Saturday, July 4, 2009

ब्रह्म, अध्यात्म और कर्म

८.१ अर्जुन उवाच
किं तद ब्रह्म, किं अध्यात्मं, किं कर्म, पुरुषोत्तम ?

हे पुरुषोत्तम श्री कृष्ण, वह जिसे आप ने ब्रह्म कहा है वह क्या है? अध्यात्म क्या है, और कर्म क्या है?

८.३ श्री भगवान उवाच
अक्षर ब्रह्म परमं, स्वभाव अध्यात्म उच्च्यते
भूत भाव उदभव करो, विसर्गः कर्म संजितः


अक्षर ब्रह्म परमं
जिसका नाश कभी नहीं होता, उसे ही ब्रह्म कहते हैं. उदाहरण के लिए, वैज्ञानिक भी अब जान गए हैं कि प्रकृति की सभी शक्तियां और ज्ञान जो सभी वस्तुओं और जीव में निहित हैं वे ब्रह्म ही हैं क्योंकि उनका एक रूप से दुसरे रूप में परिवर्तन तो होता है. किन्तु नाश कभी नहीं होता. जो तत्व ज्ञानी, श्री कृष्ण द्वारा दी गयी ब्रह्म की इस परिभाषा को जान लेते हैं, वे ब्रह्म को समस्त विश्व में हर जगह और हमेशा देखते हैं.

स्वभाव अध्यात्म उच्च्यते
स्वभाव ( स्व अर्थात मौलिक और भाव अर्थात गुण) अर्थात मनुष्य का (सहज या निर्मल) स्वभाव ही अध्यात्म कहलाता है. अध्यात्म का मौलिक होना यह सिद्ध करता है कि यह बाहर से सीखा नहीं जा सकता, जो भय या प्रतिक्रिया या अपेक्षा से रहित है, और उसका प्रमाण वह स्वयं है. नवजात शिशु का स्वभाव, अध्यात्म का प्रत्यक्ष दर्शन है.

भूत भाव उदभव करो, विसर्गः कर्म संजितः
भाव, जो स्व+भाव नहीं है, और जो सीखा जा सकता है, प्रमाण द्वारा, तर्क से सिद्ध है, और प्रतिक्रिया या एक दूसरे की अपेक्षा के लिए होता है, उससे ही भौतिक संसार की सृष्टि होती है. इस प्रतिक्रिया में लगने वाले भाव जिस से सृष्टि का उदभव होता है,वही कर्म है.

अध्यात्म (अर्थात "स्व+भाव" ) में कर्म फल की अपेक्षा नहीं होती क्योंकि वह मौलिक या स्वयं से ही उद्भूत है जबकि "भूत + भाव " (अर्थात भौतिक या सांसारिक ज्ञान), कारण और फल (cause and effect) से बंधा है. संत तुलसी दास ने इसे इस तरह लिखा "करम प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करै, सो तस फल चाखा".

विश्व या संसार, एक रचित या प्रतिक्रिया से निर्मित कर्म-क्षेत्र है, इस युद्ध को ज्ञान और भगवत कृपा से विजय करने के उपरांत ही, अध्यात्म प्राप्त होता है. अर्थात, आत्मा में प्रवेश के लिए मन के द्वार एक एक कर खुलने लगते हैं. कर्म के फल शुभ और अशुभ दोनों ही हो सकते हैं,जिस पर उसका अधिकार नहीं होता, और भौतिक शास्त्र के प्रभाव और परिस्थितियां उसको करने के लिए विवश करती है. इस लिए कर्म फल के त्याग से ही, मनुष्य, कारण रूपी मन, और स्वभाव को जानने का प्रत्न कर सकता है.

८.१ अर्जुन उवाच
अधि भूतं च किं प्रोक्तम, अधि दैवं किं उच्च्यते ?

हे पुरुषोत्तम श्री कृष्ण,"अधि भूत" किसे कहते हैं, और आपने "अधि दैव" किसे कहा है?

८.२ अर्जुन उवाच
अधि यज्ञः कथं को अत्र देहे अस्मिन मधु सूदन
प्रयाण काले च कथं ज्ञयो असि नियतात्म भिः

हे मधु-सूदन श्री कृष्ण, आप के द्वारा जिसे "अधि यज्ञ" कहा गया है, जो इस देह में सदैव होता रहता है, वह क्या है? और इस देह धारण के काल की समाप्ति पर ज्ञात होने वाले, अर्थात आत्म ज्ञान में स्थिर होने की दशा क्या है?

८.४ श्री भगवन उवाच
"अधि भूतं" क्षरो भावः, पुरुष श्च "अधि दैव" तं
"अधि यज्ञ" अहम् वा अत्र देहे, देह भृताम वर


श्री कृष्ण उत्तर में कहते हैं, कि देह धारियों में श्रेष्ठ हे अर्जुन, भाव (भौतिक या सांसारिक प्रभाव) अर्थात प्रतिक्रियात्मक या सक्रिय तत्व जो स्वभाव नहीं है, उसका क्षय या कम होना ही "अधि भूत" है. इसका अर्थ है कि कर्म, (स्वभाव से या) मौलिक होना चाहिए, भाव से (मजबूरी, दिखावा, अंहकार, या भय या किसी अपेक्षा के कारण) नहीं. इसका अर्थ यह भी है कि (बौद्धिक) कर्म से (मन का) स्वभाव कभी नष्ट न हो. स्वान्तः सुखाय निष्काम कर्म उसका एक उदाहरण है. स्वभाव की रक्षा कर पाना ही वीरता है. अर्थात जो सही गलत को निष्पक्ष जानता है, दृढ निश्चयी है, वही वीर है.

मन की शुद्धता अर्थात पुरुष ही "अधि दैव" है. मन की शुद्धता, आत्म ज्ञान में प्रवृत्ति, भगवत भक्ति, और सांसारिक तत्वों के मूल कारण को जान लेने के संतोष से मिलती है. एक बार मन जब साफ़ होने लगता है, तो वह दुबारा सांसारिक गंदगी में नहीं जाना चाहता. उसकी इच्छाएं अपने आप शांत होने लगती हैं और देवताओं के सहयोग से वह इसमें सफल भी हो जाता है.

हे देह धारियों में श्रेष्ठ अर्जुन, मेरे अतिरिक्त "अधि यज्ञ" कौन है? अर्थात इस देह में "अधि यज्ञ" मैं (परमात्मा का स्वरुप) हूँ. देह की समाप्ति केवल एक जीवन या अनगिनित जीवन-मृत्यु की बात नहीं है, जब जब, प्राणी की चेतना या मन, पुनः देह धारण करता रहता है, उसे अपने मन में आत्म-ज्ञान का अनुभव नहीं होता. और, जब उसका ध्यान, इस ओर जाता है, उसका देह त्याग या प्रयाण या मोक्ष सफल हो जाता है.

शंकर भाष्य (शंका को दूर करने का प्रयास )

विश्व या संसार एक गतिशील रचना या एक फ्लक्स है, वह रुक नहीं सकती, इसलिए शरीर के संवेदक उपकरणों को वह वास्तविक लगती है. वास्तविक लगने वाला यह चल चित्र, सच इसलिए नहीं है क्योंकि हर व्यक्ति इसे अलग अलग तरह देखता और समझता है. भौतिक जगत में, हर क्रिया एक प्रतिक्रिया है और इस तरह सत्य को इस वास्तविक संसार या विश्व से अलग हुए बिना नहीं जाना जा सकता है. ध्यान, तर्क या ज्ञान के माध्यम, मृत्यु और जन्म के बीच का समय, या निद्रा- स्वप्न की स्थिति में, या असफलता और तिरस्कार किये जाने पर, सत्य और वास्तविक लगने वाले विश्व को अलग-अलग कर समझा जा सकता है. चेतना या समझने वाला या समझने की शक्ति, संसार का भाग होते हुए भी उससे अलग है, क्योंकि उसे वास्तविकता और सत्य में इस फर्क से बड़ी चिंता रहती है.

स्वाभाविक है कि वास्तविक लगने वाले, इस सापेक्षिक गति, या प्रतिक्रिया के कारण, और उसके कारण, और उसके कारण की लगातार खोज तब तक की जानी चाहिए जब तक इस संसार या विश्व का अंतिम आधार या मूल कारण न मिल जाय. और केवल तभी, प्रयोग द्वारा वैज्ञानिक खोज, या जीवन-मृत्यु, निद्रा-स्वप्न, या ज्ञान-ध्यान, असफलता-तिरस्कार की आवश्यकता न होगी. यह मूल प्रकृति (या मूल/ अंतिम कारण जिसके होने का कोई कारण नहीं हैं), जो संसार का आधार है वह अविनाशी है, और इस अविनाशी या अक्षर तत्व को ही ब्रह्म कहते हैं. इस ज्ञान की प्राप्ति से चित्त की स्थिरता ही मोक्ष है वह स्थिति जीवन- मृत्यु या काल-निद्रा में या त्याग- भोग सभी में, सम-भाव से रहने के लिए स्वत्रन्त्र है, मोक्ष, न तो त्याग (छोड़ देना) है, और न मोह, यह पूर्णता या योग या स्वतंत्रता का भाव है.

संसार की मूल प्रकृति (अंतिम कारण) के निरंतर खोज में अनगिनित जीवन लग सकता है इस लिए, जो महा पुरुष, सत्य को प्राप्त हैं या उसके समीप हैं, उनके बताये गए ध्यान मार्ग पर चलने से सुविधा हो सकती है, यही भक्ति (श्रृद्धा और विश्वास) है. चेतना, भक्त बनती है, जीव का शरीर और उसका व्यक्तित्व नहीं. इस लिए श्री कृष्ण, चेतना की अंतिम स्थिति हैं , अतः सभी जीवों की अधूरी चेतना उनका हिस्सा है. श्री कृष्ण, चेतना की गति द्वारा सदैव ही सुलभ हैं. यह रहस्य सिखाया नहीं जा सकता क्योंकि सभी इसे स्वतः जानते हैं. संसार जैसा भी है, उसका इलाज सांसारिक ज्ञान जिससे वह बना है, नहीं किया जा सकता. सरकारें या संगठन इस लिए ही स्थायी समाधान नहीं हैं. संसार से अलग हो कर ही उसे समझा जा सकता है चाहे संसार में रह कर अलग रहा जाय या एकांत में रहें. चेतना (वास्तविकता और सत्य के निर्णय की शक्ति) का विकास होने से सांसारिक इच्छाएं कम होती हैं और, इन्द्रियों और व्यक्तित्व के पूर्वाग्रह से उसे स्वतंत्रता मिलती है. जब तक जीव का स्वरुप जीव को मालुम नहीं होता, वह संसार से अलग नहीं हो पाता और इन्द्रियों और व्यक्तित्व पर आश्रित बना रहता है, और यही मोक्ष नहीं है.

ध्यान की निरंतरता से जान पाने वाले उस अविनाशी तत्त्व (मूल कारण, जिसके होने का आगे कोई कारण नहीं हैं) को ब्रह्म कहते हैं. उस ब्रह्म की खोज करने वाला उपासक (समीप जाने वाला), मन (स्वभाव, अध्यात्म) है. और मन का उपासक, बुद्धि (भूत भाव, भौतिक या सांसारिक लेन -देन का ज्ञान) है. शरीर (ज्ञान और कर्मेन्द्रियां) और अंहकार (व्यक्तित्व), बुद्धि के रक्षा कवच हैं. इस तरह, जीव (या चेतन देह-धारी, प्राणी) जो शरीर (संवेदन-ज्ञान, भौतिक कर्म और शक्ति संचार के उपकरण), अंहकार (नाम, पहिचान, व्यक्तित्व, सम्बन्ध ), बुद्धि (स्मृति, तर्क, विचार, भाव, चेष्टा ) , और मन (इच्छा, संकल्प, स्वभाव) का एक संग्रह है, और जिनके जन्म -मृत्यु का कारण भ्रम है और वह प्रकृति के गुणों (cause and effect) से चक्र से मोक्ष की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्न करता है. मन के यह शुद्ध होने की क्रिया या इस प्रयत्न, जिसमें बुद्धि एक पत्नी की तरह सहायक है, उसके अलग अलग तरीके हैं उसमें, कर्म (path of action), तप (path of inaction), और ज्ञान ( path of inquiy) और उनका मिश्रण है.

किन्तु, मन, ब्रह्म का उपासक तभी बना रह सकता है, जब बुद्धि का उसे सहयोग मिले. इस तरह, मन और बुद्धि द्वारा मिलकर की गयी ब्रह्म की उपासना ही अधि-यज्ञ या योग की क्रिया है जो मोक्ष कारक है. मन की पवित्रता को अधि-दैव या पुरुष बनना कहते है. और बुद्धि के अपने सीमित सांसारिक और व्यक्तित्व के पूर्वाग्रह से ऊपर हो कर सोचने की क्षमता को ही अधि-भूत कहते हैं. वही मन या पुरुष,"श्री मन" कहलाता है, और वही निर्विकार मति या बुद्धि ही "श्री मति" कहलाती है. श्रीमन और श्रीमति, लिंग सूचक शब्द नहीं हैं.

इस सिद्धांत को समझने के लिए कल्पना करें, मन अरबों वर्ष का या अनादि काल का एक बूढा है. वह मर नहीं सकता. इच्छानुसार वह कोई भी शरीर लेने के लिए समर्थ है. बुद्धि या श्री मति उसकी पत्नी है जो एक, दस, बीस या पचास वर्ष की हो सकती है जो शरीर में रहती है, और अपने सांसारिक गुणों से मन की सेवा करती है. पत्नी अर्थात बुद्धि का उद्देश्य, मन को उसकी मुक्ति के मार्ग पर स्थिर करना है. भला बुद्धि जो उम्र में इतनी छोटी है, बूढे मन को क्या समझा सकती है? मन भी मुक्ति चाहता है और उसे वास्तविक जगत के आधार सत्य तक पहुंचना है. जब मन को बुद्धि से वह ज्ञान मिलता है,जिससे तर्क, विवेक, ध्यान से उसके सभी शंका के समाधान हो, और इच्छाएं कम हों. इस स्वतंत्रता से काल-जयी सर्व-व्यापी मन प्रसन्न होता है और बुद्धि और शरीर को भय या असफलताएं नहीं मिलती और संसार में वह जीव साहसी और संतुष्ट बना रह सकता है. यह संतुष्टि, जो मन और बुद्धि की यज्ञ क्रिया है, प्रारब्ध ऐश्वर्य कहलाती है. इसका फल, मन को मूल प्रकृति या ब्रह ज्ञान की प्राप्ति या मोक्ष की प्राप्ति है.

हर एक अरबों वर्ष के पुरुष के लाखों में पत्नियाँ हैं जिसमें कुछ व्यभिचारी और कुछ सार्थक होंगी. इन सार्थक पत्नियों से प्राप्त प्रारब्ध या पूर्व जन्मो का ज्ञान, मन को अपनी वर्तमान जन्म में नयी पत्नी चुनने और उसका पालन करने में सहायक होती है. मन एक चेतना है, वह बंट भी सकता है, और जुड़ भी सकता है. जिस तरह, भौतिक शास्त्र की चेतना, मेकानिक्स, थर्मोदिनामिक्स, ओप्तिक्स में अलग अलग रह कर जिन्दा रहता है, उसी तरह जीव का मन, मूल प्रकृति की खोज में अलग अलग धाराओं में जीवित रहता है और ये धाराएँ पुनः जुड़ भी सकती हैं. काल और क्रम भी बदले जा सकते हैं, योनियाँ या शरीर रचना भी बदल सकती है. लेकिन मन, इस प्रारब्ध के संस्कार या संबंधों के कारण दूसरे मन को अवश्य जानता है, या मन की रूचि उनके इतिहास को जानना चाहेगी, भले ही उसकी नयी पत्नी, और उसका नया व्यक्तित्व इसका कारण न जाने. यह उसी तरह है, जैसे दो दोस्त बहुत समय के बाद जब मिलते हैं तब उनकी स्थितियां, व्यवसाय और व्यक्तित्व बदला होता है, किन्तु वे फिर भी दोस्त रहते हैं. संसार में, एक व्यक्ति दूसरे से विश्वास द्वारा तभी जुड़ता है, जब उसका प्रारब्ध एक हो, और आगे की दिशा भी एक हो. मन से मन मिलता है भले ही उनकी पत्निया (बुद्धि) और बच्चे (अंहकार) इसके विरोध में हों. इसके विपरीत यह भी होता है, कि व्यक्ति, शारीरिक या व्यवसाय या पद के अंहकार से सारा जीवन जुड़े तो रहें, किन्तु मन उस पर कभी ध्यान न दे. इसका प्रयोग हम सभी रोज ही देखते हैं. कोई भी मनुष्य अपना परिचय नहीं दे सकता. एक कलाकार जिसने जन्म से अब तक अरबों जीवन में अलग अलग भूमिका की है, वह कभी यह नहीं जान सकता कि वह अपना सही परिचय क्या दे? बुद्धि या स्मृति के माध्यम से, एक बार कोई परिचय देने के बाद वह स्वयं उससे बंध जाता है. मन के इस सिद्धांत का इतना महत्त्व है, कि आदमी जो प्राणी जगत का एक उदाहरण है, उसे अंग्रेजी में मैन और संस्कृत में मनुष्य भी कहा गया.

इच्छा-मृत्यु के सकल्प से बंधा मन, शरीर या बुद्धि से कभी बंधा नहीं होता क्योंकि वह इनका चुनाव कभी भी कर सकता है और उसके गलत चुनाव का फल भी भोगता है. जो पत्नी (बुद्धि) व्यभिचारिणी होती है, और अपने बूढे पति (मन) को मूर्ख बना कर सांसारिक कार्यों और भौतिक सुख की कामना करती है, मन की वह स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण है. उस जीव में साहस और संतोष नहीं पाया जाता. इस तरह, शरीर और बुद्धि, मन को व्यथित कर देते हैं और जीव को आत्म हत्या तक करनी पड़ सकती है.

आत्मा (ब्रह्म, योग, सत्य, अधि यज्ञ ), मन (स्वभाव, अधि आत्म, पुरुष, अधि दैव) ) और बुद्धि (कर्म, सृष्टि, सांसारिक व्यवहार, निर्वाह) की इस विशेष स्थिति में मन (श्री मन) और बुद्धि (श्री मति) ही चेतना हैं जिन्हें ब्रह्म लीन होना है. हर एक जीव में, मन पुरुष है, और बुद्धि स्त्री है. मन, अनादि जीवन-मृत्यु को झेल चुका वृद्ध पुरुष है जबकि बुद्धि, जन्म और मृत्यु के बीच के काल और भौतिक संसार की श्रृष्टि है. मन का संसार में बुद्धि, पति है, और अध्यात्म में, बुद्धि का पति मन है. अतः दोनों का पतिव्रत होना मोक्ष के लिए आवश्यक है. मन अपनी अधूरी इच्छाओं या अधूरे काम की पूर्ति के लिए ही संसार में पुनः जन्म लेता है जो बिना बुद्धि के सहयोग के संभव नहीं होता.

किन्तु मन के अपने प्रारब्ध से भटक जाने पर, बुद्धि अर्थात पत्नी का हरण हो जाता है. इस अवस्था में पुरुष (अर्थात पति) को अपनी और पत्नी की मर्यादा और धर्म की रक्षा के लिए, सांसारिक शत्रुओं और व्यवस्था के दोषों से युद्ध करना पड़ता है. श्री राम (श्री मन) और श्री मति सीता (बुद्धि) आदर्श हैं. किन्तु जब रावण ने श्री राम की बुद्धि अर्थात सीता जी का हरण कर लिया था, तब श्री राम अर्थात परम पुरुष (मन) भी इस संसार से विचलित हो गया. तत्पश्चात रावण का वध कर, सांसारिक व्यवस्था को ठीक करने के कारण ही, अवध (जहाँ वध न होता हो) के निवासी श्री राम एक आदर्श राजा कहलाये. कितना आश्चर्य है, कि अयोध्या के राजा राम, योद्धा के नाम से पूजित हैं. भारत में आज भी मनुष्य की बुद्धि रावण की व्यवस्था से हरण कर लिया गया है. आज भी उस रावण के हजारों हाथ और सर हैं जो कुत्सित व्यवस्था के प्रतीक हैं. गाँधी जो श्री राम के उपासक हैं, उन ने, उस समय की सरकारों से बिना किसी अस्त्र के, और जन साधारण व्यक्तियों को एक जुट कर, युद्ध किया, और राक्षसी संस्कारों का वध किया था. हर काल में, धर्म की रक्षा के लिए, राम, कृष्ण, बुद्ध, गाँधी का जन्म होता रहता है, जिन्हें महा-पुरुष भी कहते हैं जो अपहृत बुद्धि, अर्थात नारी जगत को कुत्सित व्यवस्था से मुक्त करते हैं. आज का जगत, नारी-जगत (बुद्धि के विषय का संसार) है, जहाँ पुरुष या नर नहीं हैं. केवल इस लिए ही संत तुलसी दास ने नारी (विषयी जगत) को दंड पाने का अधिकारी कहा है. राम चरित मानस या भगवत गीता में पुरुष-स्त्री, नर- नारी, पति-पत्नी, श्रीमति-श्रीमन शब्द लिंग सूचक शब्द बिलकुल नहीं है.

जो पुरुष (मन), अपनी पत्नी (बुद्धि) कर हरण हो जाने पर उसे वापस प्राप्त करने के लिए युद्ध नहीं करता, वह क्षत्रिय नहीं, बल्कि वैश्य, वैश्या, या व्यवसायी है. वह पति, व्यवस्था से समझौता कर लेता है, और अपनी पत्नी (बुद्धि) को व्यभिचार या विषयों में जाने से नहीं रोकता, और उससे प्राप्त सांसारिक सुख का भोग करता है. इसके बावजूद मन, एक बुद्धि पर स्थिर नहीं रहता, और विषय की भूख मिटने के लिए, अन्य बुद्धियों का हरण भी कर लेता है. कालांतर में, पुरुष की संसार में रक्षा करने वाली बुद्धि, उस पति (पुरुष, मन) को लगभग त्याग देती है जिससे शरीर में रोग, दुर्घटना या शत्रुता से मृत्यु हो जाती है, या मन स्वयं आत्म हत्या कर लेता है. इस तरह, जीवन निरर्थक हो जाता है.

द्वापर युग में श्री कृष्ण ने न तो श्री राम की तरह युद्ध का आदर्श प्रस्तुत किया और न ही व्यवसाय का. योग प्रणेता श्री कृष्ण रण-छोड़ कहलाये और महा भारत में, उन्होंने अस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा की. उन्होंने जीवन को ज्ञान और कर्म द्वारा समझ लेने की प्रेरणा दी जिस से अंहकार (व्यक्तित्व ) का त्याग प्राप्त होता है, और सभी अनुभव बिना उस से बंधे हुए ही प्राप्त हो सकते हैं. भगवत गीता, मन और बुद्धि के नियोग के मार्ग को ठीक ठीक सिखलाता है.

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Krishna Gopal (KG) Misra
e-mail : qualitymeter@gmail.com,

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