उपयोगिता का मतलब उसकी मांग से है। Marginal utility principle
बाज़ार में वस्तु का मूल्य इस पर अधिक निर्भर होता है कि कौन कितना भूखा है न कि उस वस्तु की उपयोगिता। भूखा व्यक्ति ही आय का श्रोत है। जहाँ भूखे लोग ज्यादा हैं, आय की मात्रा भी ज्यादा होगी। दरअसल, बाज़ार की व्यवस्था, भूखे व्यक्ति की ही देन है।
- एक धनी व्यक्ति यात्रा कर रहा था। उसे भूख लगी। उसे एक अन्य व्यक्ति मिला जिसके पास चार रोटी थी। भूखे व्यक्ति ने पहली रोटी के लिए, चार रूपये दिए। किंतु, रोटी खाने के बाद उसकी भूख कम हो गई। और इसलिए, दूसरी रोटी के लिए उसने तीन रूपये का प्रस्ताव ही रखा। इस तरह तीसरी रोटी केवल दो रूपये में ही बिक सकी। उसके बाद जब उसकी भूख नहीं रही, तो रोटी का मूल्य भी नही रहा।
- एक व्यक्ति की नौकरी नए शहर में लगी। उसे रहने के लिए घर चाहिए। घर को तुंरत खरीदने के लिए उस व्यक्ति को ५० लाख रूपये देने पड़ेंगे। किंतु यदि दो वर्ष का इंतज़ार करें तो उसे वही घर २० लाख रूपये में मिल सकता है। यदि जमीन खरीद कर स्वयं घर बनवाना हो, तो उसकी कीमत १० लाख रूपये होगी।
आवश्यकता आविष्कार की जननी है। असुरक्षा भूख की जननी है।
मांग का कारण उसकी असुरक्षा है, आवश्यकता या उपयोगिता नहीं। मालिक होना मांग है। हीरे की कीमत वही लगाते हैं जो उसे खर्रिदना चाहते हैं क्योंकि उसका उपयोग आर्थिक सुरक्षा हैं। हीरे की आवश्यकता देखने की है, जबकि मालिक होने से मांग बढ़ती है । मांग का कोई अंत नहीं है, किंतु आवश्यकता पूरी हो सकती है। मांग के न पूरे होने का डर ही लालच है। इस से नियंत्रण की भावना पैदा होती है। कैपिटल मार्केट एक अनंत मांग का सिद्धांत है, रिटेल मार्केट आवश्यकता या उपयोगिता का सिद्धांत है। कैपिटल मार्केट के कारण रिटेल मार्केट पर बुरा असर पड़ता है, किंतु रिटेल मार्केट से काप्तल मार्केट पैर बुरा असर नहीं पड़ता।
रोटी खर्रिदने वाले ने रोटी की कीमत अपनी आवश्यकता के पूरे होने पर कम कर दी। किंतु खरीदार के असुरक्षा के कारण रोटी की कीमत आवश्यकता पूर्ति के बाद भी कम नहीं होगी। जो फर्क असुरक्षा और uप्योगिता में है वाही मांग और आवशकता में है। लाच
जो हमें चाहिए उसका पता नहीं किंतु जो नहीं मिल रहा उसकी चिंता है। असुरक्षा की भूख, आवश्यकता को भुला देती है। भूखे लोग उपयोगिता का अर्थ समझ नहीं सकते इसलिए धन उनकी दरिद्रता का समाधान नहीं है।
- हीरा पानी से महंगा क्यों है। इसलिए क्योंकि हीरा कम है, लोगों में उसकी मांग अधिक है। उसकी कीमत अधिक है। पानी की उपयोगिता जो निर्विवाद है, किंतु उसका उसका मूल्य तब तक नहीं हो सकता जब तक पानी की कमी नहीं हो जाए। बाज़ार भूखों से चलता है, इसलिए कमी पैदा करना ही व्यवसाय है।
पैसे की भूख अनंत है (Money is only commodity with insatiable demand)
जो जितना सुरक्षित है, उसकी असुरक्षा उतनी ही होगी. धन या रुपया , आर्थिक सुरक्षा / भविष्य- निधि का एक भरोसा है. धन की यह सुरक्षा जितनी होगी, असुरक्षा भी बढेगी, और इस लिए धन की मांग कभी भी पूरी नहीं हो सकती.
Market is a zero sum game. Profit of one is filled by loss of others.
. काल या भविष्य का डर और धन कि इच्छा ही, एक भर-पेट और धनी मनुष्य को भूखा और दरिद्र ( असंतुष्ट) बनाने में सफल है. मनुष्य में धन की चाहत का न होना, उसे कर्तव्य में स्थिर करती है, जिससे वह काल या भविष्य की सुरक्षा के लिए धन पर निर्भर नहीं होता. संतुष्ट और सृजनात्मक व्यक्ति, धन को गणित का अंक और प्रयोग समझते हैं, आर्थिक सुरक्षा नहीं.
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