक्ति को दरिद्र कभी नहीं कहते, बल्कि असंतुष्ट और असंवेदनशील व्यक्ति को दरिद्र कहते हैं भले ही वह दिखने में अरबपति ही हो. आर्थिक विकास की गलत समझ ही विश्व विनाश का कारण है.

एक कहावत है कि एक समूचा, उसके टुकड़े टुकड़े के जोड़ से कहीं बड़ा होता है. एक कार की कीमत, उसके पुर्जों को अलग अलग कर बेचने से नहीं निकाला जा सकता. सभी के अलग अलग बाथ-रूम के जोड़, एक नदी या तालाब का महत्व से हमेशा कम ही होगी. बाथ-रूम का जल, गंगा मैया नहीं है, उसे खरीदा हुआ जल कहते हैं जबकि माँ खरीदी हुयी नहीं होती. जल के बाजारीकरण के कारण, नदियों का अध्यात्मिक (माँ का) स्वरुप अब नहीं रहा जिस पर पशु, पक्षी, वृक्ष, मनुष्य सभी निर्भर हैं, और जहाँ जल का कोई खरीद या मूल्यांकन नहीं होता और कभी कमी नहीं हो सकती. जल के इस सार्वजनिक स्वरुप के दर्शन के लिए ही भारत के परपरागत त्योहारों या विशेष तिथियों को नदियों में स्नान करने का आध्यात्मिक महत्व है. जल की इस सार्वजनिक और आध्यत्मिक श्रृद्धा के कारण, भारतीय समाज में विघटन और विरोध नहीं हो सका. हमें यह सोचना चाहिए कि कैसे जल की भावना हर व्यक्ति को जोड़े, न कि उसे एक उपभोक्ता वस्तु समझ कर समाज को तोडे. भारतीय कल्चर (सार्वजनिक)और बाथ-रूम कल्चर (बाज़ार) भिन्न भिन्न हैं. भारतीय सभ्यता में राष्ट्रपति या शासक के निवास, और ऋषियों के आश्रम नदियों के तट पर होते थे. मोहन दास गाँधी जो आज के भारतीय शासकों के धर्म-संकट (जिसे न अपना सकते, और न भूल सकते ) हैं, वे साबरमती नदी के तट पर रहते थे. गाँधी को महात्मा कह कर, उनसे अलग भागने की जरूरत नहीं है. यदि यह परंपरा लुप्त न होती, और भारत के शासक दिल्ली के यमुना तट पर निवास करते और यमुना में रोज प्रातः स्नान करते, तो किसी की हिम्मत उसे प्रदूषित करने की न होती. लेकिन शासक, अब बाथ-रूम पर करोडो रूपये खर्च करते हैं, और इस तरह पारंपरिक सार्वजानिक सम्पदा और धर्म का आचरण दूषित हो गयी.


जल को सिर्फ एक रसायन या वैज्ञानिक तत्व समझना भूल है. जिन्हें हम वैज्ञानिक कहते हैं, वे इतने मासूम नहीं होते जैसे दिखते हैं. वे दक्ष (कुशल, शक्तिशाली ) तो हैं किन्तु शिव (संवेदनशील) नहीं. भारतीय ग्रंथो में दक्ष व्यक्तियों को बकरे का मुख लगा दिखाया जाता है क्योंकि अंहकार के कारण, उसके मनुष्य सिर को काटना पड़ा था. उनकी कुटिलता उनके अध्यात्म के नष्ट होने से पैदा होती है. कचहरी में काले कपडे में वकील घूमते देखे जाते हैं, लोग़ उनको उनके कपडे से जानते हैं उनके चेहरे से नहीं. महाभारत के धृत-राष्ट्र की तरह वकील भी अँधा नहीं होता बल्कि उसने अपने आँखों पर काली पट्टी बांध रखी है. वह प्रमाण से बंधा है, यदि प्रमाण न हों तो वह सही बात को भी नहीं मानेगा. वैज्ञानिक भी एक वकील हैं और भयानक तर्क करते हैं. कालांतर में उनका हर तर्क और ज्ञान मिथ्या पाया जाता है. जिस तरह, वकील निस्वार्थ नहीं होता, वैज्ञानिक भी निस्वार्थ नहीं होता. इस आर्थिक रहस्य के कारण, वकीलों से कभी अपराध कम नहीं किये जा सकते, और वैज्ञानिक से कभी उद्योग कम नहीं हो सकते. उद्योग और अपराध का चोली दामन का साथ रहता ही है. बाज़ार के अर्थ शास्त्र और भौतिक विज्ञान की मिली जुली सोच से जल की इस विपत्ति का निदान नहीं हो सकता. एक सच्चे वैज्ञानिक अलबर्ट आइन्ताइन ने यह कहा है कि परिस्थितियों को पैदा करने वाली परिस्थितियों से उसका इलाज नहीं निकलता. विश्व में जल की विपत्ति तभी समाप्त हो सकती है जब प्रत्येक मनुष्य में जल के सर्वव्यापी, पूर्ण आध्यात्मिक स्वरुप का ज्ञान होगा, और जल के प्राकृतिक श्रोत और नदियों पर किसी व्यक्ति, बाज़ार, सरकार या किसी संगठन का अधिकार नहीं होगा.

वैज्ञानिक अपना कर्त्तव्य भूल गए हैं. एक अमेरिकी दार्शनिक गालब्रेथ, जो दुर्भाग्य से अर्थशास्त्री था और जो भारत में राजदूत बन कर आया था, यह कह चुका है कि जहाँ सचरित्र वैज्ञानिक होंगे, आर्थिक विकास की सम्भावना नहीं हो सकती. आर्थिक सफलता, दरिद्रता, भूख और मूल्य वृद्धि का सूचक है, और वैज्ञानिक सफलता द्वारा प्राकृतिक शक्तियों और ज्ञान के कारण दरिद्रता हो ही नहीं सकती. जीने की कला और प्रकृति से प्रेम ही उद्योग और बाज़ार के चकाचौंध की भूख की दवा है. भारत में जल की विपत्ति, यहाँ के लोगों में वैज्ञानिक और अध्यात्मिक सोच की कमी से हुयी है.

प्रकृति द्वारा जल का वितरण वर्षा, कुएं, या तालाब या नदी से होता है. इन स्थानों का प्रदूषण से बचाना हर एक व्यक्ति का कार्य है. जल की मात्रा जल के दुरूपयोग से कम होती है, उसके सदुपयोग से नहीं. एक सामाजिक व्यवस्था होनी चाहिए कि कुए या तालाब सार्वजानिक हों, व्यक्तिगत या संगठन के द्वारा न हों. जल को लेने का तरीका सभ्यता पूर्ण हो, जैसे माँ से बच्चे दूध लेते हैं, इस लिए मोटर या बिजली से चलने वाले उपकरण से जल न निकाला जाय. इस तरह, लोगों को शारीरिक श्रम उतना कम होगा जितना जल स्तर ऊपर होगा. यह स्वतः नियंत्रण है. कुए और तालाब की सामाजिक प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की जाय और विवाह, संतान के जन्म और मृत्यु पर कुएं की सफाई और उसकी मरम्मत हो. यह भारतीय परम्पराए, अब लुप्त हो गयीं हैं. कारण और उसके निदान बहुत हो सकते हैं किन्तु कारणों के कारण और उसके मूल कारण की खोज करने से व्यवस्था की नयी सोच मिलती है. यह परिकल्पना आदिम नहीं है बल्कि भविष्य की जरूरत है. जल का कोई अन्य प्रबंध, जल की कमी को बढायेगा और युद्ध का कारण बनेगा. शिव के मष्तिष्क में जल की तरह सर्प भी है जो मृत्यु का प्रतीक है. अर्थात, जल के महत्व को न समझने वालों के लिए मृत्यु श्रेय है. गंगा नदी या हिम श्रोत के सूखने या गर्मी के बढ़ने से क्या कम मृत्यु होगी? बिजली, पर्यटन और उद्योग बेचने के लालच का फल है कि भारत के पर्वतीय क्षेत्र जैसे नैनीताल, जो पहिले बिना किसी प्रयत्न के ठंडा रहता था, वहां अब एयर कंडिशनर की जरूरत होने लगी है. वृक्ष और हरियाली का स्थान कंक्रीट के महलों ने ले लिया है, और मूल निवासी असहाय रह इस विकास को देख रहे हैं. जल का व्यावसायिक लाभ लेने वाले क्या पर्वतीय वातावरण के इस हानि और स्वाभाविक व्यवहार की गिरावट की क्षतिपूर्ति कर सकते हैं? बढती गर्मी से बचाव के लिए एयर कन्डीशन, बीमारी और मृत्यु से बचाव के लिए दवाई और अस्पताल का व्यवसाय, बढ़ते अपराध से बचाव के लिए सरकार और न्याय व्यवस्था के प्रकोप से किसको लाभ होगा?

एक कहावत है कि ठंढ से बचने के लिए कोई अपना घर नहीं जला देता. जबकि आर्थिक विकास को ठंढ, घर उजाड़ देने, या जला देने से ही मिलती है. पर्वतीय क्षेत्र का विकास एक उदाहरण है. जो लोग घर में खाना बनाने, सर्दी से बचने, और भवन निर्माण के लिए जंगल से लकडी लाते थे, और उनका यह सम्बन्ध पुरातन था, किन्तु उसे अब गैर-कानूनी माना जाता है. वे निवासी पहिले वृक्षों की पूजा, देख रेख, और उनकी वंश वृद्धि करते थे और उनका यह पारंपरिक सम्बन्ध धर्म कहलाता था. जंगलों को सरकारी संपत्ति घोषित कर वन विभाग ने आर्थिक विकास का एक नया प्रयोग शुरू किया. जंगलों के लकडी को बेचने के लिए बोली लगने लगी और दूर के शहरों में रहने वाले, उन जंगलों को काटने आ गए. स्वाभाविक है, पर्वतीय निवासी पेड़ तो उगा सकते हैं, किन्तु पैसे नहीं. फल स्वरुप, पर्वतीय निवासियों को कालांतर में, लकडी काटने और माल ढोने का मजदूर बना दिया और धन ने उनके एक-जुटता के बीच, एक दरार पैदा कर दी. उनके जंगलों से लकडी काटने और उपयोग पर पाबदी लग गयी. लकडी काटने वालों को सजा होने लगी, और उन्हें चोर और अपराधी माना गया. बोली लगा कर, आरे मशीन से जंगल काटना कानूनी जुर्म नहीं है, किन्तु घर बनाने, चूल्हे के लिए, पशुओं के चारे के लिए जंगल के उपयोग को चोरी या अपराध माना गया. एक कहावत है कि एक महारानी ने यह आदेश दिया कि यदि रोटी की कमी हो, तो जनता केक क्यों नहीं खाती? इस कहावत को ध्यान रख, सरकार ने कृपा कर, उन्हें गैस के चूल्हे, रिश्वत खा कर, और ऊंचे मूल्य पर, उपलब्ध कराये. आज पर्वतों में, रेगिस्तान से आये हजारों किलोमीटर से आयात की गयी गैस से खाना बनाना सिखाया गया है. इस तरह, गैस को खरीदने के लिए पैसा कमाना उनकी नयी मजबूरी बनी और यह परतंत्रता आर्थिक विकास कहलाया. आर्थिक विषय ने, पर्वतीय समाज को ऊर्जा के पारंपरिक स्वावलंबन और प्राकृतिक पुनर्जन्म के श्रोत से अलग कर दिया. यह नव-जीवन एक धर्म-संकट भी बन गया, और अब वृक्षों और पर्वतीय निवासी के बीच का धर्म, केवल अन्धविश्वास और कर्मकांड, और सड़क पर चिपकाए गए वन विभाग के उपदेशों तक सीमित है. मिट्टी, जो जीवन के आधार है, को एक निर्जीव किन्तु मूल्यवान ईंट बनाने में पांच मिनट से अधिक समय नहीं लगता किन्तु उसी ईंट को मिट्टी बनाने में हजारों वर्ष लगते हैं. जलने के लिए जल नहीं चाहिए. आर्थिक संताप की भट्टी में,मनुष्य का स्वभाव इसी तरह बदल जाता है. आध्यात्मिक, धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक सभी प्रेम के बंधन टूट जाते हैं, और मनुष्य निर्जीव हो, आत्मनियंत्रण खो देता है. उनके स्वभाव में यह परिवर्तन साफ देखा जा सकता है. अब यह कहावत समझना आसान है. अर्थात, जंगलों के व्यवसायीकरण और पर्वतीय निवासियों के धर्म नष्ट होने से ठंढ तो समाप्त हो गयी किन्तु घर जल गया. यही आर्थिक संताप है, और जल की विपत्ति उद्योग और व्यवसाय का एक नया खेल.


कृष्ण गोपाल
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