
व्यवसाय का क्षेत्र बिन लादेन (१००,०) से बिल गेट्स (५०,५०) के बीच की अवस्था है अर्थात जो संगठन के नियंत्रण में रह, असुर से सुर बनने की कठिन यात्रा है. इसमें कठोरता और नियमो की जरूरत होती है क्योंकि लोगों पर भरोसा नहीं किया जा सकता. यहाँ ऊंचे लक्ष्य सिर्फ इस लिए रखे जाते हैं जिसे किसी का अकेले प्राप्त करना संभव नहीं हो, तभी लोंग संगठन से जुड़ सकते हैं. लक्ष्य को प्राप्त होने पर लोंग झगड़ते हैं, इसलिए संगठन में लक्ष्य का अप्राप्त होना और कठिन होना आवश्यक है. इस खतरे और असफलता के कारण, कार्य को व्यवस्थित करने के लिए स्टैण्डर्ड की जरूरत होती है.
असुर का गुण कभी स्थाई नहीं होता. इसका एक इतिहास है. आंतकवादी संगठन जो पहिले लूट पाट कर धन कमाते थे, उनको नीति और रक्षा के कार्य में लगाए जाने से वे ही राष्ट्र वादी (सरकारी) संगठन बन गए. इसलिए आतंक या असुर होना और उन गुंणों का सदुपयोग, शासक का एक गुण है. राष्ट्र की भी अनंत श्रेणियां हैं. इनमें सीमा या व्यवसाय के लिए लडाई होती रहती है. इसलिए सभी आतंक-वादी, एक न एक दिन अपना अलग राष्ट्र बना लेना चाहते हैं. लेकिन राष्ट्र की सिमित परिभाषा से व्यवसाय अधिक श्रेष्ठ है. राज नेता, इसलिए अपना छोटा मोटा व्यवसाय बना लेना चाहते हैं. और व्यवसाय की भी अनंत श्रेणियां हैं. वैश्य या वैश्य जो व्यवसाय पर निर्भर है, उसका का निर्धन होना उचित नहीं होता. उसका स्थान स्वर्ग है. व्यवसाय के शीर्ष पर सोनी, बी एम् डब्लू, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल जैसे व्यवसाय का नाम उनके सुर स्वभाव के कारण आदर से लिया जाता है.
सुर या संगीत की तरह भरोसेदार होना ही संगठन का लक्ष्य होता है. जैसे, हर पंडित अपना अलग अलग मार्ग (जैसे हिंदू, इस्लाम, ईसायी इत्यादि ) बताता है, ठीक उसी तरह व्यावसायिक और औद्योगिक क्षेत्र की सफलता के लिए क्वालिटी मनेजमेंट सिस्टम की परीक्षा के लिए, विभिन्न स्टैण्डर्ड उपलब्ध हैं। जापान में कार्य को धर्म समझते हैं, इस लिए वे लोग व्यक्ति के चरित्र निर्माण के द्वारा व्यवसाय में सर्व श्रेष्ठ बन गए. जबकि अमेरिका में या पश्चिमी देशों में, कार्य को युद्ध समझा जाता है, इसलिए वहां का कार्य संगठन से होता है और मैनेजमेंट पर लोग अधिक निर्भर होते हैं. इन देशों में क्वालिटी की मार्ग दर्शन के लिए बनाये गए, परिभाषा और स्टैण्डर्ड भी अलग अलग होते हैं. उदाहरण के लिए डेमिंग अवार्ड, माल्कम बल्रिज अवार्ड, आई एस ओ ९०००, सिक्स सिग्मा इत्यादि। तत्त्व यह है कि स्टैण्डर्ड चाहे कोई भी अपनाया जाय, सफलता इसमें है कि संस्था को उससे क्वालिटी मनेजमेंट सिस्टम का ज्ञान प्राप्त हो और उसकी त्रुटी हीन कार्य करने की क्षमता बढे।
स्टैण्डर्ड का इस्तेमाल बेवजह नहीं है। व्यावसायिक संस्थाओं में ग्राहक के एक भारी आर्डर लेने, और उसे पूरा करने तक का कठिन कार्य, एक चौडी नदी को पार करने जैसा है। शुरू में, डरना तो स्वाभाविक है किंतु प्रबंध की कला में अभ्यस्त तैराक इस नदी को तैर कर पार करना जानता है। इसके अतिरिक्त, एक सावधान तैराक के पास नदी की गहराई नापने के लिए कोई डंडा या यंत्र भी होना चाहिए। जिसके होने से, उसे आत्म बल (self confidence) मिलता है और वह इससे अपने प्रबंधन की कला को स्वयं देख-देख कर, प्रति दिन बेहतर बन सकता है। नापने के विभिन्न यन्त्र ही आदर्श या स्टैण्डर्ड की भूमिका निभाते है। इसकी सहायता से तैराक सावधान रह, और निरंतर नया ज्ञान या कला सीखने के लिए उत्सुक रहता है। उसे ग्राहक का आर्डर लेते समय कभी डर नहीं लगता क्योंकि नापने वाले डंडे के प्रयोग से वह यह जान गया है कि किस तरह वह ग्राहक की आवश्यकताओं पर कितनी बार वह खरा उतर चुका है। संस्था में प्रबंधकीय अनुशासन का यह माप दंड ही आदर्श (या स्टैण्डर्ड) कह लाता है। यह नापने का यन्त्र, आदर्श या स्टैण्डर्ड, तैराक का स्थान कभी नहीं ले सकता अर्थात स्टैण्डर्ड पढ़ कर कोई प्रबंध करना नहीं सीख सकता। किंतु एक प्रबंधक के लिए स्टैण्डर्ड का प्रयोग, उसे अनुशासन (स्वयं पर शासन) का महत्व और आत्म बल का ज्ञान करा ही देता है। स्टैण्डर्ड को समय और परिस्थितिओं के अनुसार बदलते रहना चाहिए ताकि उसे अपनी छमता के आकलन में इसलिए ग़लतफ़हमी न हो कि उसने एक अनुपयोगी स्टैण्डर्ड का सहारा लिया था।
बाज़ार का क्या इतिहास है, बाज़ार कौन बनाते हैं?
1. युद्ध की मर्यादा पर आधारित मुक्त बाज़ार / युद्ध आवश्यक क्यों है? / कर्म को धर्मं युद्ध क्यों कहते हैं।
बाज़ार एक युद्ध क्षेत्र है। इसमें दो योद्धा अपनी अपनी बात को कायम रखने के लिए लड़ते है, और इस तरह दोनों अपने बराबरी के शत्रु का चुनाव कर, उनके बल, कला-कौशल और चरित्र की अच्छी तरह थाह लेते हैं। इस युद्ध में, दोनों पक्ष हार-जीत या मरने -मारने के बजाय समझौता (agreement) कर लेते हैं। युद्ध की समझौता में समाप्ति, ही व्यवसाय है। बाज़ार के सम्बन्ध का आधार कभी संकल्प (committment) नहीं होता बल्कि वह एक समझौते (agreement) से जुड़ता है। बराबरी की परीक्षा ही युद्ध है, क्योंकि किसी भी समझौता के लिए पक्षों का बराबर होना जरूरी है, जिससे हाथ मिलाने के बाद कोई भी पक्ष हाथ को मरोड़ न सके। उदाहरण के लिए, भारत और अमेरिकी सरकारों में, परमाणु उर्जा के लिए समझौता एक भयानक युद्ध है। दोनों पक्षों का इस समझौते को निभा पाना ही व्यवसाय है। जब हम भी बाज़ार में कुछ खरीदने के लिए जाते हैं, तो हम किसी वस्तु का मूल्य १० रूपये लगाते हैं, किंतु बेचने वाला उसे २० रूपये में ही देना चाहता है। यही युद्ध है। बिक्रेता हमें अलग अलग वस्तु दिखाता है, और मूल्य के सही होने की जिद करता है। अंतत दोनों १५ रूपये पर समझौता कर लेते हैं, और यह तय होता है की दोनों उस समझौते का सहर्ष पालन करेंगे। इसलिए, बाज़ार में खरीदने वाले और बेचने वालों को सतर्क रहने की हमेशा जरूरत होती है, और कोई भी व्यावसायिक सम्बन्ध हमेशा के लिए बन पाना जरूरी नहीं है।
असुरक्षा की भावना ही बाज़ार की शक्ति है। जो योद्धा नही हैं अर्थात चरित्र हीन या धोखे बाज़ हैं, या सतर्क नहीं होते, या दयालु या हिसाब किताब में असावधान होते हैं, वे सभी बाज़ार में मारे जाते हैं। आकर्षण के लिए छल, व्यवसायिक व्यूह नीति या तकनीकी गुप्त ज्ञान का युद्ध में इस्तेमाल, युद्ध की मर्यादा पर निर्भर है। मर्यादा की सीमा रेखा ही अपराधी और योद्धा को अलग करती है जबकि बुद्धि, धन या अस्त्र की शक्तियों दोनों के लिए बराबर हैं। बाज़ार के सिद्धांत इस लेख में आगे विस्तार में दिए गए हैं।
२। संगठनात्मक अलगाव (formation of interest groups) की व्यवस्था (जातिप्रथा, राजनीतिक, व्यवसायिक या धार्मिक संगठन का रहस्य)
अलगाव वादी विशेषण से जुड़ कर अपने को धर्म युद्ध से बचाने की कला ।
समझौते के निर्वाह की समस्या युद्ध के इतिहास से जुड़े हैं। जातिप्रथा और बाज़ार, युद्ध में हुए समझौते के अलग अलग प्रयोग हैं। दुनिया में असंख्य उदाहरण हैं जब हारने वाले योद्धा ने समझौते में अपने पुत्री को जीतने वाले योद्धा को दी। इससे जातिगत समूह बन गए और शक्तियों को पारिवारिक धरोहर बना दिया गया। आज भी डाक्टर के पुत्र -पुत्री, व्यवसाइयों के पुत्र-पुत्री, अपराधियों के पुत्र-पुत्री स्व-जातीय विवाह द्वारा अपने शक्ति को परिवार के दायरे में ही रखना चाहते हैं। छुआछूत और जातीय अलगाव से लोगों में घृणा पैदा होती गई, और लोग संगठन बना प्रतिस्प्रधा से बचने लगे। इस तरह युद्ध की मर्यादा नष्ट हो गई, और उनके अपने अपने संकीर्ण विचारों से बाज़ार नहीं बन सका।
शत्रु भाव या प्रतिस्प्रधा के न होने पर, डाक्टर का बेटा डाक्टर, शासक का बेटा शासक, पंडित का बेटा पंडित, बिना किसी परीक्षा या योग्यता के कारण बनते गए। इस कारण, अलगाव, अज्ञान और अंधविश्वास बढ़ता ही गया और, भारत जैसे देश सदियों तक गुलाम बने रहे या रहेंगे। मुस्लिम और हिंदू धर्म से अलग नहीं हैं, बल्कि इतिहास से अलग हैं। मुस्लिम शासकों का इतिहास आज उस असमानता की कीमत चुका रहा है, जिसके कारण मुस्लिम आज भी समाज में उचित प्रतिष्टा न पा सके और विकास से अलग हो गए। आज के नए शासक कल के दुर्भिक्ष बनेंगे। उदाहरण के लिए, एक वकील या दरोगा या पोलिस कर्मचारी या सरकारी अधिकारी को घर किराये पर मिलना मुश्किल होता है। प्राइवेट बैंक उन्हें लोन भी नहीं देते। लोग यह सोचते हैं की ये लोग अपनी ऊंची पहुँच से घर पर कब्जा कर लेंगे या उनसे किराया लेना मुश्किल होगा। कानूनी वेश में गैर कानूनी लोग, कालांतर में समाज से बहिष्कृत कर दिए जाते हैं। यही अस्प्रश्यता का सिद्धांत है। जाति या संगठन के इतिहास के कारण एक अच्छा मुस्लिम, एक अच्छा वकील या पंडित या, एक अच्छा पोलिस कर्मचारी केवल इस लिए अभिशिप्त है, की वह कभी असमानता का प्रतीक रहा था या है। इन्हें अपना मान लेने में वक्त लगेगा। इसके विपरीत, गाँधी या राम या जीसस क्रिस्ट को जातीय, या राजनीतिक या धार्मिक संगठन से जोड़ने वाले अपराधी इन महापुरुषों को भी अस्प्रश्य बनाने और अलगाव पैदा करने का प्रयत्न करते हैं। संगठन किसी का नहीं होता इसका एक तात्कालिक उद्द्येश्य होता है, स्वभाव परिवर्तन इसका लक्ष्य नहीं है । एक पोलिस की लड़ते हुए मृत्यु होने पर समाज में इतनी चिंता नहीं होती जितनी एक सामान्य व्यक्ति की दुर्घटना से हुयी मृत्यु की । आतकवादी का नाम समाज में जाना जाता है, किंतु एक पोलिस कर्मचारी का नाम उसके मृत्यु के बाद उसका स्वामी (जो सरकारी व्यवस्था है) भी नहीं जानता।
धर्म (गुण-दोष 'डिफेक्ट' निवारण ) और वर्ण (शूद्र - वैश्य- क्षत्रिया - ब्राह्मण ) व्यवस्था का जाति या संगठन ( मुस्लिम, हिंदू, डाक्टर का बेटा डाक्टर, शासक का बेटा शासक, पंडित का बेटा पंडित) से, या जन्म - दाता या, जन्म समय या स्थान से, सम्बन्ध केवल एक संयोग ही हो सकता है। जन्म, या विवाह के सम्बन्ध या एक जातिप्रथा, शत्रु-भावः को समाप्त नही कर सकते, महाभारत का युद्ध एक ही परिवार की लड़ाई थी।
बाज़ार 'समझौता' की पद्धति से किस तरह काम करती है?
माँ के हाथ का बना खाना व्यवसाय क्यों नहीं है? होटल का खाना माँ के हाथ के खाने से क्यों भिन्न है? फ़िल्म में काम करने वाली अभिनेत्रियाँ किस तरह शारीरिक सुन्दरता को अस्त्र की तरह ले बाज़ार में युद्ध करती हैं। हमें यह जानना ही होगा कि व्यवसाय में शत्रु-भाव या प्रतिस्प्रधा कितना आवश्यक है। जहाँ शत्रु भावः नहीं होगा, व्यवसाय पनप ही नही सकता। जो लोग अपनी अच्छी कीमत पा रहे हैं वे ही सफल व्यवसायी हैं। व्यवसाय में समझौता की रक्षा के लिए दो पहरेदार नियुक्त हैं। यदि ये न हों तो, समझौता या बाज़ार फेल हो जायगा।
१। नाप (measurement)
२। कानून के भय से शक्ति-संतुलन (equality by means of laws and judiciary)
माँ के द्वारा दिए गए खाने में कोई नाप नहीं होता और न ही कोई कानून। इस लिए क्योंकि वहां शत्रु भावः नहीं होता। माँ और बच्चे के बीच सम्बन्ध कभी भी बाज़ार या व्यवसाय नहीं बना सकते। जबकि होटल में, हर खाने वाले वस्तु की नाप और मूल्य तय होती है। नाप के कम या ज्यादा होने की अवस्था में उनके बीच हुए समझौता का उल्लंघन हो जाता है। यदि खाने में कोई त्रुटी पायी गई है तो कानून का डर होता है, और दोषी को दंड भी मिलेगा। जहाँ कानून नहीं है या नाप तौल के नियम नहीं बने हैं, वहां बाज़ार या युद्ध सम्भव नहीं होते। अच्छा व्यवसायी उसे कहते हैं जो नाप तौल का माहिर है ,और उसे कानून पालन और न्याय प्रणाली का लाभ लेना आता है। यही लड़ाकू लोग, पेशेवर कहलाते हैं। अमेरिका में बाज़ार की व्यवस्था सफल सिर्फ़ इसलिए है की वहां लोग कानूनी लडाई में अभ्यस्त हैं और डरते नहीं। लोगों में लड़ने की यह प्रवृत्ति ही, अन्याय और अपराध से व्यवसाय की रक्षा करती है। भारत में इसका उल्टा है। यहाँ लोग अपराधियों से डरते हैं, और उनका सम्मान करते हैं। यह स्वाभाविक है कि भ्रष्ट व्यवस्था में व्यवसाय पर अपराधियों का ही नियत्रण होता है। सफल रहे व्यवसायिक संगठन का भारत में यह अनुभव रहा है कि कानून और नाप तौल की जानकारी रख कर ही बाज़ार में सुरक्षित रहा जा सकता है, और सरकारों या अन्य शक्तिशाली शत्रु से उनके बचाव का यही एक साधन है।
पैसा कमाने के लिए खतरा उठाने वालों का हर बाज़ार में स्वागत होता है। बाज़ार धर्म निरपेक्ष होता है जहाँ किसी को धर्म या अधर्म की परवाह नहीं होती। क्या करना समाज के लिए उचित है या और क्या अनुचित, यह बाज़ार का विषय नहीं है। लेकिन वह कार्य तात्कालिक व्यवस्था में, गैर-कानूनी नहीं होना चाहिये। बन्दूक या युद्ध के उपकरण या नशीले पदार्थ बनाना, वैश्या -वृत्ति इत्यादि कार्य हिंसा और चारित्रिक पतन को जन्म देते हैं किंतु गैर कानूनी न होने से यह एक बड़ा व्यवसाय है। कोई भी खेल, व्यवसाय या युद्ध जिसमें प्रतिस्प्रधा और शत्रु भावः हो, उसमें कानून का बीच में रहना जरूरी होता है। जहाँ कानून का प्रभाव नहीं होता है, वहां अपराध और व्यवसाय में फर्क करना मुश्किल होता है। यह भी ध्यान रहे की समानता या स्वतंत्रता के बिना व्यावसायिक प्रतिस्प्रधा या कोई भी युद्ध अनैतिक होता है। जो लोग कानून बनाते हों या हिसाब किताब रखते हों या जिन्हें दंड देने का अधिकार है उन्हें बाज़ार में कभी भी भाग नहीं लेना चाहिए, यह बेईमानी है। सरकारों, न्याय व्यवस्था और बैंकों को बाज़ार से अलग रखना चाहिए। लाचार और लालची लोगों का सम्बन्ध इस लिए ही भ्रष्ट होता है, और इस तरह के बाज़ार में लोगों का आत्म-बल गिरता है। लोग फ़िर बाज़ार से ही डरने लगते हैं।
युद्ध, लड़ाई या प्रतिस्प्रधा बुरी चीज नही है, किंतु वहां, किसी भी पक्ष को अनुचित लाभ या असमानता का लाभ नहीं मिलना चाहिए। समानता ( equilibrium) ही प्राकृतिक न्याय (natural justice) है जबकि नियंत्रण के सिद्धांत समानता के सिद्धांत से विपरीत है। कानून का पालन, सरकारों और संगठित व्यवस्था के लिए सिरदर्द होता है, जबकि वे कानून का दुरूपयोग दूसरों के नियंत्रण के लिए ही करना चाहते हैं। संगठन की शक्ति, समानता को सहन नहीं करती। भारत में कानून बनाने वाले, और बाज़ार के खेल में कानून के रेफरी (जज) भी नागरिकों के लिए बने कानून से स्वयं को बचाए रखना चाहते हैं। किसी भी प्रजातान्त्रिक देश का इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है?
कानून, नियंत्रण नहीं, बराबरी है ।
भारत के निवासी जो पत्थर, वृक्षों, संतों, नदियों की पूजा करते हैं और कठोर व्रत करना जिनकी परम्परा है, वे ही लोग साधारण से साधारण कानून का भी पालन नही करते और सरकारी तंत्र से घृणा करते हैं। जबकि, अन्य देशों में, आम आदमी कानून को इसलिए अपनाना चाहता है, जिससे उसकी स्वतंत्रता को संगठित गिरोहों से खतरा न हो, अर्थात, आम आदमी का कानून, किसी भी संगठन के शक्ति या उसके एकाधिकार के लिए उचित तोड़ बने। बाज़ार के लिए कानून जरूरी तभी है जब वह प्रतिस्प्रधा और समझौते के इस खेल में, सभी लोगों में बराबरी का भावः पैदा कर सके। और न्याय, स्वतंत्रता से जीने वाले आम आदमी के लिए, और संगठन के सुरक्षा में जीने वाले ख़ास आदमी, दोंनों के लिए निष्पक्ष रहे। इतिहासिक कारणों से भारत में सरकारों या संगठनो को कानून इसलिए चाहिए था जिससे गुलाम देश के निवासियों पर नियंत्रण रखा जा सके। जिस देश में कानून नियंत्रण के लिए बनाया जाता है, और कानून से संगठित, और असंगठित/स्वतंत्र दोनों में, बराबरी या स्वतंत्रता का भावः नही प्राप्त होता, स्वस्थ बाज़ार की सम्भावना नहीं हो सकती। यहाँ, कानून में इन दोनो की रूचि, अलग अलग कारणों से होती है। सरकारों या संगठन के सुरक्षा के प्रतीक, कानून के दुरूपयोग से लाभान्वित होते हैं, जबकि स्वतंत्र व्यक्ति कानून इसलिए अपनाना चाहता है, जिससे संगठित शक्तियों से या सरकारों से उसकी रक्षा हो सके, और वह उनसे डरे नहीं।
जिस देश में कानून होते हुए भी, आम आदमी को सरकारों से, या संगठित ख़ास लोगो, से डर लगता हो, उस देश में बाज़ार पनप ही नहीं सकता। वहां कभी भी प्रतिस्प्रधा पर आधारित बराबरी के समझौते नहीं हो सकते। भारत के तरह इन देशों में भी भष्टाचार, डर और नियंत्रण के लिए कानून का दुरूपयोग होता है। भारत में विकास एक कुख्यात शब्द है। सरकारें, विकास के लिए, किसानों या अन्य असहाय लोगों के जमीन या अधिकार जबरदस्ती ले लेती है, और उससे आम आदमी और संगठन की शक्तियों में फर्क का पता चलता है। जो कानून बराबरी नही दे सकती, वह विकास किस काम का ? यही अनर्थ का कानून है, और भारतीय अन्धविश्वासी, अति संवेदनशील और स्वभाव से अहिंसक और आज्ञापालक होते हुए भी साधारण से साधारण कानून का पालन नहीं करते और, सरकारों से घृणा करते हैं।
भारत में कानून की दुर्गति और अश्रद्धा किसी खोज का विषय नहीं है। कोई बिरला व्यक्ति ही हो सकता है जिसने सरकारी भ्रष्टाचार की स्वाद न लिया हो। बिजली, पानी, मकान, सीवर लाइन, रोड, टेलेफोन, सभी कार्यों में सरकारी नियंत्रण है। किंतु सरकारी या कोई भी संगठित भ्रष्टाचार, जो कानून से कम नही हो सका, वह प्रतिस्प्रधा से या मुक्त बाज़ार की व्यवस्था से कम हो रहा है। आज भारत, बाज़ार के महत्व और व्यक्ति की समानता और स्वतंत्रता की विकास में अभिव्यक्ति को समझ रहा है। प्रतिस्प्रधा से बने बाज़ार में बराबरी का अनुभव लेना, न्यायालय में जाने से बेहतर है। बाज़ार के न्याय में, हारने वाले को ज्ञान मिलता है, सजा नही; और जीतने वाले को प्रोत्साहन। कानून की शक्ति आम आदमी के पास होनी चाहिए, और बाज़ार में उसके द्वारा अच्छे बुरे की चुनाव की स्वतंत्रता ही न्याय है। यही कारण है नैतिक बल, कला, विज्ञानं और खेल में भारत की गिनती होने लगी है। युद्ध का अपना ही कानून होता है, और श्रेष्ठ कानून वह है जो बाज़ार या युद्ध में सभी के लिए समान हो। यही बाज़ार की आधार है, जिस से वास्तविक विकास सम्भव है। कानून, सरकार या किसी भी शक्तिशाली संगठन का अस्त्र या नियंत्रण का साधन नही होता।
जिन देशों में आम आदमी कानून को अपनाने से स्वतंत्र और बराबरी की अनुभव करता हो, और उसे डर न लगता हो, वहां, मुक्त बाज़ार से देश का विकास होता है। अमेरिका इसका एक उदाहरण है। भारत के लोग भारत से भाग कर अमेरिका जा कर वहां, सफलता प्राप्त करते हैं। इन दोनों देशों में कानून की परिभाषाएं अलग अलग हैं। भारत में कानून एक नियंत्रण का साधन है, जबकि अमेरिका में यह लोगो में बराबरी के भावः लाने का माध्यम है।
बाजार के खतरे क्या हैं?
बाज़ार खतरे का खेल है। आख़िर यह युद्ध ही तो है? देखने में यह जितना आकर्षक है उसे बनाने में लगी पीडा भी उतनी अधिक है। गणित के द्वारा बांटे गए हर मनुष्य को अपने अपने एकाधिकार की रक्षा के लिए सतर्क और स्वार्थी रहना ही है, और उसे अपने ही बुद्धि के द्वारा बनायी गई असुरक्षा से बचने के लिए प्रतिस्प्रधा और शत्रुता में जीने का अभ्यस्त होना पड़ेगा। बाज़ार में लोग आत्मनिर्भर नहीं रह सकते, इसलिए उनके पास जो भी है, उसे बचाए रखने और, सुरक्षा के लिए संग्रह की आवश्यकता होती है। जिनके पास पैसे नहीं होते, उनके लिए बाज़ार मरुस्थल है। एक आदमी जंगल और पहाडों में जिन्दा रह सकता है, किंतु बिना पैसे या बेचने-खरीदने की योग्यता के, वह शहर या बाज़ार में नहीं रह सकता। बाज़ार में रहने वाले धीरे धीरे असुरक्षा के इस प्रभाव से क्रूर और असंवेदनशील बन जाते हैं। उनका अनुशासित और आकर्षक व्यवहार, दया, रक्षा, चापलूसी, और सेवा का प्रदर्शन भी घातक अस्त्र ही होते हैं। जबकि परिवार, समाज और प्रकृति की व्यवस्था बाज़ार से उलटी होती है क्योंकि वहां शत्रुता, प्रतिस्प्रधा, न्याय और माप तौल की जरूरत नहीं होती। शासन और बाज़ार से इन तीनो व्यवस्थाओं (प्रकृति, परिवार, समाज) को हमेशा खतरा होता है। भारत में किसानो का आत्महत्या करना इसका प्रमाण है। किसानो को प्रकृति (पेड़ पौधों और पशुओं) के साथ रहने से उनमें शत्रु भावः पैदा ही नहीं होता और वे अपने श्रम का मूल्य नहीं लगा सकते। यदि उनसे कुछ मांगे भी तो वे उसे मुफ्त में दे देंगे और लिखने पढने में उनका विश्वास नहीं होता; किंतु, बाज़ार में यह सब नहीं होता और वे बाज़ार का भाषा में गरीब कहलाते हैं। वे धन का उपयोग करना सीख नहीं सकते। जब बाज़ार की व्यवस्था उनके प्राकृतिक स्वभाव को नष्ट कर देती है, तो वे लाचार हो कर आत्महत्या कर लेते हैं। प्रकृति भी आत्म हत्या कर लेती है। उसका भी स्वभाव पहिले जैसा नहीं रहा, और भयानक त्रासदी आने वाली है। परिवार और समाज में भी विकृति आ गई हैं।
बाज़ार का अर्थ-शास्त्र, भूख और असुरक्षा पर आधारित है. भूख और असुरक्षा जितनी अधिक होगी, बाज़ार में मूल्य और आर्थिक विकास की दर उतनी ही अधिक होगी. यह सिद्ध है कि एक भूखे व्यक्ति को पहली रोटी ४ रुपये में बेचीं जा सकती है, किन्तु जैसे ही उसकी भूख थोडी कम होगी, उसी एक रोटी का मूल्य ३ रुपये की होगी, और जब भूख बिलकुल नहीं रहेगी, उसी एक रोटी का मूल्य शून्य हो जायगा. रोटी पैदा करने वाले, भूख को मिटाते हैं, जबकि रोटी बेचने वाले रोटी बनाते नहीं, वे उसकी कमी या भूख की मात्रा पर ध्यान देते हैं. गाय अपना दूध नहीं बेच सकती. व्यवसाय और सृजन विरोधी सिद्धांत हैं. गणित के प्रयोग और ला आफ डिमिनिशिंग उतिलिटी के इस सिद्धांत के पंडित यह जान गए कि रोटी का महत्व, रूपए से कम है. और, गणित से बने इस अस्त्र धन (या रुपये) से रोटी की भूख ( उत्पादन और खपत) पर नियंत्रण किया जा सकता है. और इस तरह भूख का आर्थिक अस्त्र की तरह उपयोग, विलक्षण है. एक असुर योद्धा के लिए, इस से श्रेष्ठ अस्त्र भला क्या हो सकता है? धन या रुपये को चलाने का एकाधिकार ही राष्ट्र के शासक या असुर योद्धा की शक्ति है. किसी योद्धा का चित्र पहिले उसके प्रिय अस्त्र के साथ होता था, किन्तु बाज़ार में, योद्धा का अस्त्र, धन के प्रतीक रूपये या डालर पर, इन शासकों के चित्र देख कर ज्ञान होता है.
अर्थ शास्त्र की शक्ति, निर्दय और अप्राकृतिक है. बाज़ार देने-लेने के व्यवहार का नाम नहीं है. एक माँ और उसके बच्चे का सम्बन्ध, या पिता -पुत्र का सम्बन्ध या पति पत्नी का सम्बन्ध भी देने लेने का व्यवहार है किन्तु यह बाज़ार से भिन्न है. बाज़ार, बेचने और खरीदने का व्यवहार है जो कि अधिकार के लेने-देने (sale = transfer of title) की लडाई है, न कि आवश्यकता पूर्ति हेतु देन-लेन का एक व्यवहार. भारत जो एक नया बाज़ार है वहां पति और पत्नी जब बच्चे या घर के अधिकार के लिए लड़ते हैं, तब बच्चे को प्यार करने, और विवादस्पद घर में रहने का लाभ एक नौकरानी को मिलता है. इन बाजारू पति या पत्नियों को बच्चा या घर नहीं चाहिए, बल्कि सिर्फ उन पर अपना अधिकार चाहिए. सरकारें भी देश के नाम पर लड़ती हैं, किन्तु उन्हें देश से कभी प्यार नहीं होता. वे अपने अधिकार की रक्षा करती हैं, देश की नहीं. गाँधी, इसे जानते थे, इस लिए वे भारत की स्वतंत्रता की जिम्मेवारी के लिए वे पाश्चात्य, आसुरी शासकीय व्यवस्था के विरुद्ध थे. असंख्य उदाहरण है कि भारत के शासक, इस देश को कितनी बार, हार चुके है और कितनी बार यह देश दास बन चुका है, जबकि आम नागरिक असहाय रहता है. किसी भी राष्ट्र को उनके नागरिक कभी हानि नहीं पहुंचाते. असुर सभ्यता का यह आर्थिक अस्त्र मनुष्य के प्राकृतिक गुणों को धीरे धीरे समाप्त कर देता है.
अर्थ शास्त्र के पंडित जो मूल्य और भूख के सम्बन्ध को जान चुके थे, मूल्य और उपयोगिता में कोई सम्बन्ध नहीं ढूंढ पाए. अर्थ-शास्त्र में इसे जल और हीरे के मूल्य का तर्क कहते हैं जिसका अर्थ है, हीरा का उदाहरण यह सिखाता है
कि गोपनीय और दुर्लभ वस्तुओं का मूल्य उसकी उपयोगिता पर निर्भर नहीं होता बल्कि इसलिए अधिक होता है, क्योंकि न मिटने वाली वह विशेष भूख (दरिद्रता) या उसकी कमी पैदा की जा सकती है. और वे ही वस्तुएं व्यवसाय के लिए उपयुक्त हैं. इसके विपरीत 'जल' जो उपयोगी, भूख मिटाने में कारगर, और सुलभ है, उसका मूल्य कम ही रहता है. श्रेष्ठतम वस्तुएं हमेशा अमूल्य होती हैं, क्योंकि उनकी उपयोगिता, मूल्य पर कभी निर्भर नहीं होती. और प्रकृति उनका उत्पादन स्वयं करती है. प्राकृतिक जीवन शैली में रहने वाले, जैसे कृषक, या पशु पालक कभी बाज़ार में सफल नहीं सकते. इसके विपरीत, ग्रीक सम्राट या अन्य शासक, योद्धा या व्यवसायी अपनी क्रूरता, गोपनीय और दुर्लभ कार्यों द्वारा, और वे जिन वस्तुओं की खोज में रहे, जिनकी भूख मिट नहीं सकती (अर्थात दरिद्र की परिभाषा में आते हैं), वे ही अर्थ-शास्त्र का लाभ ले सकते हैं.
दरिद्रता, मन की एक विशेष स्थिति है. दरिद्र, भूखे और असंतुष्ट व्यक्ति को कहते हैं, भले ही वह महान रोगी, या सम्राट, या अधिकारी, या कोई उद्योगपति क्यों न हो. निर्धन व्यक्ति को दरिद्र नहीं कहा जा सकता. धन प्राप्त करना, निर्धन रहने से सरल है. एक पारिवारिक गरीब स्त्री या पुरुष, और वैश्य या वैश्या में फर्क होता है. एक वैश्य या वैश्या, के लिए निर्धन होना अनुचित है और दरिद्रता उचित, क्योंकि बाज़ार की शक्ति दरिद्र हैं, न की निर्धन. गाँधी, तुलसीदास, बुद्ध को निर्धन कहा जा सकता है किन्तु दरिद्र नहीं. धन, दरिद्रता को दूर करने में समर्थ क्यों नहीं है, यह खोज का विषय नहीं है. स्वाभाविक है कि भूख को पैदा करने में ही धन का अस्तित्व है, और भूख के समाप्त होने पर धन का मूल्य गिर जाता है. अधिकार की लडाई ही भूख को पैदा करती है, और वही, व्यापार या व्यवसाय का कारण है. जबकि प्राकृतिक जीवन में, आवश्यकता की पूर्ति सिर्फ इसलिए ही हो जाती है, कि वस्तु पर किसी के अधिकार या नियंत्रण (टाइटल) का प्रश्न नहीं होता. भूख का सम्बन्ध अधिकार, असुरक्षा, और बेचने- खरीद से है, जबकि आवश्यकता वस्तु के लेन-देन और पात्रता पर आधारित है. देवताओं का गुण असुरों से भिन्न होता है. देवता यह कहते हैं कि उनका अपना कुछ नहीं है, और जो भी है वह उन्हें दूसरों से या परमात्मा से ही मिली है. उन्हें संग्रह की जरूरत नहीं है, क्योंकि सृजन और देना उनका स्वभाव है. जबकि व्यवसाय का पंडित, असुर, उस वस्तु को खरीदने के अधिकार के कारण, अपना कहता है, और देने वाले का नाम भी याद नहीं रखता. भूख और आवश्यकता में भिन्नता को समझने का यही मनोविज्ञान है.
जब असुरों को व्यवसाय के यह रहस्य का ज्ञान हो जाता है, तब वे अंहकार या अधिकार के झूठे कवच को त्याग देते हैं क्योंकि इससे वे कभी संतुष्ट नहीं रह सकते. इस ज्ञान से वे धन से ऊपर उठ, भौतिक ज्ञान और अनुसन्धान करते हैं, और उनका वर्ण परिवर्तन हो जाता है. वे अधिकार की लडाई छोड़, सृजन की प्रतिभा का विकास कर, विश्व में ख्याति प्राप्त करते हैं. कालांतर में, असुरों को सुर, और मोक्ष की प्राप्ति होती है.
धर्म और कानून अलग अलग शब्द हैं, इसलिए दोनों के क्षेत्र भी अलग अलग होते हैं जो एक दुसरे के पूरक हो सकते हैं, और नहीं भी. धर्म, अध्यात्मिक या शुद्ध -ज्ञान (विज्ञान = अलग तरह का, विशेष ज्ञान) है, जबकि कानून एक विषय है जो भौतिक या बाहरी या सांसारिक व्यवहार की परिभाषा है. धर्म-युद्ध का लक्ष्य, स्वभाव की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए होता है, जबकि कानूनी लडाई किसी न किसी अधिकार के लिए ही होती है. उदाहरण के लिए, भारत की अंग्रेजों से हुए स्वतंत्रता संग्राम में मरने वालों की संख्या, भारत-पाकिस्तान विभाज़न में हुए गृह-युद्ध से कम थी. अंग्रेजी, भारतीय और पाकिस्तानी शासक की "अधिकार की लड़ाई" में, स्वतंत्रता की लड़ाई से अधिक लोगों की जान गयी थी. व्यवसाय या युद्ध, किसी देश की रक्षा के लिए नहीं बल्कि उस पर अधिकार की रक्षा की लिए होती है. कानून सिर्फ मृत्यु के अस्त्र का एक नया प्रयोग है, जिसे शासक या अधिकारी, स्वयं यह अपने अधिकार की रक्षा के लिए बनाता है जिससे उसका नियंत्रण बना रहे. जिसके पास अधिकार नहीं है या जो निर्धन या पद-हीन है, उसके लिए कानून का कोई अर्थ नहीं है. अर्थ-शास्त्र रोटी के मूल्य को भूख की मात्रा से नापता है, उसकी उपयोगिता से नहीं. बिक्री, रोटी का लेन-देन नहीं है, बल्कि, कानून द्वारा रोटी पर अधिकार का परिवर्तन है. एक भूखे-प्यासे व्यक्ति का भोजन प्राप्त होना धर्म है, किन्तु वह उस भोजन को उन लोगों से छीन नहीं सकता जो उसे बर्बाद कर रहे हैं क्योंकि उनके भोजन या जल के दुरूपयोग का अधिकार कानून से रक्षित है. धर्म, इसलिए ही कानून से भिन्न है. दुर्भाग्य से, कानून, युद्ध या विरोध या नियंत्रण का अस्त्र है, जबकि धर्म, शांति का साधन. गाँधी जो दुर्भाग्य से एक वकील थे, उन्होंने, उस समय के शासक द्वारा बनाये असंख्य कानून तोडे, और कई बार जेल भी गए. सिद्धांत के अनुसार, जज एक सज्जन व्यक्ति नहीं होता बल्कि जज, कानून का पुतला या किसी विषय का पंडित होता है, जिसमें मानवीय गुण का होना एक संयोग है, किन्तु वे अपेक्षित नहीं होते. कानून, (अधिकार के लिए) बीमार हुए लोगों के लिए दवा या विष है, लेकिन धर्म, जीवन को स्वस्थ रखने के लिए नित्य का भोजन है. कानून के धर्म संगत होने से समाज (जहाँ मूल्यांकन और भय न हो) का विकास होता है, और कानून के धर्म संगत न होने से व्यवस्था (नाम तौल, मूल्यांकन, और कानून का भय) का विकास होता है.
कानून और नीति, असुर या इन्तेर्ष्ट ग्रुप की सभ्यता की देन है, जबकि धर्म, सुर या व्यक्ति की सोच के अनुसार उसकी बदलती दृष्टि कोण का लक्षण है. हिन्दू, इस्लाम, भारत, डाक्टर, वकील, व्यवसायी, आदि व्यवस्थाएं, संगठन या इन्तेस्ष्ट ग्रुप हैं, जबकि गाँधी, राम, गुरु नानक, कबीर का चरित्र धर्म है. एक सुर, या धर्म परायण व्यक्ति फल की चिंता नहीं करता, इसलिए वह आंतकवादी भी हो सकता है, किन्तु संगठन नहीं बना सकता. प्रकृति की शक्तियों की तरह, धर्म या ज्ञान अपने विश्वास पर दृढ होता है, जिसके प्रकोप को कानून से नहीं रोका जा सकता. व्यवसायी, फल की चिंता करता है, इसलिए, उसकी रक्षा कानून या संगठन करता है. असुर शासक भी एक व्यवसायी है, जिसका व्यवसाय आतंक है, किन्तु उनके परिष्कृत और नए अस्त्र-शस्त्र, अर्थ शास्त्र और कानून होते हैं.
व्यवसायी चरित्र की श्रेष्ठता
व्यवसाय युद्ध का ही परिष्कृत या शुद्ध रूप है। युद्ध में लड़ने वाले प्रायः मूर्ख किन्तु शक्तिशाली होते हैं। जो जीता वो ही सिकंदर। आज भी, दुनिया में बिन लादेन का नाम अमेरिका के अंहकार को नष्ट करने के कारण ही जाना जाता ही। युद्ध का कारण अंहकार होता है। शासक या अपराधी या योद्धा अपने अपने अंहकार की रक्षा के लिए ही लड़ते हैं। उनका लक्ष्य हार-जीत या मरना-मारना होता है, जिससे उन्हें स्वयं की पहिचान प्राप्त हो। प्रायः, मरने के बाद ही लोग उन्हें याद करते हैं। इन्हें, अपने स्वभाव की ठीक समझ नहीं होती। पुराने जमाने में, योद्धाओं या अपराधियों की उनके शक्ति के कारण बहुत इज्ज़त होती थी। वे ही शासक कहलाते थे। किन्तु, आज युद्ध के शक्तिशाली अस्त्रों का बाज़ार, सुन्दरता के बाज़ार की तुलना में बहुत छोटा हो गया है। क्या आपने सोचा है कि दुनिया के सभी देशों में, बुद्धिमान और युवा लोग क्यों सेना, रक्षा, अपराध, सरकारी पदों, या अन्य शक्ति-प्रयोग के कार्यों में नहीं जाना चाहते ? और उन्हें व्यवसाय या सृजन के कार्य क्यों आकर्षित करते हैं। विकास का यही दर्शन यह सिद्ध करता ही कि कालांतर में शक्ति का प्रभाव किस तरह घटता जा रहा है, और कैसे लोग समझदार और निर्रहंकार होना अधिक पसंद कर रहे हैं। भारत में सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति के चुनाव में कलाकार, साहित्य, व्यवसाय या खेल में प्रसिद्द लोग सबसे आगे, और अंहकार से शक्तिशाली बने लोग जैसे शासक, वकील, या सरकारी व्यक्ति या राजनीतिक लोग सबसे पीछे रहते हैं। चरित्र में हो रहे इस परिवर्तन को ही विकास कहते हैं। किसी व्यक्ति या राष्ट्र का शक्तिशाली बनना उसका पतन निश्चित करता है।
क्वालिटी क्या है, किस तरह वह बाज़ार के खतरों को कम करने में सहायक है?
क्वालिटी, बाज़ार में आशा का किरण है। यह अंधों की लाठी है। बाज़ार को निरापद बनाने का ज्ञान ही क्वालिटी है। इसके रहस्य को ठीक से समझे। यह शत्रु भावः में रह कर परस्पर विश्वास करने की कठिन साधना है। हर एक का अपने अपने समझौते का निष्ठां से पालन ही इस की नियति है, जिसमें सबका भला है। शहर में बच्चे यह नहीं जानते की दूध गाय से प्राप्त होता है। वे जानते हैं की दूध एक मशीन से पैसा डालने पर निकलता है। दूध का मशीन जिसके पास है वह दूध को ट्रक वाले से प्राप्त करता है। ट्रक वाले दूध को एक पस्तुरिजेशन प्लांट से लेते हैं। वहां वह दूध हर रोज ग्रामीण इलाकों में बने संग्रह स्थान से आता है। संग्रह स्थान पर, दूध किसान लाते हैं। किसान, वह दूध गाय से प्राप्त करता है। बाज़ार का यह जाल अंधों का खेल है। यहाँ हर एक व्यक्ति की एक सीमा है और उसे उससे आगे नहीं दीखता। न चाहते हुए भी हर एक को समझौते का पालन करना पड़ता है। इसमें ही सब की भलाई है। यदि एक भी कड़ी टूटेगी तो बाज़ार में बच्चों को रोज दूध नहीं मिल सकता। बाज़ार एक महा जाल है इसमें करोड़ों लोग एक दूसरे पर अपने अपने समझौतों से जुड़े होते हैं और यह बाज़ार, शत्रुता से भरा होने पर भी सुरक्षित रहता है। आज जो भी विकास के कार्य होते हैं उनके पीछे करोड़ों लोग अपनी अपनी अलग अलग क्षमता से जुड़े होते हैं, और हर एक का अपना कार्य एक दूसरे के प्रति ठीक तरह से करना ही, क्वालिटी है। बिना खून खराबे के, शत्रु या प्रतिस्प्रधा करते हुए, समझौते के पालन में निपुण व्यक्ति, हर कार्य को खेल की भावना, जवाबदेही और लक्ष्य बना कर करते हैं। यही खेल की व्यवस्था ही व्यवसाय का आदर्श है।
क्वालिटी मनेजमेंट सिस्टम के अपनाने वाली संस्था के क्या लक्षण वर्णित है?
बाज़ार में क्वालिटी का अर्थ एक दूसरे से हुए समझौते का पालन करने में सफलता की योग्यता है। क्वालिटी मनेजमेंट सिस्टम के अपनाने का प्रमाण यह है की संस्था यह दिखा सके की वह ग्राहक से हुए समझौते और कानूनी नियंत्रण के नियमित पालन में कितना समर्थ है। इसके अतिरिक्त वह संस्था यह भी दिखाए की क्या वह ग्राहक को संतुष्ट करने के प्रति सचेत है, और उसकी यह क्षमता उसके कार्य विधि द्वारा हमेशा बनायी रखी जा रही है। यदि कार्य करने में कोई विधि नहीं अपनाई गई है तो कार्य की सफलता की हमेशा बने रहने की गारंटी और गलतियों से सीख लेने का अवसर नहीं होगा।
संगठन की रचना का उद्देश्य क्या है?
संगठन की रचना किसी ऊंचे उद्देश्य के लिए ही की जाती है। बाज़ार में संगठन का बनना यह सूचित करता है की कोई वह कार्य होने वाला है जिसे अकेले नहीं किया जा सकता। जो कार्य अकेले किया जाना सम्भव है वह लक्ष्य या तो छोटा है जिसे अन्य लोगों को बताने से झगडा ही होगा क्योंकि उसे हर व्यक्ति अकेले ही प्राप्त करना चाहेगा। लेकिन जो कार्य अकेले असंभव है, उसमें लोग मिल कर ही कार्य करते हैं, और ऊंचे लक्ष्य को प्राप्त करने की मिल कर iचेष्टा करते हैं। छोटे संगठन अपने छोटे उद्देश्य के कारण ही बिखर जाते हैं और लोग लबे समय तक साथ नहीं देते। ऊंचा लक्ष्य ही संगठन को बचाए रख सकता है। दुष्ट बच्चों को सँभालने का यही एक तरीका है। अतः आर्थिक विकास के कार्य, बाज़ार की एक मजबूरी भी है। यदि यह न होगा तो लोग बिना वजह झगडा करने लगेंगे और उन्हें रोकना मुश्किल हो जायगा। अमेरिका और रूस जैसे देश नित नए लक्ष्य की खोज इसलिए ही करते हैं।
व्यवस्था और गुण का सम्बन्ध Quality + Management
दुष्ट या अशांत प्रकृति के व्यक्ति, जबतक संगठन में रह कर और ऊंचे लक्ष्य के प्राप्ति में लगे रहेंगे तभी काबू में रहते हैं। वे शांत, अकेले और छोटे छोटे कार्य कर कभी खुश नहीं रह सकते। गाँधी या आइंस्टाइन ने वह छोटे छोटे काम किए, जो सभी के लिए आसन, अकेले किया जाने वाला, और अनुकर्णीय हैं; जबकि सिकंदर या अन्य योद्धाओं के साहसिक कार्य, केवल संगठित हो कर, और ऊंचे लक्ष्य बना कर ही, किया जा सकता है। छोटे लक्ष्य और असंगठित रहने से, दुष्ट व्यक्ति आपस में ही लड़ते रहते हैं। इसलिए उनके लिए ऊंचे लक्ष्य और संगठन की बहुत जरूरत होती है। केमिस्ट्री के ज्ञाता इस रहस्य को तत्त्व से जानते हैं। सोडियम अकेले शांत नहीं रहते। क्लोरीन भी अकेले नहीं रह सकती। लेकिन सोडियम और क्लोरीन मिल नमक बन कर प्रकृति में मुक्त होकर रह सकते हैं। नमक, सोडियम और क्लोरिन का संगठन है। जबकि गाँधी या आइंस्टाइन क्रियाशील नहीं हैं। सोना कहीं भी अकेले रह सकता है, जिसे संगठन की आवश्यकता कभी नहीं होती। सोना अकेले रहते हुए भी अति सवेदनशील होता है जिसका उपयोग संचार उपकरणों में किया जाता है। इसके विपरीत, सोडियम और क्लोरीन अति सक्रिय तत्त्व हैं, किंतु उनमें संवेदनशीलता नहीं होती, और सुरक्षा के लिए वे संगठित बन कर ही रहते हैं। व्यक्तियों की यही सक्रियता, प्रतिक्रिया या असहनशीलता उनका गुण है। ज्ञात रहे, बिन लादेन दुनिया में संगठन या व्यवस्था का महान पंडित है, क्योंकि वह सक्रिय और असहनशील है। पूर्व में दुष्ट रहे, या दुष्टों के इतिहास (पुराण) पढ़े हुए और शंकालु व्यक्ति (जैसे वकील, आडिटर) ही अर्थ या न्याय या संगठन व्यवस्था की सही परीक्षा कर सकते हैं।
व्यवस्था या मनेजमेंट का विचार, दुष्ट या सोडियम सरीखे (गुण के कारण) हुए सक्रिय व्यक्तियों को संगठित करके, उनके दुष्प्रभाव को कम करके उनकी शक्तियों को ऊंचे लक्ष्य की प्राप्ति में लगाना है। सोना निर्गुण है; इसलिए व्यवस्था, मनेजमेंट या संगठन उसका विषय कभी नहीं है। व्यवस्था, मैनेजमेंट या संगठन के प्रयोग से मनुष्यों के सुधार के लिए अशैतानीकरण या devilization की क्रिया है। जबकि सभ्यता (या सिविलिजेशन) सदैव प्राकृतिक होता है, जिसे व्यवस्था या बल के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता। अर्थात जहाँ अव - गुण (short of quality) है वहां ही व्यवस्था (management) है।
गुण और व्यवस्था और शास्त्र
असुर, दुष्ट या शैतान स्वभाव को बल या चालाकी (=गोपनीयता + भय+ लालच+ तुलनात्मकता) के द्वारा नियंत्रित कर, उन्हें सुर या संगीत की तरह क्रियाशील बना देना ही व्यवस्था का लक्ष्य है। व्यवस्था, अनियंत्रित के नियंत्रण में लाने को कहते हैं। Management is a journey from chaos to order. जिस तरह पानी के तेज और अनियंत्रित बहाव को रोक कर, उसे पाइप में बहा कर, टरबाइन द्वारा उसकी शक्ति को उससे अलग कर बिजली बना दी जाती है, और पानी के अशक्तिकरण से उसके शांत स्वभाव को पुनः प्राप्त किया जाता है, इस जल-विद्युत् पावर-प्लांट के सिद्धांत को ही व्यवस्था कहते हैं। गतिशील पानी की तरह ही, वर्ण-संकर अर्थात मिश्रित गुण वाले मनुष्य भी, असुर ( अनिश्चित स्वभाव वाला) या दुष्ट होते हैं। और, जब उसका गुण दोष, या वर्ण संकर (या मिश्रित गुण) प्रकृति अलग- अलग हो जाती है, तब ही मनुष्य को उसके सही स्वभाव की जानकारी मिलती है। व्यवस्था से बने कठोर कार्य और कष्ट के बाद ही मनुष्य को उसकी पहचान हो पाती है। यही गुण दोष पर आश्रित व्यवस्था अशैतानिकरण या दोष निवारण (devilization) पद्धति है। क्वालिटी मैनेजमेंट का एक मात्र लक्ष्य है, दोष निवारण। दोष या डिफेक्ट के दूर हो जाने से मनुष्य में नियंत्रण आ जाता है, और उसका कार्य सुर ( नियंत्रित गति जैसे संगीत) हो जाता है। अर्थात, वह भरोसे लायक या विश्वास करने योग्य (quality assured) हो जाता है। जो भरोसे के लायक नहीं होते, या अनियंत्रित होते हैं, उन्हें ही असुर (या जो सुर में न हो) कहते हैं।
गुण-दोष निवारण (क्वालिटी -गुण, मैनेजमेंट - दोष निवारण व्यवस्था ) को ही 'धर्म' कहते हैं। सिस्टम को संस्कृत में 'शास्त्र' कहते है। शास्त्र, व्यवस्था या संगठन का अंग नहीं है जबकि व्यवस्था, शास्त्र के बिन न चल सकती है, न रुक सकती है। शास्त्र या सिस्टम या सनातन ज्ञान सदैव बिना बदले, एक सा ही रहता रहता है, और समय के अनुसार व्यवस्था या संगठन बनते रहते हैं। समाज या देश अलग अलग हो सकते हैं, जबकि समाज शास्त्र (social system) का ज्ञान एक है। सिस्टम और शास्त्र एक शब्द है। उदाहरण के लिए, फिसिक्स या फिसिकल सिस्टम ही भौतिक शास्त्र, इकोनोमिक्स या इकानामिक सिस्टम को अर्थ शास्त्र और सोलर सिस्टम को ज्योतिष शास्त्र कहते है। क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम का संस्कृत या हिन्दी में अनुवाद है, गुण (क्वालिटी) - दोष निवारण व्यवस्था (मैनेजमेंट) - शास्त्र (सिस्टम)। गुण दोष निवारण व्यवस्था को धर्म कहते है, इस लिए यह धर्म शास्त्र भी कहलाता है।
क्वालिटी जितनी ऊंची होगी, मैनेजमेंट या व्यवस्था की जरूरत उतनी ही कम होती है। क्वालिटी जितनी ख़राब होगी, व्यवस्था या मैनेजमेंट उतनी ही अधिक होनी चाहिए। साथ ही, यदि व्यवस्था या मैनेजमेंट न हो, तो भी क्वालिटी खराब हो सकती है। कम से कम व्यवस्था या मैनेजमेंट के द्वारा, किस तरह क्वालिटी को सर्वोच्च बनाये रखा जा सकता है। सही दिशा में यह सोच ही को सिस्टम या शास्त्र कहते हैं। शास्त्र या सिस्टम यह सिखाता है कि भरोसा इस तरह हो, जो बिना कंट्रोल के सम्भव हो।
जापान में क्वालिटी मैनेजमेंट सिस्टम को धर्म या आराधना की क्रिया मानी जाती है, इस लिए वहां डिफेक्ट, या दोष या प्रदूषण या अत्याचार, शंका/अविश्वास आदि, व्यवसाय के अंग नहीं होते। जबकि अमेरिका या योरोप में व्यवसाय, युद्ध की परिणति थी; इस लिए, जापान के विपरीत, वहां, व्यवसाय की व्यवस्था में अत्याचार, प्रदूषण, भय, लालच, तुलना और शंका का अधिक प्रयोग होता है। जापान में वकील या न्याय या सरकार या इंस्पेक्टर की उतनी जरूरत नहीं होती जितना अमेरिका में है। जापान में व्यवस्था का सिद्धांत, अमेरिका से उल्टा है। जापान की तरह, ग्रामीण भारत में भी हर कार्य जैसे घर बनाना, खेत में बीज डालने, हल चलाने, फसल काटने, जन्म, विवाह के कार्य को धार्मिक उत्सव कहा जाता है, और ये सारे कार्य संगीत और प्रसन्नता से किए जाते थे। यही धर्म है। लेकिन, सिद्धांत के बदलने से, अब यह परम्परा समाप्त हो रही है, और लोग ठेके पर, हिसाब-किताब और हिंसा या पैसे के बल पर काम करवाते हैं, जिससे ये धार्मिक उत्सव के कार्य न रह कर, अत्याचार, युद्ध या जल्दी बाजी के प्रतीक और दोषपूर्ण होते जा रहे हैं। इस कारण अब दोष, प्रदुषण और अपराध के बढ़ने से, क्वालिटी कंट्रोल के लिए, भारत में भी उलटी सोच के पंडित जैसे, वकील, इंस्पेक्टर, जज, पोलिस, लेखाकार, और आडिटर की मांग बढ़ रही है। प्रकृति के विरुद्ध जाने से श्रम बढ़ता है; और उलटी सोच या सतर्कता के कार्यों में, बुद्धि को सृजनात्मक कार्य की तुलना में श्रम अधिक करना पड़ता है। मोहनदास गाँधी भी इंग्लॅण्ड से कानून की शिक्षा पायी थी, और वे अपराधियों और अंग्रेज सरकार का बचाव करते हुए, पैसों में लोट रहे होते, लेकिन उन्होंने न केवल अपने दिमाग के सोच के दिशा बदली बल्कि आदिवासी भारतीयों की वेश भूषा भी अपना ली। मन के इस विचित्र परिवर्तन ने उन्हें महात्मा बना दिया। इस सीधी सोच से, उनका श्रम (प्रकृति के विरुद्ध सोच) समाप्त हो गया, और वे आश्रम अर्थात जहाँ श्रम न हो, में रहने लगे। उनके निवास को आज भी साबरमती आश्रम कहते हैं।
व्यक्ति के चारित्रिक विकास और संगठनात्मक व्यवस्था में क्या सम्बन्ध है ?
व्यवस्था ही वह जल विद्युत् मशीन है जिस से पानी के अनियंत्रित बल को और उसके शांत स्वभाव को अलग अलग किया जाता है। संगठन ही वह प्रयोगशाला या चिकित्सालय है जिसमें व्यक्ति एक विशेष युद्ध या सर्जरी करवा कर, अपने चरित्र में सुधार ला सकता है। ज्ञान से प्राप्त निर्भयता और संवेदनशील होना चरित्र परिवर्तन का लक्ष्य है। इस चिकित्सालय से बाहर आकर मनुष्य को मनुष्यता का बोध होता है। विकास की इस क्रिया को निम्नलिखित उदाहरण से समझा जा सकता है। किसी संगठन में, व्यवस्था की शुरू में बहुत जरूरत होती है, और वह बहुत मजबूत रहती है; किंतु कालांतर में, चारित्रिक दुर्बलता के कम होने पर, वह स्वतः समाप्त हो जाती है।
१) शुद्र चरित्र: छोटी बुद्धि वाला, आतंकवादी या योद्धा या शासक जो अंहकार, शत्रु भाव, असुरक्षा और भय से संचालित है, और हार -जीत जिसका लक्ष्य है, जो अपनी प्रकृति को नही जान सकता और अपनी ही महत्वाकांक्षा का दास बन कर कठिन श्रम के लिए मजबूर है ( बिन लादेन) ;
२) वैश्य चरित्र: व्यवसायी, उद्योग, तकनीक या मनोरंजन क्षेत्र के प्राणी जिसका अंहकार, देने -लेने, नाप तौल, और कानून अपनाने से कम हो रहा है, और जो रचनात्मक प्रतिस्प्रधा, प्रदर्शन, नए अनुभव, और स्वार्थ से संचालित है और लाभ-हानि जिसका लक्ष्य है ( बिल गेट्स) ;
३) क्षात्र चरित्र: वैज्ञानिक, दार्शनिक, साहित्यकार, जिसमें कलाकार, लेखक या समाजसेवक भी शामिल हो सकते हैं, और जो बिना किसी संगठन के, अपनी मूल प्रकृति (स्वभाव) को जान कर , बिना श्रम किए, केवल स्वान्तः सुखाय कार्य करता है, और किसी अंहकार, शत्रु भाव व् संगठन से अलग है और धर्म-अधर्म (सही-ग़लत) जिसका लक्ष्य है (गाँधी, टेरेसा, आइंस्टाइन );
४) निर्गुण ब्राह्मण जो सत्य के लक्ष्य को प्राप्त है, और सत्य -असत्य से परिचित है (कृष्ण, राम, बुद्ध)।
स्वभाव में स्थिर मनुष्य (सोने की तरह) प्रतिक्रियाहीन और संवेदनशील होते हैं, और उनके कार्य सभ्यता (civilization) कहलाते हैं। यहाँ बल, भय, कानून, न्याय या दंड नहीं होते। सभ्यता का लक्ष्य मनुष्य की स्वतंत्रता या मोक्ष है। इसे ही विकास या (development) कहते हैं। Development is a journey from order to liberation. विकास की क्रिया मनुष्य के चिंतन से और ध्यान से प्राप्त होती है, व्यवस्था या संगठन से नहीं। स्वभाव में स्थिर मनुष्य को संगठन की जरूरत नहीं होती, न ही उनके लिए कोई व्यवस्था ही होती है। इन्हे कुल कहते है। कुल का उदाहरण है .... पक्षी के झुंड, या तीर्थ यात्री, जो एक दिशा में जाते हैं और किसी का किसी से गोपनीयता या प्रतिस्प्रधा या भय नहीं होता, किंतु वे एक दूसरे पर निर्भर भी नहीं होते। इसको समाज भी कहते हैं, क्योंकि सभी का लक्ष्य एक होने पर भी, प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान से अंहकार-रहित, समान और आत्मनिर्भर बने रहते हैं। भारत में आदिवासी जीवन, या विचारक जैसे कबीर, गाँधी, तुलसीदास, गुरु नानक, ज्ञान के निस्वार्थ प्रसार से, कुलपति या कुल-गुरु कहलाये; और उनके चले पंथ (मार्ग) पर लाखों लोग आदिकाल से निर्भर हैं। यह अध्यात्म का मार्ग है। कुल या समाज, एक खेत की तरह होता है, क्योंकि व्यक्तियों के मन में गुरु का डाला गया ज्ञान का बीज, कभी नष्ट नही होता, और उनकी बुद्धि उचित समय पर उस ज्ञान को संसार में कर्म के रूप में बढ़ते हुए देखती है। जबकि अज्ञान का बीज, मन के उस खेत में नष्ट हो जाते है, या उनके कार्य सीमित काल तक लाभ पहुंचाते हैं, और कुल नहीं बना पाते। कुल का, पारिवारिक या जन्म देने वाले व्यक्तियों से सम्बन्ध होना आवश्यक भी नहीं है। ज्ञान की खोज में लगे लोगों की संस्था को आज भी व्यवसाय या दुष्टों का संगठन नही कहते, उसे ऋषि-कुल, आश्रम, या विश्व०विद्यालय कहते हैं, और उसका नेता कुलपति कहलाता है। छात्र जिसे छत्रिय धर्म का ज्ञान होना चाहिए; उनका कार्य, ज्ञान की यात्रा या तीर्थ-यात्रा द्वारा तीनो गुण से या विकारों से मुक्त होना (अर्थात 'त्रि' गुण का 'क्षय') है। क्षत्रिय, जब तीनो गुण या विकारों से मुक्त हो जाता है, तब उसका वर्ण निर्गुण, निर्विकारी या ब्राह्मण हो जाता है।
भारत में राक्षसों का विशेष सम्मान होता रहा है जबकि पतित राक्षसों के वध की स्मृति में उत्सव होते हैं। राक्षस का जीवन व्यक्तिगत त्याग और संगठन के जिम्मेवारी की कठिन परीक्षा है। राक्षस, संस्कृत भाषा का शब्द है, यह, दरअसल, रक्षा करने वाले (जैसे पोलिस, जज, मिलिटरी, राजनेता, योद्धा या वर्दी में छिपे शक्ति-तंत्र ) को कहते हैं। इनमें मिश्रित गुण होते हैं, इसलिए ये, स्वयम असुर (भरोसे के लायक न) होते हुए भी, व्यवस्था को शत्रु-भाव, युद्ध या विरोधियों को तर्क से हराने के बाद, सतर्क रह कर चलाते हैं। न्याय, शक्ति, छल, धन के माध्यम से जितना सम्भव हो सकता है, संगठन बना कर रक्षा और व्यवसाय के ऊंचे लक्ष्य के कार्य में लोगों को लगाए रखने से शान्ति बनी रहती है। राक्षसों की अप्राकृतिक शक्ति से ही उद्योग और व्यवसाय सफल होते हैं तथा, संगठन और व्यवस्था के कमजोर होते ही, उद्योग और व्यवसाय समाप्त हो जाता है। क्षत्रिय और राक्षस योद्धा शत्रु नहीं होते, किंतु राक्षस, ( शत्रु भाव से संचालित हुए) किसी भी संगठन का स्वामी, हमेशा नहीं रह सकता और कभी न कभी अपनों के हाथ ही मारा जाता है। इसलिए राक्षस को कभी भी अपने संगठन, या उसके बल, या व्यवस्था के सिद्धांतों का गर्व नहीं करना चाहिए। भारत में, मनुष्यों के आदर्श या मर्यादा पुरूष को राजा कहते हैं। जो व्यक्ति अनुकर्णीय होता है, और जिस से लोग स्वेच्छा से प्रेरित हो जाते हैं, उसे राजा कहते हैं। राम, या गाँधी या कबीर कभी शासक होने के कारण नहीं जाने गए, बल्कि उनका व्यक्तित्व दुनिया के लिए एक आदर्श बन गया। इनका अनुकरण करने में कोई हानि नहीं है। हर समाज या कुल में राजा एक मार्ग दर्शक होता है। जबकि राक्षस, जैसे शासक, पोलिस या जज या अधिकारी या योद्धा जो संगठन की शक्ति के प्रतीक हैं, उनका आचरण कभी भी अनुकर्णीय नहीं होता। एक साधारण मनुष्य के लिए अपराधी बनने की स्वतंत्रता नहीं है, इसी तरह यदि वह स्वयं को जज मान कर न्याय के कार्य करे, या पोलिस तरह अस्त्र के प्रयोग से रक्षा या युद्ध करे, तो भी यह गैर कानूनी कहलाता है, और यह दंडनीय हो सकता है। संगठन में कार्य करना व्यवसाय है, इस लिए यहाँ स्वेच्छा भी नहीं होती, और भरोसा या अनुकरण करना भी उचित नहीं, और शत्रुओं से अपनी रक्षा करते हुए, नीति से ही लक्ष्य की प्राप्ति की जानी चाहिए।
व्यवस्था के लिए भूख (डिमांड) की अनिवार्यता।
भारत का ज्ञान दुनिया भर के लिए समस्या है। यहाँ प्रकृति में रचे बसे लोगों को व्यवस्था की जरूरत ही नहीं है। भूख के कारण ही लोग युद्ध या व्यवसाय करते हैं। जैसे जैसे भूख (demand) बढती है, लोंग अशांत होने लगते हैं। फलस्वरूप असुरक्षा, अपराध और बीमारी बढती है। भूख, अपराध और बीमारी के द्वारा व्यवस्था के सिद्धांत बनते है, जिस पर सरकार, चिकित्सा, न्याय और रक्षा के साधन निर्भर हैं। व्यवस्था चलाने वाले के हित में यही है की वे 'स्वभाव' (स्व+ भाव) को नष्ट करें और 'भाव' (शत्रुता, मूल्य, या दया ) का प्रयोग सीखें। भारत कभी एक विकसित सभ्यता रहा था किंतु दुर्भाग्य से उन मनुष्यों में विकास की परिभाषा का ज्ञान न रहा। अब उन्हें यह रास्ता पुनः सीखने के लिए अविकसित बनने के लिए एक नई व्यवस्था पर निर्भर होना पड़ रहा है। अविकसित होने की यह क्रिया ही शैतानीकरण या evilization है। इस क्रिया से शांत मनुष्य को अशांत और मिश्रित स्वभाव में बनने के लिए प्रेरित किया जाता है, और फ़िर उन्हें बल पूर्वक व्यवस्था से पुनः नियंत्रित कर, और फ़िर विकास के लिए पुनः लाया जाएगा। अविकसित (evilization) - विकासशील (devilization)- विकसित (civilization) का चक्र जान लेने पर ही इस चक्रवुय्ह से निकला जा सकता है। यही दिशा ज्ञान, शास्त्र (system) कहलाता है जिसके द्वारा मनुष्य का स्वभाव पतित (गिरने लायक ) नहीं होता।
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Achcha laga aapke blog par aakar.Shubkamnayen.
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